जुलाई 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: March 1, 2021

1-अंतिम चारा

क्षेत्र में इस बार भी भंयकर सूखा पड़ा था और इस सूखे से निजात पाने के लिए आज एक आम सभा का आयोजन किया गया था।

‘‘साथियो”, गाँव के एक आदमी ने कहा, ‘‘सूखे के आगे सरकार, नदी, नहर, और झरना सब चीजें पहले ही नतमस्तक हो चुकी हैं। अब अंतिम चारा हमारे गाँव की महिलाएँ ही हैं। यदि वे चाहें तो हम सबकी जानें बचा सकती हैं।’’

लोगों में जिज्ञासा बढ़ने लगी। सवाल पानी का था अर्थात जिंदगी का।

‘‘क्या मतलब”, तब एक बुजुर्ग ने सभी लोगों के बीच से उठकर कहा, ‘’आप आगे कहें जो भी कहना है?’’

‘‘आगे यही कहना है”- पहले आदमी ने कहना शुरू किया, ’‘यदि गाँव की महिलाएँ निर्वस्त्र होकर, अपने-अपने खेतों में हल चलाएँ तो, इंद्र देवता प्रसन्न होकर बारिश कर सकते हैं। पिछली बार भी यही बात उठी थी लेकिन महिलाएँ तो हल चलाने के लिए तैयार ही नहीं हुईं, तो स्थिति देख ही रहे हैं आप!’’

सभा में भारी ख़ामोशी पसर गई। अन्ततः पेड़ बचाने की दुहाइयाँ, धरती बचाने की दुहाइयाँ, छोटे-छोटे बच्चों को बचाने की दुहाइयाँ, घर, मकान, जिंदगी और गाँव बचाने की दुहाइयाँ महिलाओं तक पहुँचाई गईं। फिर सभा द्वारा यह निश्चित कर दिया गया कि अमुक दिन महिलाएँ निर्वस्त्र होकर अपने-अपने खेतों में हल चलाएँगी। संकट सिर पर था अतः हल चलाने की तैयारियाँ तेज होने लगीं।

शाम को मोहन की बीवी, सरकार की बीवी से मिली और अचंभित होकर बोली, ‘‘दीदी! क्या सचमुच, इस तरह हल चलाने से बारिश होगी और चारों तरफ हरियाली-खुशहाली छा जाएगी?’’

‘‘ख़ाक”‘,  सरकार की बीवी झल्ला पड़ी, ‘‘अब इन मर्द जातों की क्या कहें? खुद ही सभा की और खुद ही सब कुछ तय कर दिया। यदि उन्हें बारिश की इतनी ही चिन्ता है, तो वे सारे खुद ही नंगे होकर खेतों में हल क्यों नहीं चलाते? बताओ….”

‘‘छी…छी…दीदी! कैसी बातें करती हो!”  मोहन की नई नवेली बीवी शरमा गई।

‘‘बस्स… तुम तो इतने में ही शरमा गई…’’ सरकार की बीवी ने कहा-“जो काम ये हमसे अगले इतवार करवाना चाह रहे हैं…बहन! वो काम तो हम महिलाएँ न जाने कितनी बार कर चुकी हैं! तो बताओ… हम कितनी बार शरमाईं? लेकिन हुआ क्या? दुख है कि हर कोई हम महिलाओं को नंगी ही देखना चाहता है। चाहे भगवान हो, बादल हो या इनसान हो.”

अब मोहन की दसवीं पास बीवी हतप्रभ थी।

दूसरे दिन ही पुरुषों की सभा में ये बातें पहुँचाई गईं कि महिलाएँ निर्वस्त्र होकर हल नहीं चलाएँगी। पुरुषों की सभा अब चिन्तित थी। बहुत बौखलाई हुई थी।

इन्हीं बातों को लेकर इधर पुरुषों की सभा चल रही थी और उधर महिलाओं की।

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            2-मनीऑर्डर

घर का बँटबारा और बोलचाल बंद हुए कई वर्ष बीत चुके थे।

‘‘पाँच हजार रुपये चाहिए।” एक दिन बड़े भाई की पत्नी बोली-“माँ बीमार है। गाँव मनीऑर्डर करना है।’’

बड़े भाई ने कुछ नहीं कहा। शान्त भाव से पैसे दे दिए। पैसे लेकर बड़े भाई की पत्नी फिर सीधे अपने देवर-देवरानी के घर पहुँच गई। वह उनके आर्थिक संकट से विचलित थी। पैसे दिए तो दोनों संकोच से गड़ गए।

‘‘लेकिन दीदी!’’ देवरानी ने कुछ कहना चाहा। देवर भी हैरान था।

‘‘कुछ भी नहीं सुनूँगी।” बड़े भाई की पत्नी बोली-‘‘मुझे पता है छोटे इन दिनों एक-एक पैसे के लिए परेशान है। तुम भी अभी पेट से हो। बच्चे छोटे-छोटे हैं। मैं अब चलती हूँ।”

यह सब कुछ बडे़ भाई ने देख लिया, परन्तु बोले कुछ नहीं। सम्भवतः वह अच्छी तरह जानते थे कि छोटा भाई आजकल घोर विपत्ति में है। घर में खाने-पीने, ओढ़ने की किल्लत है।

‘‘मनीऑर्डर करा दिया?’’  रात को बड़े भाई ने अपनी पत्नी से पूछा।

‘‘जी हाँ!’’ पत्नी बोली- ‘‘आज दोपहर में करा दिया था।”

‘‘ठीक है। समय-समय पर इसी तरह मनीऑर्डर करा दिया करो।”  बड़े भाई लगभग रो पड़े। कमरे से निकलते हुए बोले- ‘‘अपना ही खून है।”

पत्नी सब कुछ समझ गई। वह अपने आँखों से आँसू बहने से रोक न सकी।

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           3-वह लड़की है

वह लड़की है। वह जानती थी कि वह लड़की है। घर वाले भी जानते थे कि वह लड़की है। इसके अलावा आसपास के लोग भी जानते थे कि वह लड़की है। गली-मोहल्ला, दुनिया-जहान भी जानते थे कि वह लड़की है।

वह लड़की है, शायद इसलिए घर के लोगों सहित अन्य लोगों की नज़रें भी उस पर थीं-

कहाँ जाती है?

कहाँ से आती है?

क्या खाती है?

क्या पीती है?

क्या पहनती है?

क्या ओढ़ती है?

अकसर उसके कानों में कुछ-कुछ एहसास कराने वाला यह वाक्य पहुँचता, ‘‘याद रख तू लड़की है।”

एक दिन उसने सोचा कि यह वाक्य -‘‘याद रख तू लड़की है, मेरा मनोबल बढ़ा रहा है या घटा रहा है ?’’

खैर, इस बारे में उसने ज्यादा न सोचा। बस पढ़ाई, खूब पढ़ाई करने में ही मगन रही और…!

और आज देखिए कि आज के सारे अखबारों के पहले पन्ने पर बस वही छायी है! आखिर… सिविल सेवा परीक्षा में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया है।

उसके माता-पिता तो समझ ही नहीं पा रहे थे कि यह हो क्या रहा है? बधाई और शुभकामनाएँ देने वालों का ऐसा तांता लगा कि… फिलहाल अब वे बहुत खुश हैं।

पत्रकारों ने इण्टरव्यू में पूछा-‘‘दिव्यदर्शिनी जी बधाई! लेकिन इतना बड़ा काम आपने किया कैसे ?’’

वह बोली-‘‘बस यही याद रखती रही कि मैं एक लड़की हूँ।”

बातचीत अभी भी चलती रहती है। लोग कहते हैं- ‘‘वाकई, वह एक लड़की है।”

कुछ लोग कहते हैं-‘‘भाई, हमने देखा है-उसका आना-जाना, खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना।”

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      4-जहरीली घास

सभी लड़कियाँ सड़क किनारे बैठ गईं। कुछ इधर देखने लगीं, कुछ उधर देखने लगीं। कुछ आपस में वार्तालाप करने लगीं, तो कुछ अपने सामने उगी घास नोंचने लगीं। इस तरह पन्द्रह-बीस मिनट व्यतीत हुए।

वहाँ से थोड़ी दूरी पर स्थित बिल्डिंग से कुछ लड़के, बहुत ध्यान से उनकी गतिविधियाँ देख रहे थे। एक लड़के ने गम्भीरता से कहा, ‘‘उन्हें देखकर क्या लग रहा है ?’’

’’यही कि…’’ दूसरा लड़का बोला, ‘‘सब हमारे कॉलेज की लड़कियाँ हैं।’’

’’और…’’

’’यही कि सब न्यारी हैं, प्यारी हैं, खूबसूरत हैं!’’

’’और…’’

’’और, बस यही कि…उनकी चाल-ढाल में आज कुछ सुस्ती दिख रही है। उनके चेहरे भी कुछ थके-थके से लग रहे हैं। हालांकि ये सब तितलियों की तरह उड़ान भरने वाली और, हमेशा पढ़ाई-लिखाई की बात करने वाली लड़कियाँ है, परन्तु उन्हें देखकर आज ऐसा लग रहा है कि उनका अन्तर्मन कुछ-कुछ व्यथित हैं। सम्भवतः कहीं कोई जहरीली घास उग आई है, जिन्हें शायद ये नोंचना चाह रही हैं।’’

’’और…’’

’’और बस यही कि…हमें तुरन्त जहरीली घास तक पहुँचना होगा! ताकि हम उन्हें जड़ से उखाड़ सके! नोंच सके! फेंक सके।’’

’’तो चलो…’’

फिर अभावग्रस्त घर की होनहार लड़कियों ने अपनी जो दारूण-दास्तान सुनाईं, उन्हें सुनकर लड़कों की आँखें लाल हो गईं। शरीर की नसें तनने लगीं। खून में उतार-चढ़ाव आने लगा। सब लड़के एक-दूसरे की ओर देखने लगे, परन्तु चुप्प रहना ही बेहतर समझा!

उनमें से वही पहले लड़के ने संयमित स्वर में कहा, ‘‘गुंजन, आप सभी लड़कियाँ  प्लीज… कल वहाँ अवश्य आइए।’’

फिर अपने दोस्तों से बोला, ‘‘दोस्तों, जिन्दगी में फिर महसूस हो रहा है कि हॉकी का असली मैच कल है। कॉलेज में खेला तो क्या खेला! कल कुछ जहरीली घास उखाड़-फेंककर ही दम लेंगे !’’

दूसरे दिन सभी लड़कियाँ जिला समाज कल्याण विभाग मे थीं। साथ में बीस-बाईस लड़के भी, जिनके हाथों में हॉकियाँ थीं। कुछ लड़के इधर-उधर बैठकर, तो कुछ दीवारों के सहारे खड़े होकर कार्यालय का कामकाज देखने लगे।

अलग-अलग वर्गों की छात्रवृत्ति का चेक बाँट रहे बाबू, अपनी ओर मुस्कुराते लड़कों को देखकर बार-बार पानी गटकते! एक प्रकार से उनकी तो घिग्घी ही बंद हो गई थी। आने-जाने वाले कर्मचारी भी लड़कों को हैरत से देख रहे थे, पर उन्होंने शान्त रहना ही उचित समझा।

इस प्रकार विगत तीन माह तक निरन्तर टरकाने के बाद, आज मात्र आधे घण्टे के अन्दर सभी लड़कियों के हाथों में उनकी छात्रवृत्ति का चेक था। चेक मिलने के पश्चात ऊर्जा का ऐसा संचार हुआ कि उनके खिले हुए चेहरे निस्संदेह देखने योग्य थे।

देखने योग्य तो यह भी था कि आज पहली बार उन लड़कियों से, किसी ने रिश्वत की माँग नहीं की।

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   5-_  एक बार तो कहते

बिसेसर निराश होकर लौटा। क्या करे? बच्चे की तबीयत कल से ही बिगड़ी हुई थी। पति-पत्नी दोनों परेशान थे।

’’उनसे एक बार तो कहते लक्ष्मी के घरवाले हो!’’ पत्नी बिफरी, ‘‘मैंने भी तो उनके यहाँ काम किया है।’’

’’खाक कहता!’’ बिसेसर नहीं, बिसेसर का दुख बोला, ‘‘जीवन मालिक की मजदूरी-सेवा में बीता बैठा। फिर भी जब मुझे ही नहीं जानते तो तुझ कभी-कभार काम करने वाली को क्या जानेंगे? मालिक कहते रहे-जाओ, पहले ही बहुत पैसा चढ़ा है तुम पर।’’

’’फिर भी, एक बार तो कहते मेरा नाम!’’

’’तो तू ही जा!’’  बिसेसर ने मुँह बनाया।

लक्ष्मी पहुँच गई मालिक के घर। मालिक ने देखा तो अपने चेहरे के हाव-भाव बदले।

’’मालिक!’’ ल़क्ष्मी हाथ जोड़कर बोली, ‘‘आप अच्छी तरह मुझे और बिसेसर को जानते हैं। यह भी जानते हैं कि किसका बच्चा बीमार है?’’

’’चुप…चुप!’’ मालिक बिफर पड़ा, ‘‘ऐसी जुबान न बोल। चुप रह! जरा शर्म-लिहाज कर!’’

पैसा मिल चुका था और पति-पत्नी अपने बच्चे को लेकर शहर भागे जा रहे थे।

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रावण

उसका यह रूप देखकर मेरा दिल अन्दर से ही काँप गया। मैं उसके और अपने बचपन के दिनों में पहुँच गया।

‘‘जल रावण जल!’’ वह अकसर घास या अखबार से बनाए गए पुतले को रावण समझकर जलाया करता था। कुछ हद तक वह अपने आपको राम भी समझता था।

‘‘सीता को चुराएगा!’’ वह पुतले में आग लगा देता। फिर ताली मारकर और उछलकर कहता, ‘‘बुराई के प्रतीक और बुरे इनसान! जल, तू खूब जल!’’

याद नहीं कि उसने रावण के कितने पुतले फूँकें थे। जलाए थे।

‘‘बुरा इनसान, दूसरों को परेशान करेगा। मरेगा।”  वह कहता उस पर रामलीला का पूरा असर था और राम का भी।

‘‘ए भाई!’’ वह मुझे वर्तमान में ले आया, ‘‘जहाँ जी करे, घूमना। अपना ही इलाका है। साले को चीर दूँगा, किसी ने भी कुछ कहा तुम्हें तो! सभी जानते हैं पाण्ड्या ने कितने खून किए हैं। कहाँ तक मेरी पहुँच हैं।”

मैं समझने की असफल कोशिश कर रहा था कि एक राम कब रावण बन गया।

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