प्रदीप मिश्रा
1- ईमान
डाक्टर वर्मा की क्लीनिक में बैठा वह उनसे हिसाब-किताब में व्यस्त था कि तेरह-चौदह साल का एक लड़का झिझकते हुए अन्दर आया और उनकी ओर मुखातिब होकर बोला, ‘‘ डाक्टर साहब… बाहर मोटर साइकिल के पास ई रूपया पड़ा मिला है… लीजिए…‘‘
सौ-सौ रुपये के पॉच नोट! एकदम कड़क। अचम्भित हो डॉक्टर वर्मा ने पूछा, ‘‘ शर्मा जी, देखिए कहीं आपका रुपया तो नही गिर गया…‘‘
‘‘ नही, साहब… ये रुपये मेरे नही है…‘‘ जेब चेक कर वह एक झटके में सच बोल गया। पर डाक्टर साहब को बड़े इत्मीनान से नोट जेब के हवाले करते देख वह अन्दर ही अन्दर झुँझला उठा… लगा जैसे सच बोलकर उसने बेहद बेवकूफाना हरकत कर दी है। एक सच के एवज में हुआ पाँच सौ रुपये का त्वरित नुकसान उसे कचोट गया।
‘‘… देख रहे है, शर्मा जी! हम पैसे वालों की दुनिया से ‘ईमान’ नाम की जो चीज कब की लुप्त हो चुकी है, वह आज भी कहीं न कही जिन्दा है, लेकिन सिर्फ उन्ही लोगो के पास, जिनकी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नही है…‘‘
एकबारगी महसूस हुआ जैसे कुशल मनोचिकित्सक की भाँति डाक्टर साहब ने उसकी मनःस्थिति पढ़ ली है। वह कुछ झेंप -सा गया। इससे उबरने के उपक्रम में वह इधर-उधर देखने लगा, तो निगाह क्लीनिक से निकल रहे उस लड़के पर टिक गई…फटी-पुरानी बनियान व नेकर पहने उस मैले कुचैले लड़के की आँखो में समाई ईमानदारी की दुलर्भ चमक ने उसे शर्मसार कर दिया था।
2-समोसे
ट्रेन की जनरल बोगी में एक युवक समोसे से भरी थाल लेकर घुसा। जून की उमस भरी चिपचिपी गर्मी में यात्रियों की रेलमपेल थी। उसे लगा कि अच्छी आमदनी हो जायगी।
‘‘…ताजे गरम समोसे…. बोलिए भाय……बहन जी…..‘‘ उसने सम्भावित ग्राहकों का ध्यान खीचने का प्रथम प्रयास किया ही था कि सिर मुँडाते ही ओले पडे़….
‘‘हुंह…….समोसे……इन समोसे को तो वही खाएगा, जिसे मरना होगा…..डायरिया से….‘‘ खिड़की के बगल मे बैठी संभ्रात सी दिखने वाली महिला ने कुछ इस तरह से समोसे के साथ विक्रेता पर भी हेय दृष्टि डालते हुए कहा, जैसे कि पहले से ही ये प्रतिक्रिया देने को बिल्कुल तैयार बैठी हो।
प्रत्युत्तर मे वह कुछ कहते-कहते रुक गया। लेकिन तब तक उस महिला का व्यंग्य-वाण लक्ष्य को भेद गया था। विधिवत् अधिकतर यात्रियों के चेहरे बिगड़ गए मानो उसके थाल में समोसे न होकर काकरोच भरे पडे हों। महिला की स्पष्ट चेतावनी के चलते कुछ भूखे यात्रियों को तो इस संकोच में मन मारना पड़ा कि कही उनकी गिनती दुस्साहसी पेटुओं में न होने न लगे।
बेहद निराश हो वह डिब्बे से उतर कर प्लेटफार्म पर आ गया। कुछ सोचकर वह महिला के पास वाली खिड़की पर पहुँच गया…..
‘‘बहिनजी, भीख नहीं दे सकती, तो कम से कम तुम्बी (भीख माँगने का पात्र) तो न फोड़िए………. उम्मीद थी कि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग एक गरीब के संघर्ष का सम्मान करेंगे, पर आपने तो उसके पेट में लात मारकर अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध कर दी……. ये मेरा ही नही, इस देश का भी दुर्भाग्य है कि एम0ए0 पास होकर भी समोसे बेच रहा हूँ……. हाँ, रही बात समोसे खाकर मर जाने की, तो पिछले कई वर्षो से हर दिन जो समोसे नहीं बिक पाते, उस मेरे बच्चे खाते हैं…. पर उनमें से तो कोई भी आजतक नहीं मरा…. बहिन जी ! इस देश में लोग भूख से मरते है, कुछ खाने से नहीं….‘‘ बडी विनम्रता से अपनी बात कहकर वह दूसरे डिब्बे की ओर बढ़ गया था।
3-नक्शा
किराये के मकान मे जीवन के अधिक्तर सुख-दुख काट देने वाले क्लर्क पिता ने रिटायरमेन्ट की दहलीज पर कदम रखते-रखते अपना सबसे बडा स्वप्न पूरा कर लिया-एक अदद घर का सपना ! व्यस्त शहर से हटकर एक कम बस्ती वाली जगह मे उसने बड़े-बड़े चार हवादार कमरे, आँगन बरामदे वाला ‘सपनो का महल‘ बनवा कर खडा कर दिया। भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक कमरा अपने लिए और शेष तीन तीनो बेटो के लिए। भले इसके एवज मे उसकी जीवन भर की जमा पूँजी होम हो गयी, फिर भी वह बेहद संतुष्ट था। अपनी छत के नीचे लेटकर पहली बार उसे जो गहरी-निर्मुक्त नीद आयी, वो अब तक उसके लिए दुर्लभ थी।
समय बीता। परिवार बढा। लड़के बाल-बच्चेदार हो गए। पत्नी बहुत पहले स्वर्ग सिधार चुकी थी। धीरे-धीरे उसके मकान के आस-पास घनी बस्ती बस गई। हवादार कमरो मे अब ठंडी हवा के झोकों का आना थम गया। गर्मी के दिनो मे बेहद उमस रहने लगी।
एक दिन बड़ा बेटा अपने कमरे के लिए ए.सी. खरीद लाया। फिर दोनों भाइयों ने भी बडी तत्परता से बड़े का अनुसरण किया, लगा, जैसे इसके लिए घात लगाये बैठे थे।
………… अब अपने कमरे मे गर्म हवा उगलते पंखे के नीचे लेटा पिता अधेडबुन में है। वह समझ नही पा रहा था कि आठ साल पहले नगरपालिका से तो उसने एक मकान का नक्शा पास कराया था, फिर आज उसमे से तीन-तीन मकान कहाँ से निकल आए। उस रात वह बस करवट ही बदलता रहा और सो नही पाया। आठ साल बाद उसे एक बार फिर महसूस हुआ, जैसे वह किराये के मकान मे आ गया हो।
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4-सुख के मायने
अखबार में ‘सातवें वेतन आयोग’ की रिपोर्ट लागू होने की खबर पढ़ मैं रोमांचित हो उठा। ऑफिस जल्द पहुँच जाने की आकुलता बढ़ गई। आज ऑफिस का पूरा दिन सहकर्मियों के साथ वेतन, टी.ए.,डी.ए. आदि में वृद्धि के हिसाब-किताब में बीतना था। इस परिचर्चा के बीच-बीच मे कोल्डड्रिंक, पैटीज का अतिरिक्त दौर चलना तो लाजमी था । जल्दी-जल्दी तैयार हो निकला, तो मेरा मन-मयूर नाच रहा था। आकाश में भी खूब बदली छाई थी। हल्की बूँदाबाँदी हो रही थी। आधे रास्ते मे था कि बारिश बहुत तेज हो गई । मजबूरन एक बंद पड़े मकान के बरामदे में शरण लेनी पड़ी । रुमाल से कोट पर पड़ी बूँदे साफ करते हुए झुँझला उठा मैं…
“…इसी समय बरसना था इसको…न कुछ देर पहले न कुछ देर बाद…अब चाहे जो भी हो ,इसी महीने कार खरीद कर ही दम लूँगा…”
कुछ संयत होकर इधर-उधर देखा , तो वहाँ एक अधेड़ किसाननुमा पुरुष पहले से उपस्थित था। मैली-कुचली धोती व कुर्ता और गले मे पड़ा मटमैला अँगौछा । उसके पैर में पड़ी हवाई चप्पल के आगे के टूटे हिस्से को पतली रस्सी से बाँधकर किसी तरह अँगूठा फ़साने लायक बना दिया गया था ,पर उसकी अधपकी दाढ़ी से भरे गेहुँए चेहरे पर जो अभूतपूर्व सुख व संतोष व्याप्त था,वो अपने आसपास विचरने वाले आर्थिक रूप से बेहद सुदृढ़ चेहरे पर भी कभी ढूढे नही मिलता ।
मुझे देख वह परिचितों के अंदाज में मुस्कराया…
“…साहेब..आपव फसी गयव बरखा मा…”-मुझे अपनी ओर ताकता देख वह बोल पड़ा ।
“…मुला हमार तव आज केर दिन बहुतें नीक जात हय…भोर मा उठेन तव पेट मा बड़ा पीरा रहा…खाद डाल जाय कै हिम्मत नाही परत रहा…जीव पोड़ कय केर निकरेंन,तव खेतन मा धान केर लंबी-लंबी बाली बयार मा झूमत देख मन निहाल होय गवा…पेट कय दरद एकदम से छू-मंतर होय गवा….”
उसकी बातें सुन मैं मुस्कुरा उठा। मेरी दिलचस्पी देख उसने बात आगे बढ़ाई,
“…साहेब,खेतन मा पानी सीचय वास्ते पाँच सौ कय जुगाड़ कय के डीज़ल लेय निकरेन रहा…तव बीचे मा इन्दर देवता कय किरिपा होय गवा…संसार बदे ई पानी बरसत हय, पर हमरे बदे तव ई रुपया बरसत है साहेब…”
श्रम,अभाव व संतोष की उस त्रिवेणी को बस अपलक ताकता रह गया मैं। उसकी खुशी के आगे अपने हिस्से का सुख मुझे उस क्षण बेहद बेमानी लगने लगा था ।
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5-जनसेवा
जीप को जैसे उसने थोड़ा दाहिनी ओर मोड़ा ,पीछे से आ रही चमचमाती ‘टाटा सफारी’ से उसकी बेहद मामूली टक्कर हो गई । ब्रेक की चीख राह चलते लोग इस ओर मुखातिब हुए । गाड़ी प्रभावशाली पार्टी का झंडा था और नंबर प्लेट के ऊपरी हिस्से पर विराजमान नेताजी की जिलास्तरीय हैसियत अंकित थी – वरिष्ठ उपाध्यक्ष !!!
सफारी का ड्राइवर गाड़ी से लगभग कूदते हुए उतरा और जीप चालक पर पिल पड़ा। बिना समय गँवाए । देखते-देखते लात घूँसों की बौछार शुरू कर दी । अबतक नेताजी भी सफारी से उतर पड़े थे ….लम्बा तगड़ा शरीर ,रोबीला चेहरा ,तलवार कट मूँछे और इन सब पर भारी सफ़ेद लकदक , कड़क कुरता –पायजामा। एक क्षण को ऐसा लगा जैसे वह चेहरे पर बनावटी मुस्कान चस्पाँ कर हाथ जोड लेगे, पर मेरी तक़दीर में तो जनसेवक का नया व हैरतअंगेज रूप देखना लिखा था… माँ-बहन की धाराप्रवाह गालियों के बीच नेताजी ने उस अभागे के मुँह पर कई तमाचे जड़ दिए और फिर उसका दाहिना हाथ मरोड़ना शुरू किया …
‘…साहेब हम ड्राइवर नाही है…मैकेनिक है …जीप का ट्राएल ले रहे थे …’ बचाव में सिसकते हुए वह बोला ।
‘…तो क्या किसी को सड़क पर चलने नहीं देगा …गाड़ी लड़ाएगा …देख ,खरोच आ गई नई गाड़ी में …तेरा ये हाथ तो मैं किसी लायक नहीं छोडूँगा …’ नेताजी गरजे ।
‘…नेताजी …जाने दीजिए…अनजाने में गलती हो गई इससे …’ भीड़ में खड़े अधेड़ ने विनती की ,पर दोनों टस से मस न हुए और धुनाई अभियान जारी रखा।
‘…अरे तोड़िएगा नहीं नेताजी…घाटे में रहेंगे …चुनाव सिर पर है…आखिर इसी हाथ से बेचारा वोट भी तो डालता है …’-किसी ने चुटकी ली ।
एकाएक नेताजी सँभले । पकड़ ढीली की । कुछ शर्मसार- से दिखे । फिर हाथ छोड़ वह दनदनाते हुए सफारी में जा बैठे ।ड्राइवर ने उनका अनुसरण किया और इशारा पाकर गाड़ी आगे बढ़ा दी । इधर बेचारा जीप वाला सड़क पर अवाक् बैठा रह गया ……।
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