कोई भी साहित्यिक रचना जब हृदय को स्पर्श कर ले, तो उस रचना का सृजन सफल हो जाता है। ऐसी रचनाएँ हमारी सोच, हमारी भावनाओं, हमारे अनुभवों, हमारी संवेदनशीलता से जुड़ जातीं हैं और वे हमें अपनी -सी लगने लगतीं हैं। प्रस्तुत लघुकथाओं में ऐसी घटनाओं का ज़िक्र है, जो आए दिन हमारे आसपास होती रहतीं हैं, या सुनाई देती रहतीं हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका स्रोत मन के भीतर ही है -हमारे दिल-दिमाग़ में निरंतर एक वार्तालाप चलता रहता है, जिसका आभास हमें कभी होता है, कभी नहीं होता! मन के भाव हमारे आचार-विचार-व्यवहार में अपनेआप ही प्रकट हो जाते हैं। इन सात लघुकथाओं में मानव मन की संवेदनाएँ, मानसिक द्वन्द्व का चित्रण तथा उसके परिणामस्वरूप होने वाले व्यवहार व प्रतिक्रिया और उसका हमारे सामाजिक जीवन से संबंध, सब कुछ बहुत ख़ूबसूरत ढंग से दर्शाया गया है। कुछ कहा, कुछ अनकहा -हर लघुकथा ने अपना संदेश बख़ूबी पहुँचाया है! एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक पुट आ जाने से लघुकथाएँ अत्यंत रोचक हो गईं हैं। इस आलेख में निम्नलिखित लघुकथाओं का समावेश किया गया है-
1. निर्णय की घड़ी – चित्रा राणा राघव,2. एक दिन मन का – सुषमा गुप्ता ,3. पति परमेश्वर -पल्लवी त्रिवेदी, 4. फाँस – सुदर्शन रत्नाकर, 5. अकृतज्ञ – शैलेष गुप्त वीर, 6–फाँक-छवि निगम, 7-मैट्रो लाइफ़-अर्चना राय।
1– निर्णय की घड़ी -चित्रा राणा राघव
आज के समय में अधिकतर स्कूलों में लड़के-लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते हैं, जिसे ‘सह-शिक्षा’ कहा जाता है। ये स्कूल सामान्यतः इसीलिए बने हैं कि लड़के-लड़कियों को एक समान शिक्षा एवं परिवेश मिल सके। उन्हें आपस में सामान्य व्यवहार के साथ घुलने-मिलने का अवसर मिले, जिससे उनका मानसिक विकास बिना ‘लड़का-लड़की’ के भेदभाव के, स्वस्थ विचारों के साथ हों। ये बच्चे बारहवीं कक्षा के बाद जब कॉलेज जाते हैं, तो वहाँ एक-दूसरे को किसी दूसरी दुनिया से आई चीज़ न समझकर, शालीनता के साथ पेश आते हैं; परंतु फिर भी, अपवाद हर जगह होते हैं।
लघुकथा ‘निर्णय की घड़ी’ में आए दिन सड़कों पर दिखने वाले दृश्य का चित्रण है। एक लड़का स्कूल से भागता हुआ निकलता है, वहीं से एक लड़की भी निकलती है। लड़की सड़क पार कर रही है, लेकिन वह पहले से ही कुछ घबराई और डरी हुई है, क्योंकि हर दिन कुछ लड़के उसे देखकर अजीब आवाज़ें निकालते हैं और उस पर हँसते हैं। वह लड़का हर दिन यह दृश्य देखता है, शायद उसे उस लड़की की हालत का अंदाज़ा भी है। मगर सिवाय ताकने के, वह हिम्मत नहीं जुटा पाता कि उन लड़कों को रोक सके या फिर उस लड़की को ही अपने साथ चलने को कह सके। वह यही नहीं समझ नहीं पाता है कि वे लड़के उसी लड़की के साथ ऐसा क्यों करते हैं, जबकि और भी लड़कियाँ हैं, ‘जो गोरी हैं और ऊँची स्कर्ट पहनती हैं’; बल्कि कुछ लड़कियाँ तो ‘जानबूझकर मोज़े भी नीचे सरकाकर रखती हैं और खिलखिलाकर हँसती हुई, सड़क पर चलती हैं’।
इतने में उन लड़कों में से एक लड़का उस लड़की के बहुत क़रीब से, उसे छूता हुआ निकल जाता है। वह लड़की एक पल को अपने स्कूल वाले इस लड़के की तरफ़ देखती है, शायद उसे कहीं यह आशा थी कि वह उसकी सहायता करेगा या विरोधस्वरूप कुछ करेगा, मगर अगले ही पल वह नज़रें झुका लेती है। यह पल ही ‘निर्णय की घड़ी’ है, क्योंकि यह पल सिर्फ़ और सिर्फ़ आत्मग्लानि से भरा हुआ है! लड़का यह सोचता है कि यदि लड़की आँखें नहीं झुकाती, तो क्या उसकी स्वयं की आँखें न झुक जातीं! यह आत्मग्लानि की भावना उन दोनों के अलावा और लोग, जो सड़क पर चल रहे हैं -उन सबके लिए भी है।
लेखिका ने बहुत स्वाभाविक ढंग से मनोभावों का वर्णन किया है। दृश्य का चित्रण अपनेआप ही पाठक की आँखों के आगे साकार हो जाता है, मन उद्वेलित होता है और सच में आत्मग्लानि होने लगती है; क्योंकि हम सभी ऐसी परिस्थितियों में मूक दर्शक से अधिक कुछ नहीं हो पाते हैं और आँखें चुराकर निकल जाते हैं। इसके अतिरिक्त, ऊँची स्कर्ट, सरकाए हुए मोज़े, खुली टाई, हँसती-खिलखिलाती हुई लड़कियों (जो कि लड़के की सोच के अनुसार, उन लड़कों का ध्यानाकर्षण करने लिए ज़्यादा बड़ी वजह होनी चाहिए) के साथ उस डरी-सहमी हुई लड़की की तुलना अनायास ही मन में होने लगती है। जो यह बताती है कि वजह बाहर नहीं, कहीं अपने भीतर है – और वह है डर! वह लड़की पहले से ही डरी हुई है, लड़का भी डर के मारे कुछ नहीं कर पाता है और बाकी सब लोग भी आज की दुनिया का ही आईना हैं! कोई किसी के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि हर किसी के अंदर डर समाया हुआ है! हममें से कितने ही लोग होंगे, जो सड़क पर कोई हादसा होने पर किसी की मदद के लिए आगे आएँगे? शायद कोई नहीं! या शायद एक या दो! हम सभी आत्मग्लानि के साथ जी लेंगे, मगर डर से जीत नहीं पाते हैं। यदि वह लड़की ही बाकी लड़कियों की तरह निडर होती या उन्हें झिड़कती, तो शायद वे बदमाश लड़के उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते! अगर वह लड़का थोड़ी हिम्मत करके उस लड़की की सहायता के लिए आगे आता, तो सड़क पर मौजूद और लोग भी शायद आ जाते! मगर यह शुरुआत करे तो कौन करे? गुंडों-मवालियों से उलझने के परिणाम का सामना करने के लिए कहीं न कहीं प्रशासन को भी इतना सशक्त होना होगा कि आम जनता उसपर भरोसा कर सके। वह लड़की तो आगे बढ़ जाती है परंतु उसकी आँखें एक सवाल सबके लिए छोड़ जाती हैं -अन्याय होते देखना और कुछ न करना क्या अन्याय नहीं है?
प्रथम पुरुष शैली में लिखी गई इस लघुकथा में, लेखिका ने लड़के की मनःस्थिति के चित्रण द्वारा हर उस लड़के के हृदय को स्पर्श किया है, जो ऐसी परिस्थितियों में स्वयं को असहाय पाते हैं। साथ ही, बहुत कम शब्दों में, समाज की चादर के कई छेद एक साथ उजागर कर दिए हैं, जिनको सिलने की आवश्यकता हम सभी को है।
-0-
2– एक दिन मन का -सुषमा गुप्ता
कहा जाता है कि हमें आज में जीना चाहिए, जो कि सही भी है! क्योंकि क्या पता, कल हो न हो! मगर यदि कल की कोई आशा ही न हो, तो आज की ख़ुशी में एक अनजानी सी उदासी अपनेआप ही समा जाती है। इंसान के जन्म लेते ही, उसके जीवन की प्लानिंग शुरू हो जाती है, जो उसकी मृत्यु के साथ ही समाप्त होती है।
कोरोना के समय का सबसे भयावह सच यही था, कि कल क्या होगा -पता नहीं! कल हम रहेंगे या नहीं -पता नहीं! कौन साथ होगा, कौन नहीं -कुछ पता नहीं! यह डर कितनों को ऐसे ही खा गया! उस समय का सबसे बड़ा पाठ यही था -जो है, बहुत है! जितना है, बहुत है! आज को जी भरके जी लो! मगर साथ ही मन के अंदर एक डर भी बराबर बना हुआ था क्योंकि कल की उम्मीद डगमगाई हुई थी!
लघुकथा ‘एक दिन मन का’ इसी एक आशा की ज्योति को जीवित रखने की बात का संदेश देती है। इसमें दो पात्र हैं -पहला पात्र एक ऐसे व्यक्ति की मनःस्थिति को दर्शाता है, जो बहुत अकेला है। वह दस दिनों से रोज़ समुद्र के किनारे आकर बैठता है। कभी वह लहरों को गिनता है, कभी रेत पर चलता रहता है। लहरें आती हैं, उसके पैरों को भिगोती हैं, और वापस चली जाती हैं। हमारे जीवन के उतार-चढ़ाव भी ऐसे ही होते हैं -हम उनमें डूबते-उतराते आगे बढ़ते रहते हैं और कभी बैठकर अपने जीवन के उन पलों का हिसाब-किताब करने लगते हैं, जिन्होंने हमारे अंतस् को छुआ होता है!
वह व्यक्ति पलटकर गीली मिट्टी पर छोड़े अपने पैरों के निशान को भी देखता है कि कितनी देर वे रहे और कब लहरों ने उन्हें मिटा दिया! हमारा जीवन भी ऐसे ही क्षणभंगुर है! आज है, कल कौन सी लहर आकर उसे मिटा जाए, उसका नामोंनिशान भी नहीं रहेगा। कोरोना की लहर जब चली थी, तो उस समय जीवन की अनिश्चितता अपनी चरम सीमा पर थी।
उसके पैरों के नीचे रेत है, जिसपर वह चल रहा है, यह रेतीला रास्ता बिल्कुल सीधा है, जिसके अंत में आबादी तो मिलती है, मगर वहाँ उसका घर नहीं है! -यह उसके दर्द-भरे अकेलेपन का द्योतक है! रेतीला दूर तक जाता सीधा रास्ता -जो बताता है कि यह अकेलेपन का सफ़र अभी बहुत लंबा है! उस सीधे रास्ते के अंत में आबादी तो है, मगर उसका घर नहीं है!-अकेलेपन की इंतेहा और क्या होगी!
उसके पास साधन हैं -फ़ोन है, फ़ोन में सिग्नल है और इंटरनेट भी है! आजकल एक मोबाइल फ़ोन ही है, जिसने सारी दुनिया को आपस में जोड़कर रखा है, यहाँ तक कि अपनों को भी! नायक की अपनी दुनिया में कोई नहीं था, मगर वह ज़िंदा है और इस दुनिया में है -इसका एकमात्र एहसास दिलाने वाला उसका फ़ोन था। कोरोना काल में तो फ़ोन से बड़ा साथी और कोई नहीं था! एक फ़ोन ही था, जो हर किसी के साथ था और एक वही डोर थी, जिसने हर किसी को जोड़कर रखा हुआ था! वरना तो जो भी क्वारंटाइन हुआ, उसे कैसे दुनिया से, यहाँ तक कि अपनों से भी काटकर अलग कर दिया गया था -ये जग-ज़ाहिर है!
न जाने क्या सोचकर वह ‘बरसों बाद’ किसी को मैसेज करता है कि ‘तुम्हारे देश में लोग मर रहे हैं!‘, (यहाँ पर दूसरे पात्र का प्रवेश होता है, जो ‘मुझे’ के माध्यम से स्वयं लेखिका का आभास देता है!) यह संदेश लेखिका को मिलता है, जिसे समझने में उसे कुछ वक़्त लगता है कि भेजने वाला कौन है! फिर उसे याद आता है कि आख़िरी बार उसने, उसे स्विट्ज़रलैंड की ट्रेन में देखा था। यह दिखाता है कि उन दोनों के बीच में काफ़ी वर्षों से बातों का कोई आदान-प्रदान नहीं हुआ था। वह उसे जवाब देती है, ‘तुम्हारे देश में भी!’ जिसका नायक की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आता है। इस बार लेखिका के पूछने पर कि ‘वह आजकल क्या करता है’, उसका जवाब आता है, जिसमें उसने लहरों के साथ बीत रही अपनी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिखा होता है। साथ ही यह भी कि ‘क्वारंटाइन कुछ नहीं होता, जैसे कि प्यार, साथ, इंतज़ार, ख़ार जैसा कुछ नहीं होता! ये सब हमारे मन को बहलाने के साधन भर हैं, ये वो ‘सहूलियतें’ हैं, जिन्हें हम ज़िंदगी समझ लेते हैं! अपनेआप को ज़िंदा रखने के लिए हम इन्हीं भावनाओं का सहारा लेते हैं, इनपर ही आश्रित हो जाते हैं। परंतु सच तो यह है कि हमारे भीतर ‘ज़िंदगी या तो होती है, या नहीं होती!’ यदि हम भीतर से ख़ुश हैं, तो बाहर सब अच्छा लगता है और यदि अंदर से दुखी हैं, तो बाहर भी सब वैसा ही महसूस होता है। बाहर हमें जो भी महसूस होता है, दरअसल वो सब हमारे अंतर्मन का ही ‘एक्सटेंशन’ है! कोई हमें बाहर से ख़ुशी या दुख देने की ‘वजह’ नहीं बन सकता। लेखिका भी उससे सहमत होती है।
वह आगे लिखता है कि लेखिका कभी इंटरलाकेन (स्विट्ज़रलैंड का एक मशहूर शहर) स्टेशन पर आए तो बताए, साथ में कॉफ़ी पिएँगे। लेखिका उत्तर में ‘हाँ’ लिखती है, फिर उसके आगे जोड़ती है ‘ज़रूर!’
इस ‘ज़रूर’ के साथ लेखिका का संदेश पाठकों के सामने आता है -वह पहले से ही इस बात को समझती है कि ‘ज़िंदगी सहूलियतों के सहारे नहीं कटती’; बल्कि उम्मीद से कटती है!’ हालात कितने भी ख़राब क्यों न हों, यदि कहीं कोई हल्की सी भी उम्मीद की किरण होगी, तो उन बुरे हालातों से भी लड़ा जा सकता है। यह ‘ज़रूर’ वह आशा की लौ है, जो हमारे अंदर एक जिजीविषा भरती है! यह कल की आस ही हमें आज से लड़ने की शक्ति देती है कि ‘एक दिन मन का’ ज़रूर आएगा!
इस लघुकथा की हर पंक्ति अपने अंदर कोरोना काल से जूझते हुए मानव मन की अकेलेपन की व्यथा और असहायता को प्रतिबिम्बित करती है। देखा जाए तो, हर वह व्यक्ति जो अकेलेपन से जूझ रहा है, उसकी मनःस्थिति यही होती है। लघुकथा में पात्रों का न तो कोई नाम है, न ही कोई संबंध -इस तरह यह केवल उनकी ही नहीं; बल्कि जग की आपबीती बन जाती है! सीधी-सरल भाषा होने के बावजूद लघुकथा अपनेआप में मनोवैज्ञानिक गहनता समेटे हुए है, जो इसे बेहद रोचक बना देता है।
-0-
3– पति परमेश्वर -पल्लवी त्रिवेदी
भारतीय समाज में स्त्रियों को सदैव ही सीमाओं में बाँधकर, थोड़ा दबाकर रखा गया है। वे अपने कार्यक्षेत्र में कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएँ, संस्कार और मर्यादा के नाम पर उनपर पाबंदियाँ अपनी जगह सिर उठाती ही रहतीं हैं। इसकी छटपटाहट में ‘स्त्री-पुरुष एक बराबर’ ‘स्त्री किसी पुरुष से कम नहीं है’ जैसे आंदोलनों ने सिर उठाना शुरू कर दिया।
कभी-कभी तो लगता है, अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में, स्त्री इस अंधी दौड़ में अकेली ही दौड़ रही है, क्योंकि समाज एवं पुरुषों की मानसिकता में तो कहीं कुछ ऐसा विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं देता! आज भी आए दिन सोशल मीडिया पर अधिकतर संदेश व चुटकुले स्त्रियों का मज़ाक बनाते हुए, पत्नियों का पतियों पर अत्याचार दर्शाते हुए, पढ़ने में आते हैं। यही नहीं, पुरुष तो पुरुष, स्त्रियाँ भी उसमें ख़ूब मज़े लेकर, बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती नज़र आतीं हैं।
ऐसे में लघुकथा ‘पति परमेश्वर’ हर उस स्त्री के दिल की भड़ास को शांत करती है, जो ऐसी घटिया और ओछी मानसिकता से त्रस्त है या उसे नापसंद करती है। घटना एक विवाह समारोह की है -उस एक पल की, जहाँ लड़का और लड़की दोनों बहुत ख़ुश हैं! फ़ोटो सेशन शुरू होता है! दूल्हा अपनी साली को अपने दोस्तों से मिलाते हुए बोलता है, ‘ये है मेरी साली, आधी घरवाली!’ यह सुनकर उसके दोस्त ठहाका मारकर हँसते हैं। दुल्हन मुस्कुराती है व अपनी सहेलियों से अपने देवर को मिलवाते हुए परिचय देती है, ‘ये हैं मेरे देवर, आधे पति परमेश्वर!’ -बस! उसका यह कहना किसी बम के धमाके से कम नहीं होता है! यह सुनते ही वहाँ का दृश्य मानों थम सा जाता है! भाई समान देवर के कान सुन्न हो जाते हैं। पति बेहोश होते-होते बचता है। दूल्हे के दोस्तों, रिश्तेदारों सहित सबके चेहरों से मुस्कान ग़ायब हो जाती है! -इस एक पल को लेखिका ने इतने ख़ूबसूरत एवं रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है कि लगता है हम स्वयं वहाँ उपस्थित हैं और उतने ही अचंभित हैं, शॉक में हैं, कि ये क्या बोल दिया!
इस लघुकथा में जिस तथ्य को उठाया गया है, वह रोज़मर्रा के जीवन में इतना आम है कि किसी के संज्ञान में ही नहीं आता! आए दिन घरों के अंदर ही ऐसे भद्दे हँसी-मज़ाक चलते दिखाई देते हैं। शायद बहुत सी स्त्रियों को बुरा भी लगता होगा, क्योंकि बुरा न लगने का कोई कारण ही नहीं है, परंतु या तो वो ‘इम्यून’ हो चुकी हैं, क्योंकि टोकना तो क्या, कोई उसपर ध्यान भी नहीं देता; या संकोच की दीवार आड़े आ जाती है! ऐसे जुमलों को झेलना अब उनकी आदत में ही शुमार हो गया है, जो कि दुखद है! अपमान, अपमान ही है, चाहे वह मज़ाक में ही किया गया हो!
यहाँ दुल्हन ने ‘मुस्कुराकर’ केवल वही दोहराया, जो दूल्हे ने कहा था, परंतु उसके मुँह से निकली हुई वही बात ‘अविश्वसनीय’, ‘अकल्पनीय’ हो गई; ‘पुरुषवाद’ के साथ-साथ पूरी ‘भारतीय संस्कृति’ के लिए घातक बन गई। ‘लक्ष्मणरेखा नाम के गमले का स्टेज से गिरकर टूट जाना’, ‘मर्यादा’ रूपी ‘हेलोजेन लाइट का भक्क से फ़्यूज़ हो जाना’ -ये सारे वे बंधन हैं, जिनका बोझ केवल स्त्रियों के कंधों पर ही है। सड़कों पर तेज़ी से भागती हुई एम्बुलेंस, जिसमें दो स्ट्रेचर -एक पर ‘कोमा में पड़ी भारतीय संस्कृति’, जिसे शायद ‘अटैक’ पड़ गया था; और दूसरे पर ‘घायल पुरुषवाद’, जिसे किसी ने ‘सिर पर गहरी चोट’ मार दी थी (अहं पर चोट) – इन सभी प्रतीकों का उपयोग लेखिका ने बहुत ही बढ़िया व अत्यंत रोचक शैली में किया है। अंत में ‘भारत की सारी स्त्रियों के ठहाका मारकर हँसने की आवाज़ का आसमान में गूँजना’ -यह दर्शाता है कि भारत की सारी स्त्रियाँ इस तरह के अपमान से कितनी त्रस्त हैं! और दुल्हन के उस एक वाक्य ने जो असर किया, उससे उन सभी के दिलों को कितना सुकून मिला कि वे सब एक साथ ठहाका मारकर हँस पड़ीं! यह लघुकथा को एक सुंदर समापन प्रदान करता है।
यह विषय, दिखने में चाहे कितना ही साधारण क्यों न हो, है बेहद शोचनीय एवं संजीदा! इसके विरोध में कहीं से कोई आवाज़ तो उठनी ही चाहिए! यों तो हर मनुष्य अपने आप में पूर्ण होने की क्षमता लेकर जन्म लेता है। ईश्वर ने स्त्री व पुरुष को एक दूसरे के पूरक के रूप में बनाया है -दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे भी हैं तथा स्वतंत्र भी! ये बात अपनी जगह सही है कि स्त्री को पुरुष की बराबरी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं में ही पूर्ण है, सक्षम है! परंतु यह बात भी अपनी जगह अटल है कि उसे पुरुष के दंभ को संतुष्ट करने के लिए अपना अपमान सहने की ज़रूरत नहीं है। आंतरिक पूर्णता का सिद्धांत सामाजिक समानता के महत्त्व को क़तई को कम नहीं करता। दोनों को अपने भीतर मौजूद ऊर्जाओं के संतुलन को विकसित करते हुए एक दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। लेखिका ने यह संदेश विनोदपूर्ण शैली में, अत्यंत ख़ूबसूरती के साथ लघुकथा ‘पति परमेश्वर’ के द्वारा, पाठकों तक बख़ूबी पहुँचाया है।
-0-
4– फाँस -सुदर्शन रत्नाकर
इंसान का दिमाग़ इतना स्वार्थी होता है कि बुरे से बुरे हाल में भी, अक्सर अपना मतलब खोज निकालता है! हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई बार ऐसी विकट परिस्थितियाँ आती हैं, जहाँ हमें हिसाब-किताब करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए, परंतु फिर भी हम ऐसा कर जाते हैं! लघुकथा ‘फाँस’ में नायिका के घर में दस दिनों से सीवर में पानी चोक हो जाने के कारण, पूरा आँगन गंदगी से भर गया होता है। उसे देखने के लिए तीन लोग आते हैं। एक आदमी के ढक्कन हटाते ही उसका हाथ कीचड़ से सन जाता है, और इतनी तेज़ दुर्गंध आती है, कि नायिका से वहाँ खड़े नहीं रहा जाता और वह कमरे में चली जाती है। वहाँ से शीशे के दरवाज़े से वह उन्हें काम करते हुए देखती है। सफ़ाई करने वाला उसमें एक लंबा बाँस डालकर कोशिश करता है कि जो कुछ फँस गया होगा, निकल जाएगा; परंतु अकेले वह कर नहीं पाता, तो दूसरा आदमी बाँस के दूसरी तरफ़ से ज़ोर लगाकर हिलाता है। नायिका शीशे की खिड़की से देखते हुए सोचती है कि जिस दुर्गंध में वह खड़ी भी न रह पाई, वे लोग उसी में खड़े होकर कैसे काम रहे होंगे! यह सब देखते-सोचते वह उन्हें एक हज़ार रुपये देने का निश्चय करती है और अपने पर्स से एक नोट पाँच सौ, दो नोट दो सौ और एक नोट सौ का निकालकर हाथ में रख लेती है।
उधर बाँस जब धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, तो समस्या समझ में आने लगती है। अब तीसरा आदमी भी ज़ोर लगाकर बाँस हिलाता है। इस सब में पाँच-सात मिनट लगते हैं। वे लोग बाँस बाहर निकाल लेते हैं। नायिका देखती है कि पानी थोड़ा-थोड़ा निकलने लगा है। अब इंसानी दिमाग़ की फ़ितरत अपना काम दिखाने लगती है -वह सोचती है कि ‘अरे! बस इतने से काम के लिए तो पाँच सौ ही बहुत हैं।’ सफ़ाई करने वाला आदमी अब उसमें हाथ घुसाकर, एक फँसी हुई ईंट निकालता है, जिसके कारण सीवर चोक हुआ होता है। ईंट निकलते ही पानी और तेज़ गति से बहकर मेनहोल में जाने लगता है। कुल बीस मिनट में सारा काम हो गया था। नायिका के दिमाग़ ने फिर जोड़-घटाना किया -‘इतनी सी देर के पाँच सौ रुपये ज़्यादा हैं’, और यह सोचकर उसने उन्हें तीन सौ रुपये दे दिए। उन लोगों ने वे रुपये ले लिये और चले गए।
वातावरण में फैली दुर्गंध अब ख़त्म होने लगी थी, आँगन में भरा दस दिनों का कीचड़, सीवर में बह गया था। मगर नायिका के दिमाग़ में एक ‘फाँस’ साँझ तक अटकी रही कि ‘बीस मिनट के लिए दो सौ काफ़ी थे, उसने बेकार ही तीन सौ दे दिए!’
लघुकथा समाप्त होते-होते ऐसा लगने लगता है कि घर का कीचड़ तो फिर भी साफ़ हो गया; मगर असली कीचड़ तो नायिका के दिल-दिमाग़ में भरा हुआ है, जिसमें स्वार्थ, मौकापरस्ती, असहिष्णुता एवं असंवेदनशीलता की ऐसी ईंटें अटकी हुई हैं, जिन्हें निकालना शायद ही किसी के बस की बात हो!
लेखिका ने पूरी परिस्थिति का वर्णन बहुत ही सहज एवं चित्रात्मक ढंग से किया है और अंत तक उत्सुकता बढ़ती जाती है कि अब शायद नायिका का अंतर्मन जागे और वह उन काम करने वालों को उनकी मेहनत के सही दाम दे दे, मगर नहीं! होता इसके विपरीत ही है, जो कि पाठक के मन में भी एक फाँस चुभो जाता है।
-0-
5– अकृतज्ञ – शैलेष गुप्त ‘वीर’
‘नेकी कर, दरिया में डाल!’ ये तो सुना-समझा हुआ है, मगर नेकी के बदले में सामने से कौन सा पत्थर आकर सिर पर गिर जाए, इसका कुछ पता नहीं होता! यही कारण है कि आजकल किसी का भला करने के पहले इंसान सौ बार सोचता है।
लघुकथा ‘अकृतज्ञ’ एक ऐसे ही बुज़ुर्ग की व्यथा के बारे में है। बसों में अक्सर भीड़ होने के कारण कुछ भले लोग अपनी सीटें छोड़कर महिलाओं, वृद्धों अथवा बच्चों को दे देते हैं -ये उनकी नेकदिली है, भलमनसाहत है! मगर इसका आभार मानने की जगह यदि कोई उनपर ही उल्टे-सीधे आरोप लगाने लग जाए, तो क्यों कोई किसी की मदद करने आगे आएगा! लघुकथा ‘अकृतज्ञ’ में विमल बाबू जिस बस में बैठे थे, उसमें इतनी अधिक भीड़ होती है कि बैठना तो छोड़ो, खड़े होने तक की जगह नहीं थी। तभी एक दम्पती चढ़ते हैं, जिनके साथ एक दुधमुँहा बच्चा भी होता है। विमल बाबू को उस बच्चे को लिए महिला पर तरस आता है और वे उठकर अपनी सीट उस महिला को दे देते हैं। मगर कुछ ही देर बाद उनके घुटनों में असहनीय दर्द होने लगता है। तभी उस महिला के साथ वाली सीट पर बैठा यात्री उतरने के लिए सीट खाली करता है, तो विमल बाबू बैठने के लिए आगे बढ़ते हैं। वह महिला अपने पति को बैठने का इशारा करती है, जो कि पहले ही उस सीट पर बैठने की तैयारी में था। विमल बाबू उससे कहते हैं कि वह उन्हें बैठने दे, क्योंकि उनके घुटनों में बहुत दर्द हो रहा है। इस पर वह आँखें तरेर कर बड़ी बदतमीज़ी से विमल बाबू से बोलता है कि ‘उन्हें कुछ तो लिहाज़ करना चाहिए! बगल में बैठने के लिए क्या उन्हें उसी की औरत मिली है?’ विमल बाबू फिर भी उसे अपनी व्यथा बताने की कोशिश करते हैं कि तभी उसकी पत्नी, जिसको सीट देने के लिए विमल बाबू ने अपनी सीट छोड़ी होती है, अपने पति से कहती है, ‘सफ़र में तरह-तरह के लोग मिलते हैं! वह क्यों किसी के मुँह लग रहा है!’ और फिर उसका पति आराम से उसकी बगल वाली सीट पर बैठ जाता है। बेचारे विमल बाबू अपनी कर्त्तव्यपरायणता पर पछताने के सिवा और कुछ नहीं कर पाते।
यह लघुकथा बताती है कि क्यों आजकल समाज में इतनी असंवेदनशीलता फैल गई है! किसी की सहायता करने के बदले कोई वापस सहायता न करे, यहाँ तक तो ठीक है, कि चलो! हमने अपना कर्त्तव्य निभाया, अपना कर्म किया। परंतु सहायता करने के बदले कोई इस तरह भरी भीड़ में अपमानित करे, तो क्या अगली बार कोई मदद के लिए आगे आने की सोचेगा भी? यह तो एक बहुत छोटी व साधारण घटना है! कई बार बड़ी-बड़ी घटनाओं में भी इंसान यही सोचकर पीछे हट जाता है कि कहीं लेने के देने न पड़ जाएँ! यह एक कड़वा सच है, जिसको समाज में रहने वाला हर व्यक्ति भुगत रहा है। उस दम्पत्ति जैसे अधिकतर लोग ऐसी मछली हैं, जो पूरे समाज रूपी तालाब को गंदा कर रहे हैं, इंसान को इंसानियत से दूर कर रहे हैं। लेखक ने बहुत प्रभावी ढंग से अपना संदेश पाठकों तक पहुँचाया है।
6 फाँक -छवि निगम
आज में जीते हुए हम भूल जाते हैं कि जो बीज आज हम बो रहे हैं, कल वही पेड़ बनकर हमें फल देगा। सो, जो बोएँगे, वही काटेंगे! लघुकथा ‘फाँक’ इसी कहावत को सार्थक करती है! कमला जी का बेटा जब शाम को घर आता है, तो आम की ख़ुशबू से घर महक उठता है। कमला जी झट से बेटे से पूछतीं हैं कि वह ‘दशहरी’ आम लाया है क्या! बेटा तो जवाब में ‘अं-आं’ ही करता रह जाता है, परंतु बहू ‘नहीं तो अम्मा!’, कहकर, झट से पति के हाथ से झोला लेकर अंदर चली जाती है, जो कमला जी भी देख लेती हैं। उन्हें बहुत दुख होता है। लखनऊ के विशेष एवं जग प्रसिद्ध आम ‘दशहरी’ की ख़ुशबू व स्वाद, आम के शौकीन लोग बहुत अच्छे पहचानते हैं। लेखिका ने यह माइन्यूट डिटेल बड़ी ख़ूबसूरती से उजागर किया है, जिससे पता चलता है कि कमला जी को आम कितना अधिक पसंद होगा और इसके लिए उन्हें जिस तरह की ‘ना’ सुननी पड़ी, उससे उनका दिल किस प्रकार ‘दो फाँक’ में कटा होगा!
उन्हें पता होता है, कि घर में खीर, हलुआ आदि सब पकवान बनते रहते हैं, मगर उन्हें वही लौकी-तरोई और पतली दाल दे दी जाती है। यह बात उन्हें बहुत लाचार महसूस कराती है व उन्हें बेहद गुस्सा आता है। वे सोचतीं हैं, ‘माना कि उन्हें शुगर की समस्या है, परंतु उसके लिए वे दवाई लेतीं हैं, चलती-फिरती रहतीं हैं, घर के छोटे-मोटे काम भी कर देतीं हैं, अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखतीं हैं। यही नहीं, घर में सबकी फ़रमाइशें -जैसे कि साग साफ़ करना, आचार डालना, मुन्ने की मालिश इत्यादि भी वे करती रहतीं हैं -तब किसी को उनकी तबियत का ध्यान नहीं आता, फिर उनको थोड़ा सा मीठा खाने देने में ही क्यों इतनी रोक-टोक है!’ यह विचार उन्हें अंदर तक गुस्से में भभका देता है। वे उठकर अंदर जाने लगतीं हैं कि तभी उनकी नज़र बरामदे में, कबाड़ से ढकी हुई, एक बेंत की आरामकुर्सी पर पड़ती है, जिसे देखकर उनको किसी का ध्यान आता है -उनका शरीर सुन्न होने लगता है और उनके कान में एक घिघियाती हुई आवाज़ गूँजने लगती है –‘ज़रा सा दे दो बहूरानी … बस एक फाँक!’ वे आँखों में नमी लिए, घिसटते क़दमों से वापस लौट पड़ती हैं।
‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन’ सिद्धांत की यह मान्यता है कि हम ब्रह्मांड में जो कुछ भी छोड़ते हैं -अपने कर्म के रूप में, वचन के रूप में, यहाँ तक कि सोच के रूप में भी -सब वापस लौटकर हमारे पास आता है। हर इंसान हमारे जीवन में, किसी न किसी रूप में, हमें कुछ देने या हमसे कुछ लेने के लिए ही आता है -फिर चाहे वो हमारे जीवन का हिस्सा हो या फिर चलते-फिरते मिलने वाला कोई व्यक्ति! इसीलिए ज्ञानियों ने ‘कर्म को सबसे प्रधान’ बताया है -कि हमें अपनी सोच, अपने कर्म, सही दिशा में व अच्छे रखने चाहिए, क्योंकि लौटते वही हैं, व्यक्ति तो सिर्फ़ माध्यम बनता है! लघुकथा ‘फाँक’ इसी सिद्धांत को सिद्ध करती है। कमला जी के सामने उनके ही कर्म आकर खड़े हो गए हैं। आज उनकी बहू उनके साथ वही कर रही है, जो कभी उन्होंने किया था और उनकी ‘नम आँखें’ व ‘सुन्न होता शरीर’ इस बात का गवाह है कि उन्होंने जो उस समय किया, वह अन्याय ही था।
यदि किसी को शुगर की समस्या है, तो उसे मीठे का परहेज़ करना आवश्यक है! इसके अतिरिक्त उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार चलते-फिरते, काम भी करते रहना चाहिए -कमला जी यह सब कर रही होतीं हैं। तो इस उम्र में यदि उनका थोड़ा-बहुत मीठा खाने का दिल कर भी रहा है, तो दिया जा सकता था। मगर यहाँ उनकी बहू ने उनके भले का सोचकर कुछ नहीं किया -उसने तो ‘झट से झोला लेकर, चुपचाप अंदर रख दिया!’ और बेटे का ‘अं-आं’ करके चुप रह जाना, उसका डरपोक होना ही दर्शाता है। आजकल तो डॉक्टर भी इस उम्र में किसी को अपना मन मारकर रहने की सलाह नहीं देते! यदि हालत ज़्यादा गंभीर न हो, तो थोड़ी-बहुत बदपरहेज़ी करने की छूट वृद्धावस्था में सबको है!
हम अक्सर ही जाने-अनजाने कुछ ऐसे कर्म कर बैठते हैं, जो किसी के दुख का कारण बन जाते हैं। वृद्ध माता-पिता अपने बच्चों से सहानुभूति से अधिक, समानुभूति की आस रखते हैं! यह बात न कभी कमला जी ने अपने अतीत में समझी, और न ही वर्तमान में उनकी बहू समझ पा रही है। दूसरी तरफ़ उनका बेटा है, जो अपनी पत्नी के ग़लत व्यवहार पर कुछ बोल ही नहीं पाता -यह उसकी कमज़ोरी दर्शाता है। माता-पिता बच्चों का पालन-पोषण, अपना सर्वस्व वारकर करते हैं, उन्हें जीवन में योग्य बनाते हैं। यदि बच्चे, वृद्धावस्था में अपने पालनहार की ऐसी छोटी-छोटी इच्छाएँ भी नहीं पूरी कर पाएँ, तो जीवन में वे क्या ही करेंगे!
इस लघुकथा में लेखिका ने हरेक पात्र के व्यवहार से, उनसे बिना अधिक शब्दों का उपयोग कराए, उनका बहुत ही सजीव चरित्र चित्रण किया है! शब्दों से अधिक उनकी बॉडी लैंग्वेज मुखर रही है। इसके अतिरिक्त, बहू के दुर्व्यवहार के सामने बेटे की चुप्पी, इस बात का प्रमाण बनती है कि जब कमला जी ने ऐसा किया होगा, तो उस समय उनके पति भी चुप ही रहते होंगे! इतिहास स्वयं को कैसे दोहराता है –‘फाँक’ लघुकथा उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है!
वृद्ध माता-पिता के पास उनकी बीमारियों व कभी-कभार कुछ ‘मन की बात’ तथा ‘मन का स्वादिष्ट खाना’ खाने की इच्छा के सिवाय और बचता ही क्या है! बाहर की दुनिया से वे एक तरह से कट ही जाते हैं, यदि घर की दुनिया भी ऐसे ओछे व्यवहार से उन्हें काट देगी, तो वे बेचारे जियेंगे कैसे? -यह सवाल इस लघुकथा को पढ़ते हुए अनायास ही मन को विचलित करने लगता है। आख़िर ‘ओल्ड एज होम्स’ की संख्या दिन-ब-दिन ऐसे ही तो नहीं बढ़ रही है!
-0-
7 मेट्रो लाइफ़ -अर्चना राय
कई वर्षों पहले, परिवारों में जब कई-कई बच्चे होते थे, तब स्थिति यह होती थी कि कमाने वाला केवल एक होता था, खाने वाले कई! ऊपर से बच्चों का पालन-पोषण, उनकी पढ़ाई-लिखाई, सबका ख़र्चा एक बेचारे, घर के मुखिया के कंधों पर ही होता था। बड़े संयुक्त परिवार होते थे, सब मिल-जुलकर रहते थे। पुरुष बाहर काम संभालते थे, महिलाएँ घर का काम देखतीं थीं। फिर ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ का चलन चला। बेटियों की पढ़ाई पर ध्यान दिया गया, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया, तो माता-पिता दोनों काम करने लगे। पढ़ाई के साथ विभिन्न उद्योगों का विकास हुआ, अच्छी बड़ी कंपनियाँ आईं, शहरों ने उन्नति की। छोटे शहरों से पढ़-लिखकर बच्चे बड़े शहरों में आकर बसने लगे। रहने के लिए फ़्लैटों का निर्माण होने लगा। बड़े-बड़े उन्नत एवं आधुनिक शहर महानगर या ‘मेट्रो’ कहलाने लगे।
विकास व उन्नति के साथ टेक्नोलॉजी भी आगे बढ़ी! आधुनिक संसाधनों जैसे टी. वी, मोबाईल फ़ोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया… आदि, सबका चलन ख़ूब तेज़ी से बढ़ा। इंटरनेट ने बहुत से काम आसान कर दिए! परंतु सृष्टि का नियम है कि जब एक हाथ से कुछ मिलता है, तो दूसरे हाथ से कुछ चला भी जाता है! एक ओर इंटरनेट ने बाहरी दुनिया की दूरियों को कम किया, तो दूसरी ओर क़रीबी दुनिया से दूरियाँ बढ़ानी शुरू कर दीं। लोग अपना जीता-जागता परिवार छोड़कर, सोशल मीडिया पर दोस्ती बढ़ाने लगे। घर पर माँ-बाप, बच्चों, पति-पत्नी की भले ही ख़बर न हो, सोशल मीडिया पर दुनिया की ख़बर रखना, सबका हालचाल लेना, दुख-सुख में साथ देना अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया।
लघुकथा ‘मेट्रो लाइफ़’ ऐसे ही एक दम्पत्ति की दिनचर्या के बारे में हैं। ‘महानगरीय जीवन शैली की चाल में चाल मिलाने के लिए’ ‘थके-हारे’ पति-पत्नी दोनों रात के नौ बजे के आसपास ऑफ़िस से निकलकर, एक आलीशान इमारत के फ़्लैट के सामने कार से उतरते हैं, एक-दूसरे को ‘फीकी-थकी मुस्कान’ के साथ ‘हाय-हैलो’ बोलते हैं। वहीं एक डेलीवरी बॉय उन्हें खाने का पार्सल थमाता है। लिफ़्ट से पचीसवें फ़्लोर पर दोनों आते हैं, पत्नी ताला खोलती है। पति आकर ड्रॉइंग रूम में ‘टी. वी. ऑन करके’ सोफ़े पर ‘ढेर’ हो जाता है। पत्नी खाना निकालकर पति को बुलाती है। दोनों टी. वी. देखते हुए खाना खाते हैं, अपनी-अपनी प्लेटें धोकर रखते हैं, फिर बिस्तर पर ‘अपनी साइड’ पर आकर लेटकर, ‘आधी रात तक’ मोबाइल पर विभिन सोशल मीडिया नेटवर्क पर अपने दोस्त/रिश्तेदार/पसंदीदा सेलेब्रिटी/स्पोर्ट्स प्लेयर्स… इत्यादि की पोस्ट/जन्मदिन/वेकेशन आदि पर जो-जो लाइक/कमेन्ट करना होता है, करके, एक-दूसरे को गुडनाइट बोलकर, एक-दूसरे की ओर पीठ करके सो जाते हैं।
जो पति-पत्नी रात के नौ बजे तक ऑफ़िस में काम करते हैं, उनके अंदर क्या ही एनर्जी बचेगी घर के लिए, या एक-दूसरे के लिए! ऊपर से मेट्रो शहरों में घर से ऑफ़िस की दूरी, ट्रैफ़िक की थकान -कम से कम एक घंटा तो कहीं नहीं गया! घर आकर खाना बनाने की हिम्मत ही नहीं बचती, सो बाहर का खाना (जिनकी रोज़ी -रोटी भी ऐसे ही लोगों के कारण चलती है!), फिर स्वयं प्लेटें धोना, क्योंकि जब वे घर पर ही नहीं रहते, तो मेड का क्या करेंगे! और दो लोगों की दो प्लेटें धोने के लिए कौन मेड रखेगा! हालांकि पैसा बहुत है उनके पास, जो इतनी ‘आलीशान इमारत’ में ‘पचीसवें फ़्लोर’ पर रह रहे हैं। मगर उस पैसे से सुख क्या मिला? पति-पत्नी एक दूसरे को ‘डियर/ डार्लिंग’ कहकर संबोधित तो अवश्य कर रहे हैं, मगर यह डियर अंदर से उतना ही खोखला लग रहा है, जितना कि उनका जीवन! साथ ही, ऐसा प्रतीत होता है कि पति-पत्नी दोनों में एक प्रकार का अनकहा समझौता हो चुका है और दोनों उसी ‘मशीनी वातावरण’ में संतुष्ट हैं! दोनों का सोने के पहले अपने मोबाईल के साथ ‘अपनी-अपनी बेडसाइड’ पर जाकर लेटना’, सोशल मीडिया पर ‘आधी रात तक’ अपनी प्रतिक्रियाएँ देकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और ‘पलकें भारी होने पर’ एक-दूसरे को गुडनाइट कहकर, मुँह फेरकर सो जाना!… इससे ज़्यादा शब्दों का आदान-प्रदान तो उनका डेलीवरी बॉय के साथ हो गया था! गिनती के वे कुछ पल, जो पति-पत्नी के ऑफ़िस से लौटने के बाद बचते हैं, उनका उपयोग उन्होंने कैसे किया (या कहना चाहिए, उन्हें व्यर्थ कैसे गँवाया!)- इसका बहुत कम शब्दों में, जो सटीक वर्णन लेखिका ने इस लघुकथा में किया है, वह प्रशंसनीय है! यहाँ पर एक बात और उभर कर आती है -वह है, महानगर में रहने वालों लोगों का मशीनी स्वभाव –‘शेख़! अपनी-अपनी देख!’ महानगर में रहने वाले अधिकतर लोग, एक प्रकार से ‘भीड़ में अकेले’ ही होते हैं! किसी को किसी से मतलब नहीं! जिसको जिससे जितना काम, उतनी ही बात! बाहर-बाहर से सब मिलते हैं, दिखावा करते हैं, परंतु दिल से शायद ही कोई जुड़ता होगा! मगर यही मशीनी दिखावा जब पति-पत्नी के बीच पनपने लगता है, परिवार में समाने लगता है, तो रिश्तों में सेंध लगाने लगता है! लघुकथा ‘मेट्रो लाइफ़’ के पति-पत्नी दिन भर ऑफ़िस में समय बिताकर जब रात को मिलते हैं, तो ‘थकी मुस्कान’, ‘थकी हाय/हैलो’ के साथ मिलते हैं! परंतु घर आने के बाद, खाना खाने के दौरान और उसके बाद भी, उनके बीच कोई अपनी या पारिवारिक बातचीत नहीं होती, जबकि ‘आधी रात तक’ वे जागकर, सोशल मीडिया पर विचरण कर रहे होते हैं -वो भी किसी कार्यवश नहीं! -या तो इसलिए कि वहाँ दिखना/दिखाना/आडंबर उनके लिए ज़रूरी है, या फिर, यह कहीं न कहीं उनकी नीरसता भरी असलियत से दूर होकर, सुकून देने वाला एक ‘एस्केप’ भी है! उन दोनों का दिन कैसा गया, इसकी उन्हें चिंता नही, दिनभर दुनिया में क्या हुआ, इसका ‘अपडेट’ उन्होंने सोशल मीडिया से अवश्य ले लिया। उनके आपस के साथ की दुनिया कहाँ रुक गई है, इसकी उन्हें कोई ख़बर नहीं, कोई परवाह नहीं! यही ‘कम्यूनिकेशन गैप’ अक्सर आगे चलकर पति-पत्नी के अलगाव का मुख्य कारण बन जाता है और महानगरों की जीवन शैली के साथ अपने रिश्तों में संतुलन न बना पाने के कारण, कई परिवार इसका शिकार हो रहे हैं।
इसके अतिरिक्त रात तक ऑफ़िस में काम कर-करके थक जाना, फिर कार में घंटों बैठकर घर आना, घर आकर सोफ़े पर ढेर हो जाना और फिर बिस्तर पर लेटकर आधी रात तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सिर और आँखें घुसाए रहना -यह आजकल का लाइफ़स्टाइल बन गया है, जो आज की पीढ़ी की बढ़ती हुई ख़राब सेहत का बहुत बड़ा कारण है! इस कुचक्र को तोड़ना बहुत आवश्यक है!
इस लघुकथा की हर पंक्ति आज के मशीनी युग का कच्चा चिट्ठा है! हर रिश्ता इंटरनेट की भेंट चढ़ चुका है। हर कोई ‘रीलों’ में अपनी ढपली बजाता हुआ नज़र आता है। महानगरीय जीवन-शैली की चाल में चाल मिलाने के चक्कर में, आज लोग क्या खो रहे हैं, इसका उन्हें अंदाज़ा ही नहीं है! हर कोई इस दौड़ में शामिल है! आगे बढ़ने की होड़ में, पीछे उनसे क्या छूटा जा रहा है, इसका उन्हें होश ही नहीं है! है। हर कोई अपने मोबाईल, लैपटॉप में सिर दिए बैठा दिखाई देता है। माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे -सबकी आज अपनी अलग ही दुनिया बन गई है, जिसमें सोशल मीडिया के लोग तो शामिल हैं, लेकिन अपने परिवार के लोग नहीं! ये रोग केवल शहरों में ही नहीं, गाँव तक में पहुँच गया है। बड़े शहरों की चकाचौंध सीधे-सादे गाँववासियों को भी अपनी ओर खींच ले रही है, जिसका लाभ तो पता नहीं कितना हुआ, पर वे रास्ता अवश्य ही भटक गए हैं!
लघुकथा ‘मेट्रो लाइफ़’ आज लगभग हर घर में जी जा रही है! लेखिका ने बहुत ख़ूबसूरती और सच्चाई के साथ, आज की दुनिया का ऐसा आईना सामने रखा है, जिसमें यदि मन की सच्चाई के साथ झाँका जाए, तो मनुष्य का, रिश्तों का जो रूप दिखाई देता है, वह बेहद डराने वाला है!
-0-
अनिता ललित, लखनऊ ,ई मेल: anita.atgrace@gmail.com
सन्दर्भः
1. निर्णय की घड़ी – चित्रा राणा राघव (लघुकथा डॉट कॉम – फ़रवरी 1, 2026)
2. एक दिन मन का – सुषमा गुप्ता (लघुकथा डॉट कॉम – नवंबर 1, 2023)
3. पति परमेश्वर -पल्लवी त्रिवेदी (लघुकथा डॉट कॉम – जनवरी 2, 2015)
4. फाँस – सुदर्शन रत्नाकर (लघुकथा डॉट कॉम – अगस्त 1, 2025)
5. अकृतज्ञ – शैलेष गुप्त वीर (लघुकथा डॉट कॉम – जनवरी 1, 2026)
6-फाँक/ छवि निगम/ लघुकथा डॉट कॉम सितम्बर 1, 2022
7-मेट्रो लाइफ / अर्चना राय- गद्यकोश
-0- ई मेल: anita.atgrace@gmail.com