सितम्बर 2026

पुस्तकसंवादों की छैनी से तराशी लघुकथाएँ     Posted: September 1, 2019

साहित्यिक एक्टिविस्ट की बेजोड़ संज्ञा से जिन्हें नवाजा जा सकता है, ऐसे बलराम अग्रवाल लघुकथा रचना में बहुत दिनों से निष्ठापूर्वक संलग्न हैं। उनके संबंध में ऐसे विचार के प्रदेता श्री विश्वनाथ त्रिपाठी की इस बात से भी सहमत हुआ जा सकता है कि ‘बलराम अग्रवाल जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने वाले लघुकथाकार हैं।’
‘तैरती हैं पत्तियाँ’ पर कोई समीक्षात्मक मन्तव्य प्रसारित करने से पूर्व प्रस्तुत लघुकथा संग्रह पर स्वयं बलराम अग्रवाल द्वारा कहे गये विचार को समझ लेना जरूरी है। उनका कहना है कि—‘तैरती हैं पत्तियाँ’ की सभी रचनाएँ हवा की हथेली या पानी के पल्लू पर उन्मुक्त भाव से तैरती जीवित रश्मियाँ और चिंगारियाँ हैं। ये पेड़ की ही नहीं, फूल की भी पत्तियाँ हैं और चाकू-छुरी का फाल कहलाने वाली लोहा-स्टील की भी। लोक की गोद में जाकर ये ही तो ‘पाती’ में भी तब्दील होती हैं; प्यार को किताब के पन्नों के बीच सूख चुके फूल-सी अमर कर जाती हैं।’ बलराम अग्रवाल के यही सब विचार ‘तैरती हैं पत्तियाँ’ में संग्रहीत लघुकथाओं का ताना-बाना बुनते नजर आते हैं।
जीवन के दो छोर होते हैं—मुलायम और कठोर। लेकिन मुलायम भी ऐसा मुलायम जो भीतरी कठोरता पर पड़ा आवरण मात्र है। आधुनिक जीवन-शैली से जो खारिज हो चुका है, वह मुलायम। सूखी पत्तियों का मर्मर स्वर अब जीवन की आकुलता बन चुका है। ये स्वर अब स्वर नहीं, जीवन की चौखट पर पढ़े जाने वाले मर्सिया बन चुके हैं। लाज-शर्म के रंगीन परदे अब इतने स्याह हो चुके हैं कि शर्मो-हया की चिंता जमाने में कहीं दिखायी नहीं पड़ती। ‘मुर्दों के महारथी’ लघुकथा में बलराम अग्रवाल ने एक संवाद पिरोया है—‘शऊर की फिक्र नहीं की, तो जनाब… मुर्दा समूचे शहर को खा जायेगा कब्र से निकलकर।’
सुई की नोंक से जैसे हथेली पर पक चुका छाला फोड़ दिया जाता है, बलराम अग्रवाल की लघुकथाओं में छाले की पीव का रिसाव ‘पाकिस्तान’ शीर्षक लघुकथा में संवादों की गहमा-गहमी के मध्य से बह रहा होता है—
“पाकिस्तान किन्होंने माँगा था?”
“सियासतदारों ने।”
“वो मुसलमान नहीं थे?”
“थे, नहीं थे—मुझे क्या पता?”
“किसे पता है, फिर?”
“जिन्होंने दिया था, उन्हीं से पूछ लो।”
हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के विभाजन की यही ‘पीव’ आज भी ज्यों की त्यों हैं।
लगता है, आधुनिक समय में आज का हर व्यक्ति अपना सलीब अपने ही काँधे पर ढोते हुए चल रहा है। आज हिंसा का पत्थर हर किसी के हाथ में है; कब, कहाँ सिर पर आ पड़े और काँच की देह चूर-चूर हो जाये। ‘बकरा और बादाम’ लघुकथा में बलराम अग्रवाल ने आधुनिक बोध से घिरे हालात से पस्त ऐसा ही एक संवाद गढ़ा है—अजीब ही रोग से घिर गया हूँ, सर। जिससे भी मिलता हूँ, ऐसा लगता है… उसके सींग उग आये हैं; और मैं अगर आसपास बना रहा तो पता नहीं कब, उन्हें वह मेरे पेट में घुसेड़ देगा।”
संवादों के पहरावे से ही लघुकथा की सजधज बढ़ती है यानी लघुकथा में सक्रियता पैदा हो जाती है। कुरुक्षेत्र में संवादों की बानगी ने ही ‘भगवद्गीता’ को जन्म दिया है। संवाद कभी निष्प्राण नहीं होते हैं। संवादों की अनुशासित अभिव्यंजना में ही लघुकथा के ‘प्राण’ पुलकित हुए मिलते हैं। संवादों के पार्श्व से लघुकथा का कथ्य, परिवेश, घटना, चरित्र, भाषा आदि लघुकथा के सभी आवश्यक कारक झाँकते प्रतीत होते हैं। बलराम अग्रवाल की लघुकथाओं में ज्यादातर संवादों का आगमन इसी मुहावरे को पकड़कर हुआ प्रतीत होता है।
पूरा समाज मुखौटों से वासित हो चुका है। सबके चेहरे नकाब से ढके हैं। भेदाभेद का कोई सवाल ही नहीं। लेकिन जो आदमी को खँगालकर उसमें से मुखौटाविहीन इंसान निकाल दे, उसी की तलाश में बलराम अग्रवाल की अद्भुत संवादों से सुशोभित ‘हरामखोर’ लघुकथा इस अनूठे संदर्भ का दर्पण बनकर सामने आती है—
“यार, अपने उस दोस्त से मिलवा कभी…।”
“किस दोस्त से?”
“वही, जो बिना गालियाँ दिए तुझसे बात नहीं करता है।”
“क्या करोगे उस हरामखोर दोस्त से मिलकर!”
“मिन्नतें करूँगा भाई! एक दोस्त तो मुझे भी चाहिए ऐसा, जो जब भी मिले, बिना नकाब के मिले।”
संवादों के बूते लघुकथा गढ़ना बड़ा परिश्रम माँगता है। श्ब्दों की ढपली बजा-बजाकर ही संवाद नटी को कथ्य के महीन तार पर चलाना पड़ता है, तब कहीं जाकर संवादी लघुकथा का जन्म होता है। जहाँ सृजन है वहाँ पीड़ा है। यह वेदना लघुकथाकार को भुगतनी होती है, तब कहीं जाकर लघुकथा में वह ‘महाकरुणा’ पैदा होती है जिसका उत्स मानव जाति को एक सूत्र में पिरो देता है।
अस्मिता अथवा वजूद को जगाने में ही एक बड़े संवाद की जरूरत है। परतंत्रता की बेड़ियों से जकड़ी औरत जाति को मुक्त बनाने में खुद औरत को देहरी लाँघकर मैदान में आना होगा वरना औरत विषयक आजादी का सवाल निरुत्तरित ही रहेगा। लघुकथा ‘सुनो बेटियो’ में ऐसा ही अलार्म समय की घड़ी में बलराम अग्रवाल ने लगाया है
“चुप न बैठो मेरी बेटियो, ऊपर वाली उस आवाज को सुनो जो ‘औरत’ की ‘औरत’ के लिए हो। गुलामी से तुम तभी बाहर आ पाओगी, जब ‘औरत’ की आवाज सुनने और लिखने लायक खुद को बना लोगी।”
‘तैरती हैं पत्तियाँ’ संग्रह की अधिकांश लघुकथाएँ संवादों के बूते रची गयी हैं। ये लघुकथाएँ बलराम अग्रवाल को प्रयोगधर्मी लघुकथाकार सिद्ध करती हैं। इस संग्रह में उनकी लघुकथाएँ संवादात्मक और विचारपरक होने के बावजूद लघुकथा विधा की देहरी पर मुस्तैदी से खड़ी प्रतीत होती हैं।
बलराम अग्रवाल ‘लघुकथा आश्रम’ को जो भी देते हैं या दे रहे हैं, वह दान है, कर्ज नहीं। उनका यह साहित्यिक इन्वेस्टमेंट है, भौतिक नहीं। संवादात्मक लघुकथा गढ़ने में हिम्मत और समर्पण चाहिए जो बलराम अग्रवाल के व्यक्तित्व और कृतित्व में स्पष्टत दृष्टिगोचर होता है।
बलराम अग्रवाल का लघुकथा संग्रह ‘तैरती हैं पत्तियाँ’ गुलाब के नन्हे-नन्हेंअनेक गुलदस्तों की मानिंद हैं। उन्होंने अपनी लघुकथाओं के गुलदस्ते को एक-एक खिली-अधखिली कली को उसकी लम्बी टहनी से जटिलता के काँटे तराशकर हरी पत्तियों समेत पारदर्शी पन्नी में शंक्वाकार रूप दिया है जो देखने में संवादात्मक होकर इसके बरअक्स पढ़ने में विचारात्मक हैं।
पुस्तक : तैरती हैं पत्तियाँ; कथाकार : बलराम अग्रवाल; प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं॰ 1 ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032; संस्करण : 2019; पृष्ठ संख्या : 160; मूल्य : रुपये 175/-(पेपरबैक)
समीक्षक : डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे, शशीपुष्प, 74 जे/ ए, स्कीम नं॰ 71, इन्दौर-452009 मोबाइल:9329581414

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