संजीव ठाकुर
तर्क-कुतर्क
लोग उसे पागल समझ रहे थे। अच्छी-भली सरकारी नौकरी छोड़नेवाला भला पागल नही तो और क्या होगा?
दरअसल जिस कॉलेज में उसे लेक्चरर की नौकरी मिली, वहाँ पढ़ने-पढ़ाने का माहौल ही नहीं था। लेक्चरर्स बूढ़े, सठियाए और जंग-लगे थे। साथ बैठकर दो-तीन घंटे बेहूदा बातें करके वापस चले जाने के सिवा उन्हें केाई काम नहीं था। विद्यार्थी दो-तीन से ज्यादा पूरे कॉलेज में नहीं आते थे। ऐसे निकम्मे ओर दमघोंटू माहौल में वह फिट नहीं हो पा रहा था। इसलिए नौकरी छोड़ रहा था।
लोग उसे समझा रहे थे, ‘‘लेक्चरर जैसा ‘रॉयल’ जॉब भला मिलता है? ….तुम्हें इतनी आसानी से नौकरी मिल गई जबकि लोगों को नौकरी पाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं!’’
‘‘अरे! कॉलेज में कोई काम नहीं है तो क्या? पैसे तो तुम्हें मिल जाते है?’’
लेगों के तर्क उसकी समझ में नहीं आ रहे थे और लोग उसके कुतर्क को नहीं समझ पा रहे थे।