सहसा आँगन से किसी ने उसे पुकारा। यह तो कई बरस बाद अचानक दिखाई पड़ा, उसका सहपाठी रणजीत था। घर के भीतर रणजीत को ले जाते हुए उसने सामने बैठे बाबूजी से उसका परिचय कराने के इरादे से कहा- ‘‘बाबूजी यह मेरा दोस्त है रणजीत सिंह।’’
‘‘हुँह, होगा तेरे जैसा ही कोई, बाप की कमाई फूँकने वाला’’ का भाव दृष्टि में लिये बाबूजी ‘‘अच्छा, अच्छा’’ कहते हुए भीतर चले गए। फिर कुछ देर बाद बाहर आकर बोले- ‘‘रमेश, तेरी माँ कह रही है कि अगर चाय बनवानी है, तो पहले कुल्हाड़ी से लकड़ियाँ फाड़कर पतली कर दे, कि चूल्हे में जल सकें।’’
रमेश समझ गया कि अब और भी बहुत कुछ कहकर बाबूजी उसके दोस्त के सामने ही उसकी बेइज़्ज़ती करेंगे, जैसा कि वे अक्सर ही लोगों के सामने करने लगे हैं। मैं दो वर्ष बेरोजगार क्या रह गया हूँ कि बाबूजी हाथ धोकर पीछे पड़े रहते हैं।
‘‘इस रणजीत के बच्चे को भी घर ही आना था मिलने, वह भी बाबूजी के सामने’’ -रमेश ने सोचा, लेकिन रणजीत को भी भला क्या मालूम कि रमेश के घर में महाभारत होता रहता है।’’
‘‘तो सरदार रणजीत सिंह जी, आजकल आप क्या कर रहे हैं, पढ़ लिखके? मैं तो पहले ही कहता था अपने बरखुरदार से कि बी ए, एम ए करके कुछ होने वाला नहीं है। ये हजरत तो झख मार रहे हैं और आप— आपको कुछ काम मिला या नहीं?’’
रमेश को लगा कि जैसे सब कुछ मिट्टी में मिला देंगे बाबूजी। तभी रणजीत सिंह बोला-‘‘नहीं सर, आपके आशीर्वाद से मैं खाली नहीं हूँ। मेरी नौकरी लग चुकी है तथा मैं आजकल इस कस्बे के पहाड़ बैंक मैनेजर के छुट्टी पर जाने पर उसकी जगह डपूटेशन पर बैंक के प्रधान कार्यालय से आया हूँ। मुझे सहसा ध्यान आया कि मेरा पुराना सहपाठी रमेश यहाँ का रहने वाला है, तो लोगों से घर पता करके खोज-खबर लेने चला आया।’’
तो— तो— तो क्या रणजीत की नौकरी लग चुकी है। वह इतने अच्छे पद पर है! रमेश को लगा कि जैसे आज उसने बाबूजी को परास्त कर दिया है। बाबूजी भी अब सोचेंगे कि उनके बेटे के दोस्त बैंक में अच्छे पद पर है। इस कस्बे के एक मात्र बैंक का मैनेजर उनके घर में आया था- यह सोचकर बाबूजी की दृष्टि में उनका बेटा रमेश ऊँचा उठ जाएगा।
उसने गौर से देखा- बाबूजी निरुत्तर हो गए थे। उन्होंने कहा- ‘‘आप लोग बैठिए। मैं बाजार से अभी आता हूँ।’’
बाजार से बाबूजी द्वारा लाए गए अच्छी क्वालिटी के बिस्कुट माँ ने चाय के साथ रखे थे। बाद में बाबूजी उसके दोस्त को छोड़ने उसके साथ खुद भी चौराहे तक आए।