’देखन में छोटी लगें’ लघुकथा पाठ और विश्लेषण सत्र
कैनेडा को, विश्वरंग भारत- रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय का कला और साहित्य का अंतरर्राष्ट्रीय महोत्सव का हिस्सा बनने का सुअवसर 7 और 8 नवम्बर को मिला। विश्वरंग कैनेडा में 10 सत्र आयोजित किए गए जिनमें साहित्य की विधाओं और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों से बातचीत, नाटक, फिल्म, विज्ञान वार्ता आदि के साथ ही लघुकथाओं पर एक सत्र आयोजित किया गया, जिसका शीर्षक रखा गया- ‘देखन में छोटी लगें’। इस सत्र की संचालिका टोरोंटो की स्थापित लेखिका कृष्णा वर्मा थीं। इसमें टोरोंटो की दो अन्य साहित्यकारों भुवनेश्वरी पांडे और डॉ. शैलजा सक्सेना के साथ थे, भारत और टोरोंटो में समान रूप से लोकप्रिय, प्रतिष्ठित हाइकुकार और लघुकथाकार, लघुकथा.कॉम जैसी 3 भिन्न वेब पत्रिकाओं के संपादक श्री रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ जी! सभी साहित्यकारों ने अपनी-अपनी लघुकथाएँ पढ़ीं और उन पर शेष लेखकों के साथ-साथ, काम्बोज जी ने विस्तृत टिप्पणियाँ दीं।
कार्यक्रम का प्रारंभ रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ जी से लघुकथा की विशेषाताओं को जानने से हुआ। उन्होंने लघुकथा के रचना कर्म, शब्द अनुशासन और ’न कुछ जोड़ा जा सके, न कुछ छोडा जा सके’ जैसी विशेषताओं के बारे में बात करने के बाद अपनी रचना ’धारणा’ पढ़ी। इसमें ’गंदा मोहल्ला’ के नाम से बदनाम जगह में, पूर्व धारणाओं के चलते लोगों को चोर, उचक्का समझने वाले मुख्य पात्र की धारणा को खंडित होते हुए दिखाया गया है। जो पानवाला उसे वीभत्स लगता था, वही बच्चे के द्वारा दिए गए 100 रुपयों को ईमानदारी से लौटा कर पूर्व धारणा को ध्वस्त कर देता है। कहानी समाज की मानसिक भेदभाव को सूक्ष्मता से दर्शाती है।
इसके बाद भुवनेश्वरी जी ने ’मूँगफली की बोतल’ लघुकथा पढ़ी जिसमें प्रवासी नई-नवेली बहू का पति की इच्छा का ध्यान रख, एक मूँगफली का डिब्बा न खरीद पाने की मजबूरी को दिखाया गया है। पत्नी का पति की ओर देखना, प्यार से ’तुम खाओगे?’ पूछना और खरीदने की अनुमति चाहना और उधर पति का पत्नी की इच्छा से लापरवाह हो कर फोन पर बात करने लग जाना पत्नी की स्थिति की दयनीयता को चरम पर ले जाता है। इस लघुकथा की सुन्दर दृश्यात्मकता और विडंबना पर चर्चा की गई।
डॉ. शैलजा सक्सेना ने अपनी ’दाह’ कहानी पढ़ी जिसमें बलत्कार में मारी गई लड़की की क्रियाकर्म को मीडिया टी.वी. पर दिखाना चाहता है पर उस लड़की के पिता ने उसका दाह कर्म चुपचाप कर दिया। पुलिस द्वारा कहे जाने पर कि ’वह पूरे देश की बिटिया थी’ उसे अकेले में क्यों जलाया? वह कहता है कि ऊँची-नीची जातियों, मीडिया के लोगों और बाकी अन्य की वासनामय निगाहों से अपने घर -मुहल्ले की लड़कियों को बचाने के लिए, क्योंकि वह उन्हें देश की बिटिया नहीं बनाना चाहता। लघुकथा में ’देश की बिटिया’ शब्दों में व्यंग्य चरम पर दिखाई देता है। रामेश्वर काम्बोज जी ने अपनी टिप्पणी में मीडिया, विकृत मानसिकताओं और स्थिति की मार्मिकता पर टिप्पणी की।
कृष्णा वर्मा जी ने ’छुटकारा’ कहानी पढ़ी जिसमें पत्नी के मरने के बाद एक आदमी अपनी छोटी सी बेटी से छुटकारा पाने के लिए फावड़ा लेकर जंगल को जाता है। बिटिया पिता को थका जान कर बैठने को कहती है, उसी कॊ मारने के लिए गड्डा खोदने वाले पिता से कहती है कि तुम बैठ जाओ, मैं गड्डा खोद लेती हूँ। पिता उसके स्नेह और प्रेम से भीग कर, रो देता है कि वह अपने से इतना प्रेम करने वाली बिटिया को कैसे मारने जा रहा था? और अपना विचार बदल देता है। ’हिमांशु’ जी ने कहानी की मार्मिकता पर चर्चा करने के साथ ही शीर्षक पर भी बात की। ’छुटकारा’ शब्द को द्विअर्थी बताते हुए उन्होंने कहा कि लघुकथा के शीर्षक को व्यंजनामय ही होना चाहिए। यहाँ लडकी से छुटकारा पाने के विचार को रखने वाला पिता अंतत: अपनी नकरात्मक सोच से छुटकारा पा लेता है।
इस तरह सशक्त लघुकथाओं के पाठ और उनके विश्लेषण यह सार्थक कार्यक्रम संपन्न हुआ।
अंत में डॉ. शैलजा सक्सेना ने सब प्रतिभागियों को धन्यवाद देते हुए संचालिका कृष्णा जी को विशेष धन्यवाद दिया। उन्होंने विश्वरंग भारत का भी आभार व्यक्त किया।
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सौजन्य:डॉ. शैलजा सक्सेना
Dr. Shailja Saksena
Co- Founding Director- Hindi Writers Guild, Canada
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