वहाँ मेरी नियुक्ति हुए दूसरा दिन था। शाम को शिव मंदिर के प्रांगण में जाकर बैठ गया। लोग बारी–बारी से घंटियाँ, शंख और नगाड़े बजा रहे थे। एक थक जाता तो दूसरा बजाने लगता। उसके थकने पर तीसरा। पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा था। यह क्रम लगातार हर वाद्य पर चलता रहा। लोग बजाते चले जा रहे थे।
दो आदमी मेरे पास आकर बैठ गए। वे जानते थे कि यहां के विद्यालय में मेरी नियुक्ति हुई है। दोनों ने अपने नाम जयचंद और शाम बताए। मैंं जानने के लिए उत्सुक तो था ही इसलिए जयचंद से घंटियाँ, शंख और नगाड़े बजाने का कारण पूछ लिया।
‘‘गुरू जी, बहुत समय से यहां बारिश नहीं हो रही। हम रोज इसी तरह घंटियाँ, शंख और नगाड़े बजा कर शिवजी और इन्द्रदेव की पूजा करते हैं। आप देखना हमारी भक्ति से खुश होकर शिवजी और इन्द्रदेव बारिश जरूर करेंगे।’’ जयचंद ने उत्तर दिया।
‘‘तुम दोनों आज क्यों नहीं बजा रहे ?’’ मैंने उससे पूछा।
‘‘गुरूजी, अभी तक हमने बाबा का चरणामृत नहीं पिया है। चरणामृत पीकर हम बजाना शुरू करेंगे तो पूरी श्रद्वा से आधी रात तक डटे रहेंगे।’’ शाम बोल पड़ा।
वे दोनों उठकर चले गए। संगीत बजता रहा, बिना रूके। करीब आधे घंटे के बाद वे फिर लौटे।
शाम मेरे पास आकर मुस्कुराते हुए बोला, ‘‘गुरूजी, हम बाबा का चरणामृत पी आए। अब देखना हमारा कमाल। ऐसा नगाड़ा पीटेंगे कि शिवजी और इन्द्रदेव को कृपा करनी ही पड़़ेगी। हम बारिश करवाकर ही दम लेंगे।’’ उसके इन शब्दों के साथ निकली शराब की तीखी गंध मेरे नथुनों में समा गई।
-0-
लघुकथा.com
अक्तुबर 2026
देशबाबा का चरणामृत Posted: January 1, 2016
© Copyright Infirmation Goes Here. All Rights Reserved.
Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine