जुलाई 2026

भाषान्तरवे अभी भी माँग रहे हैं/ वु अब्बि बि मंगणा छन     Posted: November 1, 2023

गढ़वाली अनुवाद:डॉ. कविता भट्ट

“यहार, ब्याळि कृष्णानगर कॉलोनी म घपरोळ किलै मच्यूँ छौ।”

“मिळाखै वजै सि। दुर्गापूजा कि मिळाख।”

“ह्वे क्य छौ?”

“सैर म सौवों दुर्गापूजा समिति छन। उं ई मन आठ-दस समित्यों का सदस्य पौंछि गे छा दुकानदारू मन मिळाख लेणा वास्ता।”

“इतरी समित्यों तैं क्वी कन क्वे कि मिळाख दे सकदु भै?”

“प्र्श्न सिर्फ इतरी समित्यों कु ई नी च। प्रश्न मिळाख की रकमौं कु बि च। हरेक समिति पाँच सौ बिटि दस हजार तक उगौणा छा।”

“कम से कम कतगा?”

“बोलि न, पाँच सौ।”

“तब?”

“तब यु कि मिळाख क  नौं पर इनि जोर-जबरदस्ती अर लूट क खिलाफ दुकानदारू न शटर उन्द करिन अर सड़किम उतरी गेन।”

“ब्याळि या परसि क अखबार म हाई कोल्ट क बि क्वी आदेश छौ न इस बारा म?”

“हाँ, यु ई कि पुलिस तैं इख पर रोक लगइं चैणी अर शिकैत हूण पर एक्शन लियूँ चैंद।”

“पुलिस न कृष्णानगर कॉलोनी म एक्शन ल्ये क्य?”

“हाँ, भौत जबददस्त। पुलिसवालों  तैं जन्नि ईं बात कु पता चली, एक हवलदार क दगडि करीब बीस सिपाही वुख पौंछि, तुरंत।”

“वाह, हाइ कोल्ट क आदेश न त सै ही माॅं कमाल करि दे। परिस्थिति तुरन्त नियंत्रण म ऐ गे होली।”

“एकदम। पुलिसवाळोन लाठि मारि-मारिक दुकानदारू तैं 

 सड़क बिटि भगै दे।”

“दुकानदारू तैं?”

“हाँ, आधा घंटा म सब्बि कुछ शान्त।”

“लेकिन…… लेकिन… मिळाख माँगण वाळा?”

“वु त अबि बि माँगणा छन।”

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