गढ़वाली अनुवाद:डॉ. कविता भट्ट
“यहार, ब्याळि कृष्णानगर कॉलोनी म घपरोळ किलै मच्यूँ छौ।”
“मिळाखै वजै सि। दुर्गापूजा कि मिळाख।”
“ह्वे क्य छौ?”
“सैर म सौवों दुर्गापूजा समिति छन। उं ई मन आठ-दस समित्यों का सदस्य पौंछि गे छा दुकानदारू मन मिळाख लेणा वास्ता।”
“इतरी समित्यों तैं क्वी कन क्वे कि मिळाख दे सकदु भै?”
“प्र्श्न सिर्फ इतरी समित्यों कु ई नी च। प्रश्न मिळाख की रकमौं कु बि च। हरेक समिति पाँच सौ बिटि दस हजार तक उगौणा छा।”
“कम से कम कतगा?”
“बोलि न, पाँच सौ।”
“तब?”
“तब यु कि मिळाख क नौं पर इनि जोर-जबरदस्ती अर लूट क खिलाफ दुकानदारू न शटर उन्द करिन अर सड़किम उतरी गेन।”
“ब्याळि या परसि क अखबार म हाई कोल्ट क बि क्वी आदेश छौ न इस बारा म?”
“हाँ, यु ई कि पुलिस तैं इख पर रोक लगइं चैणी अर शिकैत हूण पर एक्शन लियूँ चैंद।”
“पुलिस न कृष्णानगर कॉलोनी म एक्शन ल्ये क्य?”
“हाँ, भौत जबददस्त। पुलिसवालों तैं जन्नि ईं बात कु पता चली, एक हवलदार क दगडि करीब बीस सिपाही वुख पौंछि, तुरंत।”
“वाह, हाइ कोल्ट क आदेश न त सै ही माॅं कमाल करि दे। परिस्थिति तुरन्त नियंत्रण म ऐ गे होली।”
“एकदम। पुलिसवाळोन लाठि मारि-मारिक दुकानदारू तैं
सड़क बिटि भगै दे।”
“दुकानदारू तैं?”
“हाँ, आधा घंटा म सब्बि कुछ शान्त।”
“लेकिन…… लेकिन… मिळाख माँगण वाळा?”
“वु त अबि बि माँगणा छन।”
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