छपाक ! उदंड पहियों ने गंदले पानी के छींटों से नहला दिया था मुझे ! उफ्! गुर्राती-सी चीख निकल गई थी मेरे मुँह से।
मुझे अंदाजा ही नहीं था कि शहर की गलियों में बचते-बचाते हुए चलने के बावजूद मेरे कपड़े खराब हो जाएँगे। सड़क किनारे पानी के पाइप में लिकेज की वजह से सड़क पर एक अच्छा खासा चहबच्चा बन गया था। सैकड़ों लीटर पानी की बर्बादी देख पलभर पहले आए गुस्से की जगह दिल में एक हूक-सी उठी थी।
जब हम बच्चे थे, हमारे घर में न तो कुँआँ था, न ही नलकूप। सुबह-शाम हम दोनों भाई-बहन सरकारी नल से पानी भरने के लिए लम्बी लाइन लगाया करते थे। कई बार तो झगड़े और मारपीट भी हो जाती। माँ बहुत परेशान रहा करती थी। थोड़े से रुपये जमा हुए, तो माँ ने घर के आँगन में कुँआँ खुदवाने के लिए मजदूरों को बुलवाया। हम बड़ी उत्सुकता से देखने लगे। मजदूरों ने पहले एक गोल घेरा बनाया। फिर खोदना शुरु किया। मिट्टी के नीचे से राख, टूटी चूड़ियाँ, काँच के टुकड़े, घड़े के टुकड़े निकलते। हमारे लिए यह सब देखना बहुत ही रहस्यमय था। पहले काली, फिर लाल मिट्टी निकलने लगी। मजदूरों के जाने के बाद हम उस गड्ढे में कूद-कूदकर खेलते। गड्डा हर रोज थोड़ा और गहरा हो जाता। हम उसके भीतर ऐसे झाँकते- मानो कोई खजाना निकलने वाला हो। पाँच फुट… दस फुट… बीस… चालीस – पचास फुट..
गहराई के साथ-साथ मिट्टी भी रंग बदल रही थी… पहले काली… फिर लाल… फिर भूरी.. फिर सफेद .. भुरभुरी….
हर रोज मजदूरी देते हुए मां थोड़ा और चिंतित हो उठती। पचास फुट तक जाते-जाते भुरभुरी मिट्टी ने मजदूरों को भयभीत कर दिया था। उन लोगों ने हाथ जोड़ दिए।
अब हम कुँएँ के भीतर नहीं बल्कि, माँ की आंखों के भीतर झाँक रहे थे… जहाँ पानी ही पानी था..!
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