
बाजार की रौनकें सिमट रहीं थीं। दुकान बढ़ाने का समय हो चला था। दोनों डमी को दुकान के अंदर रखा जा चुका था। यह एक अंडर गारमेंट की दुकान थी और दोनों डमी अंडर गारमेंट पहने दुकान के सामने खड़ी रहतीं थीं।
‘आज तो मैं बोलकर ही रहूँगी!’
‘पक्का!’
‘तू साथ देगी कि नहीं!’
‘हम दोनों एक ही नाव पर सवार है बहन!’
दुकान मालिक जब चलने को हुआ तो एक डमी बोली।
‘हमें कुछ कहना है!’
दुकान मालिक ठिठका।
‘आपका स्टाफ हमारे साथ जब- तब बदतमीजी करता है!’ पहली डमी गुस्से से बोली।
‘कभी हमारे नितंब पर तो कभी हमारे वक्ष पर तो कभी…’ दूसरी डमी कहते- कहते रुक गई।
‘जानता हूँ मैं!’
‘आप जानते हैं!!!’ पहली डमी चौंकी।
‘ये कोई बड़ी बात नहीं है!’ दुकान मालिक आराम से बोला।
‘बड़ी बात नहीं!’ दूसरी डमी चीखी।
‘अब हमें यहाँ एक पल भी नहीं रुकना!’
‘आप से यह उम्मीद नहीं थी!’ दूसरी डमी बोली।
‘सोच लो!’ दुकान मालिक मुस्कुराया।
‘अब सोचने- समझने का वक्त गया!’
‘कोई बड़ी बात नहीं!’ दूसरी डमी ने दुकान मालिक की कही हुई बात दोहराई!
‘ज्यादा नखरे मत कर! बिना बात के नुमाइश कर रही है!’ अचानक यह बात उस कर्मचारी के मुंह से निकली जो उनको झाड़ता,पोछता और उन्हें इधर से उधर उठाकर रखता था।
‘चल हट!’
‘कुत्ता कही का!’
दोनो डमी उसे दुत्कारते हुए दुकान से बाहर चली गईं।
अगले दिन दुकान मालिक जब अपनी दुकान पहुँचा तो दोनों डमी वहाँ पहले से मौजूद थीं। उन्हें वहाँ देखकर उसे कोई हैरत नहीं हुई। सहायक जब दुकान का शटर उठा रहा था तो दुकान मालिक मुस्कुराते हुए बोला,’बड़ी जल्दी आ गईं तुम दोनों! अभी तो चौबीस घंटे भी न हुए!’
दोनों डमी शांत खड़ी रहीं। मालिक ने उन्हें ऊपर से नीचे ध्यान से देखा। एक डमी के चेहरे और छाती पर खरोंचों के निशान थे। दूसरे डमी के पेट और जांघों पर।
‘ये निशान कैसे! ‘दुकान मालिक ने पूछा।
दोनों डमी एक दूसरे को देखने लगीं।
‘क्यों…क्या हुआ!’ दुकान मालिक ने फिर पूछा।
‘वो … वो…’ पहली डमी हकलाई।
‘वो कुछ नहीं…रात को कुत्ते पीछे पड़ गए थे बस!’ दूसरी डमी झट से बोली।
यह सुनते ही दुकान मालिक जोर से हँसा। हँसते हुए बोला,’वाकई!’
दोनों डमी खड़े- खड़े काँपने लगीं।
-0-