गोकुल सोनी
1-चीटर
सुमेधा हनुमान जी को चना-चिरोंजी का प्रसाद चढ़ाकर लौटी तो दालान की एक मात्र टूटी बेंच पर एक सूट-बूट पहने भद्र पुरुष को बैठे पाया।
नमस्ते करके जैसे ही वह घर के अंदर जाने लगी, तो उन्होंने रोका, बेटी- ‘‘सुमेधा’ तुम्हारा ही नाम है?’’
बोली- ‘‘जी अंकल।’’
वे तपाक से बोले- बेटा, बहुत बहुत बधाई, तुमने रिक्शा वाले की बेटी होकर भी हायर सेकेंडरी बोर्ड में राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, यह तुमको ही नहीं हम सबके लिए गौरव की बात है।
बेटी, मैं ‘प्रतिभा कोचिंग इंस्टिट्यूट’ से आया हूँ, तुम्हारी भलाई करने।
सुमेधा को अचानक याद आया कि उसके पापा कितने गिड़गिड़ाए थे कि मेरी बेटी को कोचिंग में एडमिशन दे दीजिए, वह अपने सपने पूरे करना चाहती है। जैसे-तैसे बड़ी मेहनत से मैं आधी फीस ही जोड़ पाया हूँ, तब डायरेक्टर साहब ने कितने बुरे तरीके से डाँटकर भगाया था, चलो भागो यहाँ से, हम लोग यहाँ कोई चैरिटी करने नहीं बैठे हैं। जब पूरी फीस हो तभी आना।
पिताजी की बेइज्जती, आज भी वह भूली नहीं है। पिताजी की आँखों में आँसू भर आए थे, तब उसने पिताजी से वायदा किया था कि आप दुखी ना हों, मैं आपको बगैर कोचिंग लिये अच्छे नंबर लाकर दिखाऊँगी। आज ये अचानक मेरी कौन सी भलाई करने आ गए?
उसका ध्यान भंग करते हुए वे बोले- ‘‘बेटी, मैं तुम्हारे फायदे का एक प्रस्ताव लेकर आया हूँ। हम तुम्हारी फोटो अखबार में देंगे और लिखेंगे कि तुमने अपनी परीक्षा की पूरी तैयारी हमारी ‘प्रतिभा कोचिंग इंस्टिट्यूट’ की मदद से की है, तुम भी प्रेस वालों को यही बयान देना। इसके बदले में हम तुमको एक लाख रुपये देंगे।’’
सुनकर अनपढ़ माँ खुश, पिता उदासीन; पर किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे।
उसने दृढ़ता से कहा- ‘‘नहीं अंकल, हम लोग गरीब जरूर हैं, पर झूठे और चीटर नहीं हैं।’’
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2-स्वयंवर
जब प्रज्ञा ने देखा, कि फोन आने के बाद, पिताजी तनाव में आ गए हैं, तो बोली-‘‘पापा जी मुझे बताइए न कि फोन पर कौन था? और क्या बात हुई? जो आप इतने तनाव में दिख रहे हैं। मैं तो आपकी बेस्ट फ्रेंड हूँ ना।’’
पिता जी बोले- ‘‘अब क्या बताऊँ बेटा, परसों जो लड़के वाले तुमको देखने आने वाले थे, उनका फोन आया था। कह रहे थे कि लड़का बहुत व्यस्त रहता है। उसको छुट्टी लेने में दिक्कत आ रही है। शादी के लिए छह जगह से प्रस्ताव आए हैं। उन्होंने सभी को एक साथ, हैदराबाद के एक होटल में, लड़कियों को लेकर बुलाया है। कह रहे थे कि आप भी अपनी लड़की को लेकर वहीं आ जाइए। वहीं सभी को एक साथ लड़का देख लेगा और बातचीत करके पसंद भी कर लेगा। क्या करें एकाएक रिजर्वेशन मिलना तो संभव नहीं है।’’
प्रज्ञा बोली- ‘‘बस ! इतनी सी बात! लाइए फोन, इस समस्या को तो मैं चुटकियों में हल करती हूँ।’’
पिता पूछते ही रह गए कि आखिर तेरा इरादा क्या है; पर उसने पिता का फोन अपने हाथ में लेकर तुरंत उसी नंबर पर वापस लगाया और हेलो की आवाज सुनते ही शुरू हो गई-‘‘आदरणीय अंकल जी, मैं भोपाल से प्रज्ञा बोल रही हूँ। पापा ने बताया कि आपने हैदराबाद के एक होटल में अन्य पांच लड़कियों के के अलावा मुझे भी बुलाया है। इस पर मेरा निवेदन है कि यदि यह सभी का ‘स्पॉट इंटरव्यू’ है, तो मुझे नौकरी की आवश्यकता नहीं है। यदि यह ‘स्वयंवर’ है, तो स्वयंवर तो आदि काल से लड़कियाँ रचाती आई हैं। लड़के स्वयंवर कब से रचाने लग गए? माफ कीजिए मैं इस स्वयंवर में नहीं आ पाऊँगी’’, कहकर फोन रख दिया।
बोली- लो पिताजी झंझट खत्म। अब तो हँस दो। और दोनों जोर से ठहाका लगाकर हँसने लगे।
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3–एरिया
सुन्दर, पीली-पीली, स्वादिष्ट दूध से भरी ‘खिरनी’ का ठेला उसने लगाया ही था, कि एक आदमी रसीद कट्टा लेकर सामने खड़ा हो गया। उसने पचास रुपये की रसीद काटते हुए कहा – “बैठकी फीस” हम नगर पालिका से हैं उसने कहा- भाई साहब अभी तो बोहनी भी नहीं हुई।
वो बोला- यह तो देना ही पड़ेगी। इस नगर पालिका के ‘एरिये’ में जो भी दूकान लगाता है, उसे देना ही पड़ती है और रुपये लेकर, रसीद देकर चलता बना। तब तक काफी ग्राहक आ गए। सभी लोग जल्दी-जल्दी की रट लगा रहे थे। अचानक एक पुलिस वाला ठेले पर डंडा मारकर बोला- क्यों रे कहाँ का रहने वाला है। उसने एक मुड्डी खिरनी उठाई और खाते हुए बोला- निकाल सौ रुपये। वह कुछ ना-नुकुर करता इसके पहले ही वह ठेले पर डंडा मारते हुए बोला- यह मेरे थाने का ‘एरिया’ है, निकाल जल्दी। घबराकर उसने सौ का नोट उसके हाथ पर रख दिया और ग्राहकों को खिरनी तौलने लगा। अंत में भीड़ छटने पर उसका ध्यान उस ग्राहक पर गया, जो बिलकुल शांत भाव से पीछे खड़ा था, गंभीरता से और धैर्यपूर्वक। उसने भी मन ही मन उसकी प्रशंसा की, कि कितना शांत और अच्छा है यह आदमी। अपने से बाद में भी आये दूसरे ग्राहकों को फल लेने दे रहा है और कोई जल्दी नहीं कर रहा। जब सभी ग्राहक चले गए, तो उसने बड़ी विनम्रता से पूछा आपको कितनी चाहिए? वह गुस्से से बोला “खिरनी नहीं चाहिए मूर्ख, हफ्ता चाहिए हफ्ता, ला निकाल बिक्री का दस परसेंट, नहीं तो इतने जूते मारूंगा कि गिन भी नहीं पाएगा। मैं इस एरिये का गुंडा हूँ। ये “एरिया हमारा है”। बगैर मुझे हफ्ता दिए कोई यहाँ धंधा नहीं कर सकता, हफ्ता वसूली पर निकला हूँ। लगता है इस एरिये में तू नया है। फल वाला एक दम डर गया और उसने मिमियाते हुए कमजोर सा प्रतिवाद किया- भाई साहब अभी थोड़ी देर पहले भी दो लोग यही कह रहे थे, कि “एरिया हमारा है” और रुपये भी ले गये थे? फिर घबराते हुए कुछ रुपये निकालकर उसके हाथ पर रख दिए और सोचने लगा- आखिर एरिया है किसका?
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4-कारगिल
कारगिल में शहीद हुए जवानों के परिवारों की सहायतार्थ, सारा देश एकजुट हो गया। कई माताओं-बहनों ने अपने जेवर दान कर दिए। कर्मचारियों ने अपने वेतन में से एक दिन के वेतन की कटौती करवाकर ‘प्रधान मंत्री रक्षा कोष’ में भेजी। जिस पर जो बन रहा था अपना-अपना योगदान दे रहा था।
मुझे भी प्रेरणा मिली। मैंने अपने बेटे बिट्टू से कहा बेटा- तू भी अपनी गुल्लक फोड़ दे, पर अभी नहीं। शाम को पत्रकार चाचा के आने के बाद।
बिट्टू गुल्लक टूटने की बात पर रोने लगा। मैंने समझाया, बेटा- अभी तू छोटा है। तू नहीं जानता कि इससे कितना फायदा होने वाला है। गुल्लक में तो मुश्किल से 50-60 रुपये होंगे, मैं तुझे एक सौ का नोट दूँगा।
बिट्टू समझदार बाप का समझदार बेटा था, सो जल्दी मान गया।
शाम को मेरा पत्रकार दोस्त आया। मैंने उसको बताया कि मेरा तो पूरा परिवार ही देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत है, यहाँ तक कि छोटा बिट्टू भी जिद कर रहा है कि उसकी गुल्लक तोड़कर वर्षों की जमा राशि कारगिल के शहीदों के परिवारों की सहायतार्थ भेजी जाए।
धूमधाम से गुल्लक फोड़ी गई। गुल्लक में 64 रुपये 75 पैसे निकले। अगले ही दिन अखवार में बिट्टू, मेरा और मेरे परिवार का फोटो और मेरा इंटरव्यू बड़े विस्तार से छपा था, और देश भक्ति पूर्ण विचारों की भूरि-भूरि प्रशंसा छपी थी। समाज में मुझे विशेष सम्मान की नजरों से देखा जाने लगा। बिट्टू को उसके स्कूल ने सम्मानित भी किया।
हाँ एक उलझन जरूर हो गई। उस पत्रकार दोस्त ने देश की रक्षा और देश-प्रेम पर एक लंबा-चौड़ा भाषण क्या दिया, कि बिट्टू मिलिट्री में जाने की जिद ठान बैठा।
फिलहाल मैंने बिट्टू को दो चाँटे मारकर, उसकी देशभक्ति का भूत उतार दिया है, और अपने उस पत्रकार मित्र से सदा के लिए सम्बन्ध तोड़ लिए हैं, जिसने बिट्टू को मिलिट्री में जाने की प्रेरणा दी थी।
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