मुझे चार लघुकथाओं को पढ़ने और उनकी संरचना पर चिन्तन करने का अवसर मिला। वे लघुकथाएँ हैं-1-उतार/सुकेश साहनी , 2-संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण/ सुषमा गुप्ता, 3- नवजन्मा/ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, 4-अनमोल ख़ज़ाना-श्याम सुन्दर अग्रवाल। आशा करती हूँ कि इनके कथ्य और शिल्प पर मेरे विचार आपको पसन्द आएँगे।। आशा करती हूँ कि इनके कथ्य और शिल्प पर मेरे विचार आपको पसन्द आएँगे।
1-उतार/सुकेश साहनी
सुकेश साहनी जी की लघुकथा ‘उतार’ समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य की एक प्रतिनिधि रचना है, जो न केवल गिरते भूजल स्तर की पर्यावरणीय चिंता को स्वर देती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के सूखते स्रोतों और ग्रामीण संस्कृति के क्षरण का भी सूक्ष्म चित्रण करती है। इस कथा की एक बहुत विशेषता इसका शिल्प भी है।
‘डायरी शैली’ में लिखी गई यह कथा मात्र एक कहानी न बनकर समय के दस्तावेज़ में बदल गई है। लेखक ने 1966 से 2006 तक के चार दशकों के अंतराल को पाँच अलग-अलग पड़ावों में बाँटकर विकास की उस विडंबना को उजागर किया है, जहाँ तकनीक तो बढ़ी है पर संतोष, तृप्ति और सामूहिकता जैसी भावनाएँ घटती चली गई हैं।
भाषा की दृष्टि से सुकेश साहनी जी ने अत्यंत सरल, बोलचाल वाली सहज भाषा का प्रयोग किया है जो लघुकथा का अनिवार्य गुण भी है। ‘लबालब’, ‘चुआन’, ‘बिला गई’ और ‘चप्पे-चप्पे’ जैसे आंचलिक और ठेठ शब्दों का प्रयोग कथा को मिट्टी की सोंधी गंध और यथार्थ से जोड़ता है। मिस्त्री के माध्यम से लेखक ने जो तकनीकी विवरण दिए हैं, वे कथा में विश्वसनीयता उभारते हैं। कथा की भाषा में एक मद्धम सी उदासी भरी टीस है, जो अंत तक आते-आते एक चीख में बदल जाती है। कथा का समापन आते आते, “चुआन: जाने कहाँ बिला गई है!” लेखक एक ऐसी मार्मिक व्यंजना पैदा करता है जो पाठक को देर तक सोचने पर विवश कर देती है। यह केवल पानी के गायब होने की सूचना नहीं है, बल्कि उस जीवन-रस और संवेदना के अंत की घोषणा भी है जो कभी समाज को जोड़कर रखती थी।
शिल्प के स्तर पर ‘समय का अंतराल’ इस कथा की सबसे बड़ी शक्ति है। डायरी के पन्ने पलटते हुए हम गहराई के बढ़ते आँकड़ों के साथ साथ,मिस्त्री की घटती सामाजिक हैसियत और बढ़ती लाचारी भी महसूस करते हैं। 1966 में जो मिस्त्री नायक है और जिसके परामर्श पर गाँव उत्सव मनाता है, वह 2006 तक आते-आते ‘सूखा कुआँ’ कहलाने लगता है और दो रोटियों के लिए जलील होता है। कथा का शीर्षक ‘उतार’ बहुआयामी है। यह शब्द उतार केवल भूजल का नहीं है, यह नैतिक मूल्यों, मानवीय गरिमा और सामुदायिक सद्भभाव का भी है। लेखक ने कथा में प्रतीकों का अद्भुत उपयोग किया है। कुआँ जहाँ सांझा संस्कृति का प्रतीक था, वहीं बोरिंग सैट व्यक्तिगत स्वार्थ और ‘मुट्ठी में पानी करने’ की होड़ का प्रतीक बनकर उभरा है।
यह रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैजितनी अपने रचना काल में रही होगी ।आज जब दुनिया ‘तीसरे विश्व युद्ध’ की आशंका पानी के लिए कर रही है, तब यह कहानी हमें उस जड़ तक ले जाती है जहाँ समस्या की शुरुआत हुई थी। यह कथा मशीनीकरण और पूंजीवाद के उस कुरूप चेहरे को बेनकाब करती है, जहाँ ठेकेदार और रसूखदार लोग प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं और पारंपरिक ज्ञान रखने वाला कारीगर हाशिये पर धकेल दिया गया है। जातिगत राजनीति और परिवार के बँटवारे का जो चित्रण 1976 और 2006 की डायरी में मिलता है, वह आज के ग्रामीण भारत की कड़वी हकीकत है। सुकेश साहनी जी ने बड़ी कुशलता से यह दिखाया है कि कैसे ‘विकास’ की अंधी दौड़ ने हमें अपनी ही जड़ों से काटकर एक रेतीले भविष्य की ओर धकेल दिया है। कुल मिलाकर ‘उतार’ अपनी कसावट भरी शैली और मर्मभेदी कथ्य के कारण एक ऐसी कालजयी लघुकथा है, जो पर्यावरण और मनुष्यता के अंतर्संबंधों को नई दृष्टि प्रदान करती है।
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2-संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण/ सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत लघुकथा ‘संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण’ समकालीन समाज की उस विद्रूपता का अत्यंत मार्मिक और व्यंग्यात्मक चित्रण है, जहाँ मानवीय भावनाएँ अनुभूति के स्तर से गिरकर मात्र प्रदर्शन की वस्तु बन गई हैं। रचनाकार ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में आज के वर्चुअल युग और यथार्थ के बीच की गहरी खाई की पड़ताल की है। इस रचना का कथ्य आज के उस खोखलेपन को उजागर करता है जहाँ रिश्तों की गरमाहट का स्थान सोशल मीडिया के ‘नोटिफिकेशन’ ने ले लिया है।
शिल्प की दृष्टि से देखें तो इस लघुकथा की संरचना डायरी शैली के काफी करीब है। यदि इसे एक नवीन शैली ‘टाइमलाइन’ का नाम दिया जाए तो भी अनुचित न होगा।
तिथियों 2 मार्च, 3 मार्च, आदि का प्रयोग कथानक को एक गति देता है और पाठक को सीधे पात्र के न्यूज़ फीड से जोड़ता है। यह शैली इसलिए भी प्रभावी है क्योंकि यह घटनाओं को उसी क्रम में प्रस्तुत करती है जैसे हम आम तौर पर किसी की सोशल मीडिया प्रोफाइल पर देखते हैं। कोष्ठक में दी गई दृश्य-सामग्री जैसे अस्पताल की फोटो, थका हुआ चेहरा, या पंडितों को भोजन परोसना, पटकथा जैसी दृश्यता उत्पन्न करती है। यह तकनीक पाठक को यह दिखाने में सफल होती है कि पात्र किस तरह अपनी छवि को लेकर सचेत है और हर दुखद क्षण का जैसे इवेंट मैनेजमेंट कर रहा है।
भाषा के स्तर पर यह रचना अत्यंत सहज होते हुए भी बेहद मारक है। इसमें दो प्रकार की भाषा का द्वंद्व स्पष्ट दिखाई देता है। पहली भाषा वह है जो सोशल मीडिया स्टेटस के लिए प्रयुक्त हुई है,जिसमें बनावटी भावुकता, दार्शनिक शब्दावली और विनम्रता का आवरण है जैसे “मेरा संसार लुट गया”, “ईश्वर मुझ पर रहम करो” दूसरी भाषा वह है जो यथार्थ के धरातल पर बोली जा रही है जिसमें रूखापन, झुंझलाहट और अनादर है (जैसे- “बहुत व्यस्त हूँ मैं”, “तामझाम फैला है”)। शब्दों का यह चयन पात्र के दोहरे चरित्र को बिना किसी अतिरिक्त व्याख्या के पूरी तरह उघाड़कर रख देता है। एक ओर संवेदनशील आज्ञाकारी बेटा और दूसरी तरफ़ अपनी ही मां को झिड़कने वाला पुत्र, दोनों के बीच का अंतर केवल संवादों के माध्यम से स्थापित किया गया है।
कथ्य की गहराई में उतरें तो यह लघुकथा केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की त्रासदी को सामने लाती है। नायक द्वारा पिता की मृत्यु के बाद के कर्मकांडों को तामझाम कहना उसकी आंतरिक संवेदनहीनता को दर्शाता है, किंतु पराकाष्ठा यह है कि उसी तामझाम की तस्वीरों से उसे समाज (आभासी दुनिया) में प्रशंसा मिल रही हैं। रचना का चरमोत्कर्ष पाठक को स्तब्ध कर देता है। जब बेटा माँ की कराह और दवा की मांग को ठुकरा देता है, लेकिन अगले ही पल उसी माँ की बीमारी को ढाल बनाकर सहानुभूति बटोरने के लिए नया स्टेटस अपडेट करता है। यह स्थिति भयभीत करती है,आज का समाज किस ओर जा रहा है!
यह स्पष्ट है कि उसके लिए माँ की पीड़ा का अपना कोई मूल्य नहीं है, वह केवल ‘कंटेंट’ मात्र है।
इस लघुकथा में ‘कमेंट्स’ का ज़िक्र एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक संकेत है। नायक द्वारा संवेदनशील आज्ञाकारी बेटे के खिताब को पढ़कर प्रसन्न होना यह सिद्ध करता है कि उसकी संवेदनाओं का स्रोत आंतरिक न होकर कमेंट्स और लाइक्स है। वह दु:ख महसूस नहीं कर रहा, वह दु:ख का अभिनय कर रहा है ताकि उसकी डिजिटल टी.आर.पी. बनी रहे।
रचना अपने संक्षिप्त कलेवर में एक बहुत बड़े सामाजिक सत्य को समेटे हुए है। इसके कसे हुए घटनाक्रम सीधे पाठक की चेतना पर प्रहार करते हैं। यह लघुकथा एक चेतावनी की तरह है जो हमें आईना दिखाती है कि कनेक्टिविटी के दौर में हम वास्तविक आत्मीयता से कितने दूर हो गए हैं। संवेदनाओं का यह बाजारीकरण और दु:ख का उत्सवीकरण आज के दौर की बहुत बड़ी विडंबना बन गया है।
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3- नवजन्मा/ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी द्वारा रचित लघुकथा ‘नवजन्मा’ हिंदी लघुकथा साहित्य की एक उत्कृष्ट बानगी है। यह रचना न केवल सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करती है, बल्कि अपनी विशिष्ट शिल्पगत बारीकियों के माध्यम से पाठक की संवेदनाओं को भी झकझोरती है। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लघुकथा के मानकों का बड़ी शालीनता से पालन करती चली है बिना किसी आडंबर और दिखावे के। नियम का पालन करने के लिए रचना को नीरस अथवा बनावटी होने की कतई आवश्यकता नहीं है सहजता बनाए रखने के साथ साथ बड़ी सरलता से सरलता का निर्वहन हुआ है। इसका शीर्षक कथा का प्रमुख आकर्षण है, जो अपने भीतर कथा का संपूर्ण सार समेटे हुए है,जहाँ एक ओर यह नवजात कन्या के जन्म का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर यह जिलेसिंह के भीतर एक प्रगतिशील और मानवीय सोच के ‘नवजन्म’ को भी रेखांकित करता है। इस लघुकथा का शिल्प अत्यंत प्रभावोत्पादक है। लघुकथा की सफलता उसकी यानी संश्लिष्टता में निहित होती है और यहाँ लेखक ने कम से कम शब्दों में एक बहुत बड़े फलक की कहानी कह दी है।
कथा का प्रारंभ एक भारी सन्नाटे और उदासी के साथ होता है, जो पाठक के मन में जिज्ञासा और तनाव उत्पन्न करता है।
इस कथा की भाषा की बात करें तो यह अत्यंत सहज, प्रवाहमयी और परिवेश के अनुकूल है। कथा में आंचलिक भाषा के प्रयोग ने पात्रों को जीवंत बना दिया है। ‘सिर बँध ग्या’, ‘इभी से’, ‘नेग मारा गया’ और ‘जापा’ जैसे शब्द आंचलिक परिवेश की यथार्थपरक गूँज पैदा करते हैं। लघुकथा की दूसरी बड़ी विशेषता संवाद अत्यंत छोटे लेकिन अर्थपूर्ण हैं। दादी और बहन के संवाद जहाँ समाज की संकीर्णता और स्वार्थ को उजागर करते हैं, वहीं जिलेसिंह की चुप्पी उसकी आंतरिक बेचैनी और बाद में उसका गर्जनापूर्ण ‘बजाओ!’ शब्द उसके दृढ़ निश्चय को प्रकट करता है। भाषा में बिंबों का प्रयोग बहुत सधा हुआ है, जैसे माथे पर लकीरों का खिंचना क्रोध और द्वंद्व का बिंब है, तो ‘उजाले का सैलाब’ मन की शांति और आनंद का प्रतीक है।
शिल्प की दृष्टि से इस लघुकथा में प्रतीकों का चयन बहुत सटीक है। ‘तुर्रेदार पगड़ी’ जिसे जिलेसिंह शादी-ब्याह जैसे बड़े मौकों पर बाँधता था, उसे बेटी के जन्म पर पहनना एक क्रांतिकारी प्रतीक है। पगड़ी अक्सर पुरुष के अहंकार या खानदानी इज्जत से जोड़ी जाती है, जिसे माँ ‘किसी निकम्मे के पैरों में रखने’ की बात कर रही थी। लेकिन जिलेसिंह उसी पगड़ी को पहनकर बेटी के उत्सव में नाचता है और यह संदेश देता है कि बेटी सम्मान को कम नहीं करती बल्कि वह स्वयं एक उत्सव है। इसी प्रकार ‘ढोल’ जो पारंपरिक रूप से केवल बेटों के जन्म पर बजाया जाता था, यहाँ उस परंपरा को तोड़कर बेटी के लिए बजवाया गया है। यह शिल्पगत चुनाव समाज की जड़ मान्यताओं पर एक करारी चोट है।
प्रस्तुति की दृष्टि से हिमांशु जी ने मनोवैज्ञानिक चित्रण पर विशेष बल दिया है। पात्रों का व्यवहार उनकी सोच का आईना है। माँ की चुप्पी जहाँ भविष्य के भय और सामाजिक दबाव को दिखाती है, वहीं मनदीप का अपनी आँखें पोंछना और अपराध बोध से मुँह मोड़ना स्त्री की उस नियति को दर्शाता है जहाँ वह स्वयं को ही बेटी के जन्म के लिए अपराधी मानने लगती है। इस लघुकथा का अंत अत्यंत प्रभावशाली है। लेखक ने जिलेसिंह के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज में बदलाव के लिए शब्दों से अधिक कार्यों की आवश्यकताहोती है। जब वह ढोल की थाप पर नाचता है, तो वह केवल एक नृत्य नहीं होता, बल्कि वह सदियों से चले आ रहे मौन और शोक को तोड़ने की एक उद्घोषणा होती है।
‘नवजन्मा’ लघुकथा अपनी सुदृढ़ भाषा, मारक शैली और सधे हुए शिल्प के कारण एक श्रेष्ठ रचना बन पड़ी है। लेखक ने बिना किसी उपदेशात्मकता के पाठक को सोचने पर विवश कर दिया है। यह कथा सिद्ध करती है कि एक छोटी सी घटना किस प्रकार एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की संवाहिका बन सकती है। इसकी प्रस्तुति इतनी सघन है कि पाठक जिलेसिंह के साथ उस आँगन में खड़ा महसूस करता है और अंत में ढोल की आवाज़ के साथ एक नई आशा का अनुभव करता है। इस लघुकथा की प्रासंगिकता बेजोड़ है,यह अपने लेखन काल में जितनी प्रासंगिक रही होगी उतनी ही आने वाले समय में ही रहेगी। जब तब समाज में एक भी बेटी का तिरस्कार होता रहेगा तब तक यह कथा अपनी संपूर्णता के साथ खड़ी दिखाई देगी।
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4-श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथा ‘अनमोल ख़ज़ाना’ मानवीय संवेदनाओं की एक ऐसी मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है, जो भौतिकतावाद के चश्मे को उतारकर भावनाओं के धरातल पर जीवन की व्याख्या करती है। यह कथा इस सत्य को उद्घाटित करती है कि किसी वस्तु का मूल्य उसकी बाज़ारू कीमत से नहीं, बल्कि उससे जुड़ी स्मृतियों और ममता के सरोकारों से बहुत अधिक बढ़ जाता है।
कथा के शिल्प पर दृष्टि डालें, तो लेखक ने बहुत ही संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली ढंग से जिज्ञासा का सृजन किया है। अलमारी, लॉकर, चाँदी की छोटी डिबिया और उस पर लगा ताला,ये सभी तत्त्व पाठक के मन में यह उत्सुकता जगाते हैं कि डिबिया के भीतर अवश्य ही कोई बहुमूल्य रत्न या स्वर्ण मुद्राएँ होंगी। यही जिज्ञासा कथा के नायक के माध्यम से पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। कहानी का शिल्प एक रेखीय गति से चलता है, जहाँ आरंभ में एक रहस्य है, मध्य में उस रहस्य को जानने की व्याकुलता और अंत में एक ऐसा भावनात्मक विस्फोट है, जो पाठक को निशब्द कर देता है।
लघुकथा की भाषा-शैली अत्यंत सहज, सरल और प्रवाहमयी है। लेखक ने तत्सम और तद्भव शब्दों का संतुलित प्रयोग करते हुए एक मध्यमवर्गीय परिवेश को जीवंत कर दिया है। ‘ऐतिहासिक महत्त्व’, ‘मृत्युशय्या’, ‘उत्सुकता’ जैसे शब्दों का प्रयोग जहाँ वर्णन को गंभीरता देता है, वहीं ‘खनकने की आवाज’, ‘पुरानी थैली’ जैसे बिम्ब कथा को यथार्थ के करीब लाते हैं। प्रथम पुरुष में लिखी गई यह कथा सीधे पाठक के हृदय से संवाद करती है, जिससे नायक की उत्सुकता और बाद में उसकी आत्मग्लानि व श्रद्धा पाठक को अपनी सी लगने लगती है।
इस लघु रचना का सशक्त पक्ष है बेटी के प्रति माँ का स्नेह और कोमल भावनाएँ। माँ को जब लगता है कि उसका अंतिम निकट ही है, तो उसे चिंता होती है कि उसके पास अपनी बेटी को देने के लिए कोई जागीर या ज़ेवर नहीं है, वह अपनी दरिद्रता के बीच भी अपनी संतान को कुछ न कुछ देने की व्याकुलता रखती है। वे आठ सिक्के महज दस रुपये नहीं; बल्कि एक माँ के जीवन भर की संचित ममता और उसके आशीर्वाद का मूर्त रूप हैं। “ले बेटी! तेरी माँ के पास तो बस यही है देने को” -यह वाक्य मातृत्व की उस विवशता और अपार प्रेम को दर्शाता है, जहाँ एक माँ अपने अंत समय में भी बेटी को खाली हाथ विदा नहीं करना चाहती।
पत्नी के लिए वह चाँदी की डिबिया और उसमें रखी फटी-पुरानी थैली इसलिए ‘अनमोल ख़ज़ाना’ है; क्योंकि उसमें उसकी माँ की अंतिम साँसें और स्पर्श सुरक्षित हैं। वह इसे किसी को छूने नहीं देती; क्योंकि वह उन सिक्कों को बाज़ार की मुद्रा नहीं; बल्कि अपनी माँ का सान्निध्य मानती है। यहाँ भावनाओं का अतिरेक इतना सूक्ष्म है कि जब पति उन सिक्कों को देखता है, तो उसकी जिज्ञासा एक गहन आदर में बदल जाती है।
कथा का संदेश आज के दौर में अत्यंत अनिवार्य है। हम अक्सर वस्तुओं को उनके आर्थिक मूल्य से तौलते हैं; लेकिन यह कहानी सिखाती है कि ‘कीमत’ और ‘मूल्य’ में गहरा अंतर होता है। दस रुपये का आर्थिक मूल्य शून्य के बराबर हो सकता है; लेकिन यदि वे माँ के काँपते हाथों से मिले हों, तो वे दुनिया के किसी भी कोहिनूर से अधिक कीमती हो जाते हैं।
लेखक ने अंत में नायक के व्यवहार में जो परिवर्तन दिखाया है, वह प्रशंसनीय है। नायक द्वारा उन सिक्कों को वापस उसी सावधानी से रखना कि ‘किसी को हल्की-सी रगड़ न लग जाए’, उसके भीतर जगे उस बोध को दर्शाता है कि वह अब उन सिक्कों को ‘करेंसी’ नहीं, बल्कि ‘पवित्र अमानत’ मान रहा है। यह हृदय- परिवर्तन ही इस कथा की वास्तविक सफलता है।
‘अनमोल ख़ज़ाना’ सूक्ष्म संवेदनाओं की एक उत्कृष्ट रचना है। यह बेटी की अपने मायके और माँ के प्रति अटूट श्रद्धा को रेखांकित करती है। यह कथा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य के पास सबसे बड़ा धन उसकी भावनाएँ हैं और जो इन भावनाओं को सहेज कर रखता है, वही वास्तव में सबसे धनी है। श्याम सुन्दर अग्रवाल जी ने बहुत कम शब्दों में जीवन के एक विराट सत्य को पिरो दिया है, जो पाठक के मन पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है।
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