अपनी इकलौती पुत्री के विवाह को लेकर माता-पिता निरंतर चिन्ता में डूबे रहते थे। कई जगह ढूँढते- ढूँढते उन्हें एक लड़का अपनी पुत्री के लिए उपयुक्त समझ में आया। लड़का विदेश में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर था।
बातचीत पहले दोनों पक्षों के माता-पिता के स्तर पर शुरू हुई। आरंभिक दौर के बातचीत में ही लड़की पक्ष के माता-पिता ने एक मोटी रकम के अतिरिक्त सभी तरह के सामान और गहने देना स्वीकार कर लिया। बिना बाधा के गाड़ी यहाँ से आगे बढ़ गई।
अगले दौर में यह तय हुआ कि लड़का और लड़की आपस में बातचात आरंभ करें और यह निश्चित करें कि दोनों एक-दूसरे को अपने लिए कितना उपयुक्त समझते हैं। लड़की इस बात से नाराज़ थी कि उनके माता-पिता ने दहेज देना क्यों स्वीकार कर लिया है। लड़की उन पुरानी परंपराओं से हटकर थी, जहा। लड़के मोल लिए जाते थे और लड़की एक गाय सरीखी मानी जाती थी, जो एक घर के खूँटे से खोलकर दूसरे घर के खूँटे में बाँध दी जाती थी।
लड़की भी अपने देश में एक अच्छी कंपनी में ऊँचे ओहदे पर थी और उस लड़के से बड़े पैकेज पर थी। खैर, लड़का और लड़की के बीच में कभी मेसेज के जरिए, कभी फोन पर ऑडियो के माध्यम से तो कभी-कभी वीडियो कॉल पर बातचीत होने लगी। दोनों एक-दूसरे को समझने-परखने लगे। विषय-दर-विषय बढ़ते हुए एक दिन लड़की दहेज के मुद्दे पर आई। उसने आज के परिवेश में इसके औचित्य पर सवाल खड़े किए। लड़के को इस मसले के सवाल बुरे लगे और उसने बेलाग कहा, ‘‘जबतक स्त्री-पुरुष के बीच अंतर रहेगा, तब तक इसे पाटने के लिए यह व्यवस्था तो रहेगी ही।’’
लड़की उखड़ गयी। उसने कहा, ‘‘अब कैसा अंतर ? हम लड़कियाँ तुमसे शिक्षा में कम नहीं हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपनी सुरक्षा के मामले में भी अपनी तैयारियाँ पूरी रखती हैं। हम घर और बाहर के काम समान क्षमता से कर लेती हैं। इन सबके बावजूद मेरा पिता तुम्हारे पिता को दहेज देकर तुम्हें मेरे लिए मोल ले रहे हैं, तो आखिर तुम मेरे जीवन ऐसा क्या लेकर आ रहे हो ? तुम मेरे जीवन में नया क्या देने वाले हो ?’’
लड़का सकते में आ गया। कुछ देर उसे कोई जवाब ही नहीं सूझा। अचानक उसे पुरुष होने का भान हुआ और उसने बड़े गर्व से कहा, ‘‘तुम्हारे जीवन में एक पुरुष आ रहा है। यह एक औरत के लिए क्या कम बड़ी बात है ?’’
लड़की तमतमा उठी। उसने कहा, ‘‘पुरुष होने का दंभ न भरो। पुरुष के हिस्से का ऐसा कौन-सा काम है, जो आज की औरत नहीं कर सकती ?’’
लड़का फोन पर ही विद्रूप हँसी हँसा। उसने ब्रह्मास्त्र रखने जैसे अहंकार में कहा, ‘‘हमारे पास वो चीज है, जिसके लिए तू तरस जाएगी और परिवार बढ़ा नहीं सकती। हा…हा…हा !’’
इतना सुनते ही लड़की गरज पड़ी, ‘‘दो बूँद के अहंकारी ! चुप रह !! मत भूल, अब इसके बैंक खुल गए हैं। मैं तेरा बोझ क्यों ढोने लगी ? फोन बंद कर, कमीने !!’’
-0-ज्ञानदेव मुकेश, फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट, अल्पना मार्केट के पास, स न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी , पटना-800013 (बिहार)
मो-9470200491