अवधी अनुवादः सविता मिश्र ‘अक्षजा’
राघव दफ्तरवा पौने ग्यारह बजे पहुँचेन। हरसुखवा कौ उहाँ पाई के चौंकि पड़ेन । थोड़ क हटि कै पूछेन, “इहाँ कइसे आई धमकय मिस्तरी जी?”
“साहिब, आपके घरे गवा रहे। आप उहाँ नाही मिलय, तब आवै के परा।”
“कहा, का बात हय। तोहार पइसा घरे दइ आई रहे, उहाँ से लई लेहे होबय!”
”साहिब, आपके हिया हम आठि दीना काम किहा ह।”
“हाँ, हाँ, केहे हय।” बरमा जी चोर निगहवा से अगली-बगली निहारेन।
“मेम साहिब साति दीना कs पइसा दिहिन। एक दिना क काटि लिहिन।”
“बनतय तोर साति दिना क ह।” बरमा बेपरवाही से बोलेन।
“सोमिवार से सोमिवार , साति दिना? हरसुखवा चौंकि ग, अइसन हिसाब पहली बारि जान्हा।”
“नाही जानत रहै तौ जानि लेय। तू दसि बजे कमवा परि आवत रहय?”
“आवत रहे, परि बिचवा मा खाई बदे छुट्टी नाही करत रहे। कामि छोरि क बिचवा मा बीड़ी सिगरेटवा भी नाही पियत रहे। चाह आपके घरवा मा बनत नाही रही। हम साति घन्टा कमवा ही करत रहे, बिनु रुके , बिनु आपन कमरिया सीध करे हुवे।”
“तू आठि दिना मा आठि घन्टा लेटि भय। आठि घन्टा कै मतिलब जानत अहै। सम्मय एक ठो दिहाड़ी।”
“आप हमसे रोजय कहत रहय कि तोरे इन्तजारि मा दफतर देर से जाइ के पड़त ह। दफ्तरवा मा आपकै कित्ता दिहाड़ी कटिन!” मिस्तरी का चेहरवा तमतमाई गवा।
हम दिहाड़ी पर काम करित ह? बरमा दाँत पीसत भए कहेन।
“नाही साहिब।” मिसतरी क गला भरि आय। “बड़के लोगन कै दिहाड़ी से का मतिलब?” मिसतरी भारी कदमन से चुपय चला ग।
इग्यारह बजि गयेन। राघव बरमा बिलारी अइसन चेम्बरवा मा घुसेन। धीरे से रजिस्टर खोलेन। सगरा खीझ उतारत हुवे हस्ताछर घसीट देहेन, अउर समइ के कलमवा मा नव-पन्दरह भरि देहेन।
अनुवादक सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
मूल लेखक – रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
लघुकथा- वक्त की कीमत