जुलाई 2026

मेरी पसन्दमानव मन की लघुकथाएँ     Posted: January 1, 2022

लघुकथा – मजबूती

लेखिका – डॉ. वसुधा गाडगिल

इस लघुकथा ने पढ़ते ही मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। आज के समय में जहाँ मानवी संबंधों का मूल्य कम होता जा रहा है तथा साधारणतया मनुष्य स्वार्थी होने लगा है, केवल अपने निकटतम परिवार के हित के विषय में सोचना ही उसकी प्राथमिकता बन गई है । वहाँ आवश्यकता है,  ऐसी लघुकथाओं की जो मनुष्य के मन को झंझोड़ने का सामर्थ्य रखती हैं।

प्रस्तुत लघुकथा ‘मज़बूती’ यद्यपि इंसानी रिश्तों की मज़बूती के विषय को लेकर लिखी गई है तथापि इसे एक बिल्डर और खरीददार के बीच हुए संवाद को लेकर रचा गया है। यह एक छोटी सी संवादात्मक लघुकथा है जिसका कथ्य भले ही नया न हो किन्तु प्रस्तुति अवश्य नई है। लेखिका, डॉ. वसुधा गाडगिल जी ने इस लघुकथा को मात्र 6 संवादों में बाँधकर प्रस्तुत किया है। इन 6 संवादों में लेखिका ने कथ्य का निर्वाह इतनी कुशलता से किया है कि लघुकथा का भाव पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है।

लघुकथा में एक बिल्डर तथा उससे मकान खरीदने वाले व्यक्ति के संवाद हैं। खरीददार उसे अपनी मेहनत की कमाई का वास्ता देते हुए निर्माण सामग्री की गुणवत्ता के बारे में पूछता है तथा यह बताता है कि वह अपने भाई से सम्बन्ध तोड़ कर मकान खरीद रहा है। बिल्डर उसे आधुनिक पदार्थों के बारे में बताते हुए मकान के निर्माण के प्रति आश्वस्त करता है तथा निश्चिन्त रहने के लिए कहता है। यहाँ लेखिका ने बिल्डर द्वारा आधुनिक निर्माण पदार्थों के बारे में बताते हुए एक व्यंग्यात्मक बात कहलवाई है कि “नहीं साहब, फ़िक्र मत कीजिए, इनकी जुड़ाई इंसानी रिश्तों जैसी नहीं। इनमें न दरार पड़ती है न ये चटकती हैंl” इसी वाक्य को लघुकथा के प्रभावशाली वाक्य के रूप में प्रयोग किया गया है जो न केवल लघुकथा के कथ्य को स्पष्ट कर देता है अपितु निकटतम संबंधों में होने वाले मतभेद तथा इस कारण उपजने वाली दूरी को भी सफलता से परिलक्षित करता है। लेखिका ने छोटे-छोटे प्रभावशाली संकेतात्मक वाक्यों का प्रयोग भी लघुकथा में किया है, जैसे ‘खरीददार के माथे पर बल पड़ गए थे’  इस वाक्य से जहाँ एक ओर खरीददार की आशंका और भविष्य के प्रति अनिश्चितता दिख रही है वहीं इसके द्वारा उसका भाई से अलग होने पर होने वाला क्षोभ भी दिख रहा है। यही लेखिका की सफलता है।

संवाद शैली की लघुकथाओं में ध्वन्यात्मकता होने के कारण वह सीधे-सीधे पाठक के मन में प्रवेश करती है तथा एक गहरी छाप छोडती है। संवादात्मक लघुकथाओं में भाषा की कसावट अत्यंत आवश्यक होती है तथा उसकी सहायता से लघुकथा की प्रभावशाली बुनावट भी महत्त्वपूर्ण होती है, जिससे बिना अतिरिक्त विवरण दिए भी बात स्पष्ट हो जाए। लेखिका ने लघुकथा में इस बात का विशेष ध्यान रखा है।

डॉ. वसुधा ने अपनी इस लघुकथा में इन तत्त्वों का समावेश करके इसे सफल एवं प्रभावशाली बना दिया है। लघुकथा का शीर्षक सार्थक तथा भाषा सरल होने के कारण यह सर्वग्राह्य हैl

-0-

लघुकथा – दहलीज़ का बंधन

लेखिका – डॉ. विनीता राहुरीकर, भोपाल

समाज ने वर्तमान समय में स्त्रियों तथा पुरुषों के लिए भिन्न मानक बना रखें हैं। कुछ बातें जिनके लिए स्त्रियों पर प्रतिबन्ध होता है, पुरुषों को उनमें एक तरह से छूट मिल जाती है अथवा वे ऐसा मान के चलते हैं कि छूट प्राप्त है उन्हें। इस दुराग्रह का कड़ा विरोध करते हुए लिखी गई लघुकथा सहज ही अपनी ओर ध्यान खींचती है।

प्रस्तुत लघुकथा ‘दहलीज़ का बंधन’ अपने शीर्षक को सार्थक करती हुई एक संतुलित और स्पष्टवादी संवादात्मक लघुकथा है। कथा का प्रारंभ ननद भाभी के संवाद से होता है। लेखिका, डॉ. विनीता राहुरीकर जी ने बड़ी कुशलता से कथा की नायिका द्वारा लिए गए निर्णय के इर्द-गिर्द कथानक को बुना है। नायिका अपने पति द्वारा स्थापित किए गए विवाहेतर सम्बन्ध से क्षुब्ध तो है किन्तु अपने कर्त्तव्य के प्रति ज़रा भी उदासीन नहीं है। दो वर्षों के लम्बे समय तक पूर्णरूपेण जद्दोजहद करके वह अपने पति को उस स्त्री के प्रभाव से मुक्त करवाती है तथा उन्हें इस बात की प्रतीति भी करवाती है कि उस स्त्री ने उन्हें केवल पैसे के लिए पथभ्रष्ट किया हुआ था। इतना ही नहीं नायिका ने अपने प्रयत्नों से पति को सही राह पर लाकर घर लौट आने के लिए बाध्य कर के अपने वृद्ध सास-ससुर के दुःख को दूर करने का तथा अपनी ननद के विवाह में आने वाली संभावित अड़चनों को दूर करने का भी हर संभव प्रयास किया है।

लेखिका की विशेषता यह है कि जहाँ एक ओर उन्होंने नायिका के कर्तव्य पक्ष का निर्वाह किया है वहीं उसके स्वाभिमान को भी कायम रखा है ।जिस शाम उसके पति लौट रहे होते हैं, उसी दिन नायिका दूसरे शहर में नौकरी के लिए जाने को तैयार हो जाती है। उसका स्वाभिमान उसे न केवल ननद का वह अनुरोध मानने की अनुमति नहीं देता, जिसमें वह उसे रुक जाने की बात करती है अपितु वह स्पष्ट तथा सपाट शब्दों में पति से सम्बन्ध समाप्त होने की बात भी कह देती है। यहाँ नायिका की दूसरे शहर में जाने की बात केवल उसका हठ न हो कर स्वाभिमान से भी ऊपर की श्रेणी में किया गया दृढ़ निश्चय है। लेखिका ने साधारणतया परिलक्षित इस सोच का भी भरपूर विरोध किया है – “सच्चरित्र होने का नियम केवल महिलाओं के लिए ही है,” तथा इस प्रश्नात्मक पंच वाक्य से कि “दहलीज़ के बंधन सिर्फ औरतों के लिए ही होते हैं क्या ?” लघुकथा को प्रभावशाली ढंग से संपन्न किया है।

संवादात्मक लघुकथाओं की विशेषता है कि इन लघुकथाओं में किसी भी प्रकार के अन्य वर्णन के बिना भी काम चलाया जा सकता है। ऐसी लघुकथाएँ प्रभावशाली होती हैं क्योंकि इनके पात्र पाठक से सीधे साक्षात्कार करने में सक्षम होते हैं। लेखिका द्वारा रखा गया शीर्षक ‘दहलीज़ का बंधन’ सटीक तथा तर्कसंगत है। उन्होंने कथ्य का निर्वाह भी सफलतापूर्वक किया है। लघुकथा की भाषा सरल तथा सर्वग्राह्य है ।

1- मजबूती : डॉ. वसुधा गाडगिल

“मेहनत की कमाई है, ईंट, गिट्टी, रेत, सीमेंट… आप अच्छी क्वालिटी का इस्तेमाल करेंगे न?” खरीददार ने बिल्डर से पूछा।

“आप बेफिक्र रहें, बढ़िया क्वालिटी रहेगी।” बिल्डर तटस्थ भाव से बोला।

“प्लास्टर, जुड़ाई… सब अच्छा रहेगा न। ऐसा न हो कि पहली बारिश में ही छत टपक रही है, दीवारों की दरारों से पानी रिस रहा है।”

“साहब, आजकल अच्छे-अच्छे चिपकाने वाले पदार्थ आ गए हैं, जिनसे जोड़ भी मज़बूत रहते हैं और सीमेंट, रेत सब अच्छे से चिपक जाता है।”

“बड़े भाई से अलग हो कर यह निर्णय ले रहा हूँ।” खरीददार के माथे पर बल पड़ गए थे।

“नहीं साहब, फ़िक्र मत कीजिए इनकी जुड़ाई इंसानी रिश्तों जैसी नहीं। इनमें न दरार पड़ती है न ये चटकती हैं।”

-0-

2-दहलीज़ का बंधन : डॉ. विनीता राहुरीकर

“ये क्या भाभी आप बैग में कपड़े क्यों पैक कर रही हो, कहाँ जा रही हो ?”

“रामनगर के कॉलेज में नौकरी के लिए आवेदन दिया था वो मंज़ूर हो गया है। दो दिन बाद ज्वाइन करना है। शाम की गाड़ी से निकल रही हूँ।”

“आपको नौकरी करने की क्या ज़रूरत है। और शाम को तो भैया वापस आ रहे हैं।”

“अब अपना पेट भरने के लिए नौकरी तो करनी ही पड़ेगी न। माँ-बाप पर बोझ बनकर तो रह नहीं सकती अब।”

“भाभी…! अपना पेट भरने के लिए मतलब ? दो साल तक आपने कितनी जद्दोजहद करके क्या कुछ नहीं किया भैया को उस औरत के चंगुल से छुड़ाने के लिए। और अब जब सब कुछ ठीक हो गया, भैया की भी अकाल ठिकाने आ गई कि उसने सिर्फ पैसों के लिए उन्हें फाँस रखा था, और वो अब घर वापस आ रहे हैं तो आप…”

“परिवार की बदनामी हो रही थी। अम्मा-बाबूजी बुढ़ापे में इस तरह बेटे की करनी का दुःख भोग रहे थे। लोग कैसे-कैसे ताने देते थे उन्हें। फिर कल को तुम्हारी शादी में कितनी अडचनें आतीं ? मैंने इस घर के प्रति अपना कर्तव्य निभाया है बस। तुम्हें तुम्हारा भाई और अम्मा-बाबूजी को उनका बेटा लौटा दिया।”

“और आपका पति… भाई और बेटे के अलावा वो आपके पति भी तो हैं न…”

“जो लौट रहा है वो इस घर का बेटा है, भाई है। मेरा रिश्ता तो उसी दिन ख़त्म हो गया था जिस दिन उन्होंने दूसरी औरत से रिश्ता जोड़ा और इस घर के बाहर पैर रखा। दहलीज के बंधन सिर्फ औरतों के लिए ही होते हैं क्या ?”

-0-सदानंद कवीश्वर ,पता-   39-बी, पॉकेट ए-11, कालकाजी एक्सटेंशन, नई दिल्ली 110 019

ई मेल –  kavishwars@gmail.com

मोबाइल नं    –    9810420825

शिक्षा-  वाणिज्य स्नातक (दिल्ली विश्वविद्यालय)

संप्रति –  ‘डाबर’ समूह से सहायक-प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त

प्रकाशन-  एकल लघुकथा संकलन :   ‘फिर मिलेंगे’

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine