लघुकथा मानवीय संवेदनाओं की सूक्ष्म , संवेदनशील अभिव्यक्ति है। यह अपने समय की संवेदनाओं को शीघ्रता से ग्रहण करती है; इसीलिए इसकी शीघ्र संप्रेषणीयता सार्थक और सफल होती है। यह एक औषधि भी है, जो समाज में वृहद् स्तर पर जाग्रति फैलाती है। समाज की विसंगतियों, विद्रूपताओं , पर तीक्ष्ण प्रहार करना , समस्याएँ इंगित करना और समाधान बतलाना लघुकथा का मुख्य उद्देश्य है। इसमें हमें अनुशासनबद्ध होकर शब्दों का व्यवस्थित , उचित प्रबंधन करके कम शब्दों में बड़ा -सा संदेश देना होता है। वर्तमान में लघुकथा साहित्य की लोकप्रिय और सशक्त विधा बनकर उभरी है। मैंने अनेक वरिष्ठ लघुकथाकारों को पढ़ा है। सन् 1977 में मूर्धन्य साहित्यकार नर्मदाप्रसाद उपाध्याय के संपादन में प्रकाशित ‘समान्तर लघुकथाएँ’ पुस्तक ने लघुकथा लेखन में रुचि बढ़ाई। शंकर पुणतांबेकर (आम आदमी ), हरिशंकर परसाई (मैं नरक से बोल रहा हूँ ), डॉ. सूर्यकांत नागर (पिघलती बर्फ ) , नर्मदाप्रसाद उपाध्याय( पश्चाताप ) , सुरेश शर्मा (उसके बिना), डॉ. श्यामसुंदर अग्रवाल (टूटी हुई ट्रे) चित्रा मुद्गल (बोहनी ), सुकेश साहनी (ठंडी रजाई ), बलराम(मृगजल ) , बलराम अग्रवाल (उसकी हँसी ) ,कमलेश भारतीय (मेरे अपने) , चैतन्य त्रिवेदी (खुशियाँ ) , सतीश राठी (मंथन) इत्यादि तथा अनूदित लघुकथाओं में खलील ज़िब्रान , श्यामसुंदर अग्रवाल , सुकेश साहनी ,योगराज प्रभाकर , सुभाष नीरव , अशोक भाटिया , अशोक जैन , जगदीशराय कुलरियाँ , उज्ज्वला केलकर आदि मूर्धन्य साहित्यकारों के माध्यम से अन्य भाषाओं की लघुकथाएँ पढ़ने – गुनने का मुझे अवसर मिला। इन सशक्त हस्ताक्षरों ने लघुकथा को न केवल स्थापित कर पुष्ट किया, वरन् अपनी कलम से नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान की। यहाँ ‘ मेरी पसंद ‘ के मालवांचल के दो लघुकथाकारों – डॉ. सतीश दुबेजी तथा अंतरा करवडे़जी की लघुकथाओं का उल्लेख करना चाहूँगी।
सतीश दुबे जी की ‘ इज़हार ‘ लघुकथा उनके अंतिम संग्रहों में से एक ‘इक्कीसवी सदी की मेरी इक्कावन लघुकथाएँ ‘ से है जिसमें पत्नी का मोबाइल जो उससे कभी दूर नहीं होता , सारे रिश्तेदारों की खैर-खैरियत जानने , बातचीत करने के लिये उसके पास सदैव रहता है । अचानक एक दिन पतिदेव देखते हैं कि वह मोबाइल उनके मोबाइल से सटा हुआ रखा है । जैसे कुछ खास गुफ्तगू कर रहा हो । वे आश्चर्यचकित हो पत्नी से मोबाइल इस तरह रखने की वजह पूछते हैं तब पत्नी उनसे कहती है –‘आज वेलेंटाइन डे है ना , इसलिए!’ ‘ यह संवाद पढ़कर सुखद अनुभूति होती है। उम्र के इस मुक़ाम पर नई तकनीक और नवीन परंपराओं (पाश्चात्य तथा आधुनिक ) के साथ समायोजन कर जीवन को सकारात्मक , संवेदनशील संदेश देती यह लघुकथा अंतस् को भिगो देती है। सतीश दुबेजी की भाषा सहज ,सरल संप्रेषणीय है, जो हमें सहज रुप से आकर्षित भी करती है। इज़हार लघुकथा में समकालीन जीवन का परिवर्तित स्वरूप , लोकपरंपराओं में उपजे नवाचार , मर्यादित और नवीन मानवीय मूल्य हमें परिलक्षित होते हैं।
इस संग्रह की अन्य लघुकथाओं में भी नवीन तकनीक के साथ जुड़ाव और उसके आगमन से बदलती प्रत्येक संबंध की परिभाषा को लेकर खूबसूरती से लिखा गया है। सतीश दुबेजी समाज को सुप्त न रखकर गतिमयता देते हैं। उनके लेखन के केन्द्र में ‘ मनुष्य ‘ है ।
‘ इज़हार ‘ लघुकथा में खास तौर पर उस समय की, इस उम्र की स्त्री द्वारा किया गया प्रेम का अप्रत्यक्ष इज़हार इसे खास बनाता है।
भाषा और वाणी सेवा देने वाली अंतरा करवड़ेजी , लघुकथा विधा में परिपक्व लेखन की सशक्त हस्ताक्षर हैं। उन्होंने उम्मीदों के आकाश में मज़बूत उड़ान भरी है। उनकी लघुकथाओं में बिंब , संवाद , यथास्थान तत्सम शब्दों का प्रयोग आदि भाषायी सौंदर्य की छटाएँ दिखाई देती हैं। विशुद्ध परंपरागत हो या आधुनिक वैश्वीकरण , नए तकनीकी विषय , नए प्रयोग इनकी लघुकथाओं के प्रभावी , सकारात्मक संदेश , पाठक के मनमस्तिष्क में स्थायी रूप से बस जाते हैं। इन संदेशों में विसंगति , समस्या के समाधान के साथ भारतीय संस्कृति, संस्कारों और मानवीय मूल्यों को सहेजने की अमिट छाप भी होती है ।
अंतराजी की ‘ लघुकथा ‘ सरोवर ‘ की नायिका ‘ नित्या ‘ जो तेज़ धावक है , एक सड़क हादसे में शरीर के स्नायुतंत्र पर नियंत्रण खो चुकी है। डॉक्टर , मनोवैज्ञानिक उसे जीवन की अगली पारी जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने हेतु उससे बात करते हैं। डॉक्टर तब आश्चर्यचकित हो जाते हैं जब नित्या स्वयं के जीवन को कैलाश मानसरोवर की भाँति स्थिर, ठहराव प्रदान करने हेतु तत्पर रहती है। वह डॉक्टर से कहती है – ‘ मुझे ठहरना ही है तो उस एकमात्र , पवित्र सरोवर जैसा , जो स्वयं कहीं नहीं जाता, भक्त वहाँ जाते हैं डुबकी लगाने !’ ऐसी विषम परिस्थिति में कितने लोग हताश , उदास , निराश हो जाते हैं; लेकिन नित्या की दृढ़ इच्छाशक्ति , मनोबल ,सकारात्मकता उसे इस चुनौतीपूर्ण ,कठिन परिस्थिति से बाहर निकालती है। यह लघुकथा स्त्री सशक्तीकरण की सशक्त रचना है जो पाठक को सकारात्मकता प्रदान कर उसे मनोवैज्ञानिक औषधि भी प्रदान करती है। इज़हार और सरोवर ये दोनों लघुकथाएँ मुझे नवीन उर्जा प्रदान करती हैं।
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1-इज़हार – सतीश दुबेजी
व्हील चेयर पर अपने को धकियाते हुए वे बाहर के ग्राउंड से अंदर के कमरे तक पहुँचे। हमेशा की तरह चेअर से उन्होंने अपने को दीवान पर शिफ्ट किया। अपनी बैठक को पूरी तरह व्यवस्थित कर लेने के बाद उनकी निगाह सेंट्रल टेबल पर जाकर टिक गई।
उन्होंने देखा- उनके मोबाइल से एकदम सटकर पत्नी का मोबाइल रखा हुआ है। शहर या बाहर फैले हुए बेटे -बहू , बेटी -दामाद , पुत्र- पुत्री , नाती- नातिन , भाई- भौजाई यानी किसी की भी रिंग- दस्तक आने पर चर्चा चुहुल या कुशल- क्षेम का अवसर चूक नहीं जाए इसलिए , ‘जान से भी ज्यादह ‘ हमेशा साथ रहने वाला यह मोबाइल आज यहाँ कैसे? और वह भी उनके मोबाइल के पास ऐसे बैठा हुआ मानो कोई गुफ्तगू कर रहा हो ।
उन्होंने अपनी जिज्ञासा -भरी उहापोह की स्थिति से निजात पाने के लिए किचन में खट्टपट्ट कर रही पत्नी को हमेशा मुजब आवाज लगाई – ‘ अरे सुनना जरा ….’
‘ दो मिनट में आई…’ आँखों से ‘ क्या बात है ‘ शब्द – संवाद के साथ वह सचमुच दो मिनट में सामने आकर खड़ी हो गई ।
‘ तुम्हारा यह अजीज मोबाइल आज यहाँ , इस प्रकार , इस हालत में …? ‘
‘ आज ‘ वैलेंटाइन डे ‘ है ना , इसलिए….!! ‘ भरपूर मुस्कुराहट के कारण उभरे कपोलों वाले उनसत्तर वर्षीय भावक चेहरे को उनकी ओर स्थिर करते हुए पत्नी ने प्रत्युत्तर दिया।
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2- सरोवर-अंतरा करवडे
‘देखो नित्या! अब तुम अपने आप को काफी हद तक सम्हाल चुकी हो। तुम्हारे लिए यह मुश्किल तो होगा, लेकिन उतना ही ज़रूरी है कि तुम्हे आने वाले जीवन की चुनौतियों के बारे में बता दिया जाए।’
राष्ट्रीय स्तर की एथलीट नित्या, एक दर्दनाक सड़क हादसे की शिकार होकर महीनों से बिस्तर पर सिमटकर रह गई थी। आज उसकी कुछ महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स आई थी, जिनके अनुसार नित्या का सामान्य रुप से चलना फिरना, स्नायु नियंत्रण और अन्य गतिविधियाँ अत्यंत सीमित रह जाने वाली थी। जीवन पर्यन्त अब उसे एक निर्भर और आश्रित स्वरूप में रहना था।
डॉक्टरों को अंदेशा था कि अपनी इस हालत का सामना करना उसके लिए मुश्किल होगा, और वे उसे भविष्य के लिए तैयार कर रहे थे।
‘मुझे पता है एक उम्दा एथलीट होने के कारण तुम्हारे लिये एक थमा हुआ, बेजान- सा जीवन जी पाना मुश्किल होगा। लेकिन इस सत्य को जितना जल्दी स्वीकार लोगी, सब कुछ आसान बनता जाएगा। अपनी गति को अब तुम्हे विराम देना ही होगा।’ डॉक्टर ने हिम्मत कर नित्या की ओर देखा। अपेक्षा थी कि आँसू, हताशा और बेचैनी होगी; लेकिन उसकी दोनो आंखें आत्मविश्वास से जगमगा रही थी।
‘माना कि मुझे दौड़ना नहीं है, थम जाना है, लेकिन क्या यह संभव नहीं है कि मैं इतनी शिद्दत से ठहर जाऊँ कि दौड़ने वालों को भी रश्क हो।’
डॉक्टर ने प्रश्नार्थक चेहरे से उसकी ओर देखा।
‘पिछले वर्ष आप ही गए थे न कैलाश मानसरोवर? डॉक्टर, मुझे ठहरना ही है, तो उस एकमात्र पवित्र सरोवर के जैसा, जो स्वयं कहीं नहीं जाता, आपके जैसे भक्त आते हैं वहाँ, डुबकी लगाने, पूजा करने। और अपने आप को धन्य मानने।’
पवित्र यात्रा की स्मृतियों से डॉक्टर के चेहरे पर भी मुस्कान फैल गई।
‘तुम्हें किसी सायकोलॉजिकल काउंसेलिंग की जरूरत नहीं है नित्या। तुमसे ही हमें सीखना चाहिए कि कैसे एक ठहराव भी पूजनीय हो जाता है।’
आज नित्या ने अपनी सारी मेहनत चोटिल खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने वाले कोच के रूप में लगा दी है। उसका पारदर्शी मानस वाकई एक ठहरा हुआ सा सरोवर है, जहाँ पर डुबकी लगाकर मनोबल पाते खिलाड़ी अपने आप को धन्य मानते हैं।
-0-डॉ. वसुधा गाडगिल,वैभव अपार्टमेंट,69 , लोकमान्य नगर ,इंदौर (मध्य प्रदेश )-452009.