सितम्बर 2026

देशलाचार ज़िन्दगी     Posted: November 1, 2024

रात में सोने से पहले राहुल की अधखुली आँखों के सामने उस भिखारी की तस्वीर रह-रह कर सजीव हो जा रही थी, जिसके दोनों हाथ एक ही जगह से कटे हुए थे। उसके गले में एक पोटली टँगी थी, जिसमें लोग पैसे डाल रहे थे। राहुल ने आँखों में करुणा भरकर उस युवक से अनायास पूछ दिया था, “क्या तुम्हारे दोनों हाथ किसी ट्रेन एक्सीडेंट में कट गए ?”
इसके पहले वह निरीह और लाचार युवक कुछ कह पाता, राहुल की माँ, राहुल को पकड़कर स्टेशन के बाहर ले आई। ऑटो रिक्शा में बैठकर वे घर के लिए चल पड़े, तो राहुल की माँ ने उसके कान में सचेत करते हुए धीरे से कहा, “ऐसे लोगों से कोई सवाल-जवाब नहीं करते।”
राहुल ने गहरी जिज्ञासावश पूछा, “क्यों माँ, क्यों..?”
माँ ने जिज्ञासा शांत करते हुए कहा, “हो सकता है, इनके पीछे कोई गैंग हो, जो इनके हाथ काटकर भीख मँगवाता हों। या फिर इसने खुद ही हाथ कटवा लिये हों।”
इसपर राहुल ने एक वाजिब प्रश्न रखा, “माँ, क्या स्वस्थ हाथों से पैसे नहीं कमाए जा सकते ?”
माँ अचानक चिड़चिड़ा-सी गई। उन्होंने खीज में उत्तर दिया, “नहीं..! देखते नहीं क्या, कितनी बेरोजगारी है?’’

माँ के इस उत्तर ने राहुल को झकझोर दिया था। उसके पिता भी किसी अच्छे और नियमित रोजगार में नहीं थे। बेहद मामूली तनख्वाह मिलती थी। महीने की बीस तारीख आते-आते पैसे ख़त्म हो जाते थे। फिर पापा को कहीं-न-कहीं से पैसे माँगकर लाने होते थे। उसने अपने पिता को पड़ोसी या अपने दोस्तों से कई बार नजरें झुकाकर पैसे माँगते देखा था। यह सब याद आते ही राहुल विचलित होने लगा। उसने सोना चाहा। मगर नींद कोसों दूर चली गयी थी।
अचानक वह बिस्तर से उठा और माँ के पास चला गया। माँ बिस्तर पर लेटी थीं। उसने माँ से कहा, “माँ, हम अपने खर्च बहुत कम कर लेंगे। मगर पापा से कहो, वे किसी से पैसे नहीं माँगा करें।”
माँ एकदम चौंक पड़ी। उन्होंने पूछा, “राहुल, तुम्हें क्या हो गया है ? अचानक ऐसी बातें ?”
राहुल ने कहा, “माँ, पापा आगे से किसी से पैसे माँगेंगे तो मुझे बहुत बुरा लगेगा।”
माँ ने हैरत से पूछा, “क्यों ?”
डबडबाई आँखों से राहुल ने कहा, “मुझे लगेगा कि पापा के भी हाथ नहीं हैं। वे काट दिए गए हैं।”
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– ज्ञानदेव मुकेश, 301, साई हाॅरमनी अपार्टमेन्ट, अल्पना मार्केट के पास,
न्यू पाटलिपुत्र काॅलोनी, पटना-800013

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