मशहूर चित्रकार पिकासो किसी भी चित्र को उकेरते समय विचार को ही प्रबल समझते हैं। उनकी नजर में चित्र में विचार ही मूर्तिमान रहते हैं। आज का लघुकथा सृजन भी ऐसे उसी चित्र के समान ही विचारों का उत्प्रेषण है। यथार्थ को बिसरा कर कोई भी रचना पूर्ण नहीं कहीं जा सकती। लघुकथा में जैसा स्वरूप आज विकसित हो रहा है, उसमें यथार्थ है, लेखन का कौशल है और पाठक को नींद की खुमारी से जगाने का फरमान है। लघुकथा का कथ्य अंतस् में गहराई तक पहुँचता है। उसका अंत सहज ही पाठक मन को छू लेता है। यह विधा कुरीतियों को आईने में दिखती तस्वीर की तरह पेश करती है और फिर पाठक मन में हलचल मचाने लगती हैं। व्यंग्य की झलक विवेचन की और उन्मुख होती है और निहित संदर्भ यथार्थ-बोध पैदा करने लगते हैं। यह झलक पाठक की मनोवृत्ति को जगाने का काम भी करती है। रचनाकार को चाहिए कि जिस जमीन पर वह खड़ा है, उस जमीन की पीड़ा को महसूस करे और अपने बुद्धि कौशल से घटना को इस कदर शब्दों में बाँधे एवं प्रस्तुत करे कि पढ़ने वाला सच से सामना कर सके। संवादात्मक कथा हो या कथ्यात्मक ढंग में समझ देने की प्रक्रिया हो, कथ्य को ऐसे मोड़ से गुजरने दें कि पढ़ने वाला विचार करने पर बाध्य हो सके ! लेखक की दृष्टि उसे ऐसा रूप देने में सक्षम रहे कि सीख देना भी साथ चले और उद्देश्य भी परिपूर्ण रहे।
लेखन में हर रचनाकार का अपना एक खास ढंग विकसित होता रहता है। पाठक की जिज्ञासा कथा में निहित नीति संदर्भ को साधने की रहती है। उसी के जरिए वह सोचने पर विवश भी होता है। अच्छी लघुकथाएँ जहाँ संवेदना को जगाती हैं तो कुछ रसासिक्त वृत्ति को भी पैदा करती हैं। यथार्थ के सच से सामना भी कराती हैं तो कुछ लघुकथाएँ चैतन्य के आचमन को स्पर्श भी करती हैं। कुछ यथार्थ का सच परोसती हैं और पाक को सोचने पर विवश भी करती है।
मेरी पसन्द की पहली लघुकथा है–सतीशराज पुष्करणा की ‘आत्मिक बंधन‘ यह कथा सच से पर्दा उठाती है और परिवेश की परतें खोलती है। यह लघुकथा जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली प्रीत से सराबोर करती कथा है। यह कथा जहाँ पति-पत्नी के आत्मिक प्रेम को दर्शाती है, वहीं अपने संस्कारों और अपने धर्म-संस्कृति का रोपण भी करती है। शीत लहर में योगेश्वर और उसकी पत्नी मौसम को कोस रहे हैं। सर्दी से बचने के प्रयास में पति को पत्नी का ख्याल रहता है तो पत्नी को पती की चिंता। गरीबी में दोनों के पास एक-एक रजाई से अलग एक ही कम्बल है। रात गहराई तो सर्दी बढ़ती चली गई। पत्नी कम्बल को पति की रजाई पर ओढ़ा देती है। पत्नी को पति की चिंता है तो पति भी पीछे नहीं हट रहे। सर्द रात में वह कंबल को पति की रजाई पर ओढ़ा देती है लेकिन नींद आ जाने पर पति उसे पत्नी की रजाई पर ढ़क देता है। सुबह नींद से जागने पर पत्नी ने पाया कि कंबल उसकी रजाई पर है। यहाँ रचनाकार ने संस्कारों का रोपण किया है। विगत में ये छोटी-छोटी कथाएँ मानस को नैतिक सीख देने का काम करती आई हैं। आज यथार्थ के दर्द और तकलीफ के साथ प्रीत को दिखाने का नजरिया पाठक मन पर पड़ने वाले प्रभाव को इंगित करता है। लघुकथा की यही खासियत भी है कि वह पाठक मन में हलचल पैदा कर सके। पति ने अपनी रजाई से कंबल उतारकर पत्नी की रजाई पर ओढ़ा दिया। पत्नी का चेहरा देखकर उन्हें संतोष हुआ कि अब उसे जाड़ा नहीं लग रहा है। यह आत्मिक बंधन भारतीय संस्कृति की ही पहचान है।
मेरी पसन्द में दूसरी लघुकथा है, कमल चोपड़ा की मण्डी में रामदीन।
कमल चोपड़ा की ‘मण्डी में रामदीन’ लघुकथा में लेखक ने मुक्त यथार्थवाद के सहारे पाठक को जगाने का काम किया है। उसने मंडी में किसान के साथ हो रही ज्यादती और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है। रामदीन जमीन जोत-बो कर कड़ी मेहनत से फसल उगाता है। उसे बेचने जब वह मण्डी पहुँचता है तो दलाल बोलता है–‘मण्डी में बहुत मंदी है।’ रामदीन हैरान होता है और सोचता है–‘यह अगर मंदी है तो तेजी कैसी होती है? बाजार में तो तरबूज दस रुपये किलो बिक रहा है?’ बहुत रिरियाने के बाद भी मंदी के नाम पर फसल का उचित दाम उसे नहीं मिल पाया। बाजार में तरबूज की मांग बहुत है। तरबूज बिक भी खूब रहा है। खरीदार भी बहुत हैं लेकिन भरी गाड़ी तरबूज के उसे डेढ़-दो हजार से ऊपर कोई देने को तैयार नहीं है। दलाल को दो सौ रुपये कमीशन भी चाहिए। इस भाव में तो गाड़ी का किराया भी नहीं निकल पाएगा? सौ सवा सौ चाय-पानी के, उसकी मेहनत भी उसे नहीं मिल पा रही थी। वह असंजस में खड़ा का खड़ा रह गया। तरबूज से भरी गाड़ी का ड्राइवर उसे जल्दी से गाड़ी खाली करवाने को जिद करता रहा। रामदीन विवश खड़ा था कि तभी पुलिस वाला डंडा फटकारता हुआ आता है। कहता है–‘कागज दिखाओ, लाइसेंस दिखाओ, चालान होगा, नहीं तो एक हजार निकालो।’ रामदीन रोने लगा। उसे इस कदर रोते देख उसने सौ रुपये लेकर उसकी जान छोड़ दी। मौसम बिगड़ने लगा तो हार मानकर रामदीन ने अट्ठारह सौ रुपये में ही भरी गाड़ी तरबूज बेच दिया। अट्ठारह सौ रुपये ही गाड़ीवाले का किराया था, उसे चुकाया और निपटा दिया। इस बीच गाड़ी के ड्राइवर और रामदीन के मध्य जो वार्तालाप हुआ, वह किसान की दुर्दशा का बखान था। ऐसी इस व्यवस्था में रामदीन के पास घर जाने का किराया तक नहीं बचा था। वह दुःखी और उदास एक तरफ खड़ा था कि व्यापार मंडल का एक आदमी इक्यावन रुपये की पर्ची काटने आ धमका। किसान खीज उठा और बोला–‘मैंने माल बेचा कहाँ है, मेरे माल को तो यहाँ लूट लिया गया है।’ और कथा का अंत हुआ। यहाँ इस कथा में पाठक और चरित्र दोनों को विवश कर देना ही लेखक का उद्देश्य है। इस व्यवस्था को बदल डालने के लिए पाठक को सचेत करना और एकजुट आवाज देने के लिए तैयार करना मकसद है। ऐसे परिवेश के लिए संघर्ष करना भी अनिवार्य है। लेखक की कोशिश रही है कि वह गलत के प्रति पाठक को अगाह करे। चुनौतीपूर्ण इस यथार्थ के प्रति डटकर खड़े होने की सीख दे। यह क्रांति की शुरुआत है। कथा में निहित कथ्य और शिल्प पाठक को प्रश्न करने और विचार करने की सलाह भी देते हैं। पाठक का विचलित होना और प्रश्न करना ही उसकी तर्कशक्ति को जगाने का काम करता है।
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1-आत्मिक बन्धन / सतीशराज पुष्करणा
लगभग पूरे उत्तर एवं पूर्व भारत में ऐसी शीतलहर चल रही थी कि नगरों में जगह-जगह अलाव जलते दिखाई देने लगे । हाड़ कँपानेवाले मौसम में योगेश्वर बाबू और उनकी पत्नी…इस बुढ़ापे को कोस रहे थे । सर्दी और बुढ़ापे में जैसे छत्तीस का सम्बन्ध है। उस पर गरीबी…जलते में घी का काम कर रही थी | घर में ये दोनों ही थे | सब बच्चे अपनी-अपनी दुनिया में अलग रह रहे थे।
राज जैसे-जैसे गहराती जा रही थी, ठण्ड की ठिठुरन वैसे-वैसे बढ़ती जा रही थी | दोनों पति-पत्नी अलग-अलग अपनी-अपनी सोच रहे थे कि एक-एक रजाई के अतिरिक्त एक ही कम्बल फ़ालतू है | किन्तु इस कारण सर्दी में इसे फ़ालतू तो नहीं कहा जा सकता, बल्कि एक कम्बल की और आवश्यकता है | ऐसे में क्या किया जाए ? दोनों में से कोई एक व्यक्ति ही उस कम्बल का उपयोग कर सकता है, दूसरे को बर्दाश्त करना होगा।
पत्नी के दिल में भारतीय नारी का दायित्व जाग उठा, सो उसने वह कम्बल पति की रजाई के ऊपर ओढ़ा दिया। पति ने कहा, “अरी भाग्यवान् ! यह क्या कर रही हो ? मुझे इतने बोझ के नीचे दबाकर मार डालोगी क्या? तुम औरत हो। तुम्हारा शरीर कमजोर है, तुम अपने ऊपर ओढ़ लो |”
“आप तो बस यों ही चिल्लाते रहते हो | चुपचाप लेटे रहो | सर्दी लग गई तो…आफत तो मेरी जान को ही होगी न !”
“तुम बात को समझती क्यों नहीं ?”
“कहा ना, चुपचाप पड़े रहो…बुढ़ापे में कुछ ज्यादा बोलने लगे हो|”
योगेश्वर बाबू ने समझ लिया कि जिद्दी पत्नी नहीं मानेगी…स्वयं में वह बर्दाश्त कर सकती है, उन्हें कष्ट हो …यह श्रीमतीजी को बर्दाश्त नहीं| पत्नी के स्नेह पर उन्हें गर्व हो आया| और वह यह कहते हुए, “जैसी तुम्हारी इच्छा…चुपचाप लेटे रहे|
पत्नी इत्मीनान से अपने बिछावन में उकडूँ होकर लेट गई…और कुछ देर में सो भी गई| पति का पौरुष जागा और वह धीरे-से उठे, और अपनी रजाई से कम्बल उतारकर बहुत ही धीरे-से पत्नी के ऊपर ओदा दिया| अब पत्नी का चेहरा देखकर उन्हें संतोष हुआ कि अब उसे जाड़ा नहीं लग रहा है और स्वयं पुनः अपने बिछावन पर आकर सो गए|
सुबह जब आँख खुली, तो देखा..कम्बल पुनः उनकी रजाई के ऊपर था |
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2-मण्डी में रामदीन/ कमल चोपड़ा
गाड़ी में तरबूज भरे हुए थे। माल देखकर शामलाल दलाल छलांग मारकर गाड़ी से नीचे उतरा। रामदीन से बोला – देख भाई, मंडी में इतनी मन्दी है कि क्या कहें?
हैरान था रामदीन। ट्रक, टेम्पो, रेहड़ी रिक्शा भीड़-भड़क्का मण्डी में खड़े होने की तो जगह नहीं है, ये मन्दी है? तो तेजी कैसी होती है?
– तरबूज को तो कोई पूछ भी नहीं रहा। खैर…. माल तुम्हारा है तुम बोलो। इनके कितने माँगते हो?
– आप ही ठीक ठीक लगा लो…. छह सात हजार मिल जायें बस्स…. शहर में तो तरबूज दस रूपये किलो बिक रहा है। मेरा ये एक-एक फल पचास से नब्बे रुपये तक बिकेगा।
शामलाल हंसने लगा जैसे अनोखी बात सुन ली हो – नहीं बिकेंगे…. डेढ़ दो हजार की बात करो तो….? दो सौ रूपया कमीशन के मैं लूँगा।
कुएँ और खाई के बीच लटक गया था रामदीन। इतनी कम कीमत तो उसे गाँव में ही मिल रही थी। आजादपुर मंडी में इसी माल के आठ नौ हजार तो आराम से मिल जायेंगे यह सोचकर आया था रामदीन।
यहाँ मेटाडोर से लाने के दो हजार रुपया तो किराया लग गया। सौ सवा सौ चाय पानी का। माल के अठारह सौ मिल रहे हैं वो तो मैटाडोरवाला ले लेगा। उस पर लेकर आया था माल। उसकी खून पसीने से उगाई खरबूजे की फसल की कीमत कहाँ गई?
उधर मैटाडोर वाला उस की जान खा रहा था – जल्दी बताओ गाड़ी कहाँ खाली करूँ? मुझे और भी काम हैं। चार घंटे से गाड़ी सड़क पर खड़ी है। ऊपर से पुलिस वाले गाड़ी हटाने के लिये डंडे फटकार रहे हैं। कितना टाइम और लगाओगे?
हाथ पांव जोड़कर उसने किसी तरह थोड़ी और देर तक रूकने के लिये मनाया। उसे चाय पानी के पैसे भी दिये और फिर से दलालों, आढ़तियों और मंडी के थोक फल व्यापारियों के आगे इधर उधर गिड़गिड़ाने लगा। पर बात नहीं बन रही थी। वह वापिस गाड़ी के पास आकर खड़ा हो गया। गाड़ी वाला शायद कहीं रोटी खाने गया हुआ था। तभी एक पुलिस वाले ने आकर डंडा फटकारना शुरू कर दिया – कागज दिखाओ। लाइसेंस दिखाओ……चालान होगा…. एक हजार रुपया निकालो….।
रोता गिड़गिड़ाता देख वर्दी वाले ने उससे एक सौ रुपया ले उसकी जान छोड़ दी।
आसमान में बादल गरज रहे थे। बरसात शुरू हो गई थी। रामदीन की रूह कांप रही थी। एक दलाल वहाँ से निकलते हुए रामदीन को कह गया, बरसात में कौन खाएगा तरबूज? अब तो तुम्हारा माल बिकना नामुमकिन है।
बरसात तेज होती जा रही थी। बरसात को रूकता हुआ न पाकर रामदीन हारकर शामलाल के पास गया। उसने शामलाल के पाँव पकड़ लिये। किसी तरह उसे अठारह सौ का माल बेचा और सारे पैसे लेजाकर गाड़ी वाले को लेजाकर दे दिए। रामदीन की आँखों में आँसू देखकर गाड़ी वाले ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर कहा – मेरे बापू ने भी ऐसे ही हारकर आत्महत्या कर ली थी। बाद में मैंने जमीन बेचकर ये गाड़ी बना ली। पर तू हिम्मत ना हारना। सब दिन ऐसे नहीं रहेंगे। किसान के बिना लोग खायेंगे क्या? जियेंगे कैसे? किसानों के भी दिन आएँगे।
गाँव वापस जाने के लिए रामदीन के पास भाड़ा नहीं बचा था। वापिस जाए तो जाए कैसे? वह सड़क पर खाली हाथ खड़ा था। तभी फल सब्जी व्यापार मंडल का एक आदमी रसीद बुक लेकर आ गया। तुमने माल बेचा है? इक्यावन रुपये की पर्ची कटवाओ। खीझ उठा रामदीन। एक पैसा नहीं बचा है मेरे पास। अब क्या अपने कपड़े उताकर दूँ? मैंने माल बेचा कहाँ है….? मेरा माल तो यहाँ लूट लिया गया है।
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