गढवाळि अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
“मि तैं जन्नत म सबसे बडू बंगला अर एक दर्जन हूर मिलीं चैंदिनI”
“किलै?”
:मि 72 काफ़िरू तैं मारिक आयूँ छौं। मिन काफिरू तैं मान्न्नौ तैं अपणि जान क़ुर्बान करि।
“काफ़िर कु छा?”
“क्य मतलब?”
“काफ़िर ईंट ढुंग क छा या घास-फूस?”
“जी, काफ़िर आदिम छा।“
“उ कैन बणै छा?”
“जी सब अल्ला का बणाया छा। उ बी अल्ला न बणाई छा।“
“जै तैं अल्लाह न बणाई छौ वे तैं मान्नौं कु तुम तैं क्या हक़ छौ?”
“ज…ज..जी…”
“अल्ला क बन्दों तैं मान्ना का बाद तुम तैं क्या मिल्यूं चैन्दू?”
“ज उँन त हम तैं ई बतै छौ कि काफिरू तैं मारिक जन्नत मिलदीI”
“त जा उँ से ही जन्नत ली ल्यावा…
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