गढ़वाली अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट
सृष्टि अपर्टमेंट्स की 9 वीं मंज़िलै कि बाल्कनी म खड़ा छुट्टा सि नीटू न मानसी थैं पूछी-“माँ घिन्डुड़ी कन हूँदी?”
मानसी न बतायी ” घिन्डुड़ी एक पोथली हूँदी।”
“माँ घिन्डुड़ी कख रैंदि?”
” घिन्डुड़ी डाळयों म रैंदी अर फुदकि-फुदकि थैं चूँ-चूँ बोलदि।”
” डाल़ा त हमारा अपार्टमेंट्स म नि छन माँ, फिर घिन्डुड़ी कख रैंदी होली? कख चूँ-चूँ बोलदि होलि? नीटू ने परेसान ह्वे कि पूछी।
” चौक म चूँ-चूँ बोलदि घिन्डुड़ी ” मानसी न बात टाली क बोली।
” चौक क्या हूंद माँ?” नीटू न अगलू सवाल बिना देर कर्यां पूछी।
ऑफ़िस बिटिक थकिक चूर ह्वे कि लौटी मानसी म नीटू क सवालू कि रेलगाड़ी थैं हरीं झंडी दिखाण की किताब नि छै। वीं न अपड़ा चारों तरफ जम्याँ कंक्रीट क जंगळ पर एक चुबदि नजर डालि अर नीटू थैं लीक कमरा म ऐ गे। नीटू अब भी मचलणु छौ-“माँ मि थैं घिन्डुड़ी देखण इ च।”
“अब्बी दिखांदु छौं बाबा।” बोलिक मानसी न तुरंत लैपटॉप खोली। गूगल खोलदु इ घिन्डुड़ी सामणी छै। फुदकदि घिन्डुड़ी देखिक नीटू ताळलि बजाण लग गे।
अगला दिन क्लास म टीचर पढ़ाण लगीं छै ।
“सेर क घर कुणी माँद बुल्दन।”
“मूसा क घौर कुणी बिल बुल्दन।”
“म्वारा क घौर कुणी भेल बुल्दन।”
“गौरैया के घर को …”-टीचर के वाक्य को बीच में ही काटकर नीटू चिल्लाया-“घिन्डुड़ी क घौर कुणी गूगल बुल्दन।”
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