“ऐ माई ! कल से भूखी हूँ । कुछ खाने को दे दो भगवान आपका भला करेंगे ।” दरवाजे से आती आवाज
सुन तपेदिक का मरीज काशी जैसे कैसे बिस्तर से उठा रसोई से चार रोटियाँ लीं और भिखारिन को देने लगे ।
“बाबूजी सब्जी के बिन कैसे खाऊँगी ।”
“सब्जी तो ख़त्म हो गई बच्चे स्कूल से आकर खाना खाकर फूल बेचने गए ।”
“तब बाबूजी कुछ पैसे ही दे दीजिए बच्चा भी सुबह से बस चाय ही पिए है ।”
“पैसे तो मेरे पास नही। बीमार आदमी हूँ पत्नी और बच्चे मेहनत -मजदूरी करते है , तू रुक मकान मालकिन से पूछता हूँ कोई सब्जी होगी तो ।”
बीमार अंदर गया एक कटोरी में सब्जी लाया । वह सब्जी उसने भिखारिन के हाथ में ली रोटियों पर उंडेल दी । “लो अब खा लो ।”
“चलती हूँ बाबूजी किसी और घर देखती हूँ शायद बच्चे के लिए दूध के पैसे मिल जाँ । रोटी हाथ में पकड़े वह चली गई ।”
बीमार बिस्तर से उठा और धूप सेकने के लिए कमरे का दूसरा दरवाजा खोला, उधर से धूप आ रही थी ।तो दिल धक् से रह गया । “ये क्या ? ये तो वही रोटियाँ है जो उसने भिखारिन को दी थीं। इनमें से एक टुकड़ा भी तो नही तोड़ा गया था।”
मालकिन छत पर खड़ी थी उसने भी देखा अपने हाथ की सब्जी पहचानते देर न लगी । बीमार से बोली – “ऐ काशी ! तूने तो अपने बच्चों के मुँह का निवाला भी भिखारिन को दिया ;लेकिन इन्हें रोटियों की नही रुपयों की भूख है।”
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अक्तुबर 2026
देशभूख Posted: February 1, 2017
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