
यशोधरा भटनागर का पहला लघुकथा-संग्रह आया है। नाम है -खिड़की। इन्होंने बहुत सी लघुकथाएं लिखी हैं जो इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में खूब छपी रही हैं। इससे पूर्व इनके एक संग्रह ‘एल्बम’ में भी कुछ लघुकथाएं संगृहीत थीं। लेकिन -खिड़की – इनका मुकम्मल संग्रह है लघुकथाओं का। ज़ाहिर है इन्होंने वो सब लघुकथाएं इसमें शामिल की होंगी जो इन्हें पसंद होंगी। पहले संग्रह आने से पहले तक काफी कुछ लिख लेने वाले लेखक के समक्ष ऐसे में रचनाओं के चुनाव को लेकर दिक्कत आती है। इनके सामने भी आई होगी। मेरे सामने यह दिक्कत आई कि कौनसी रचना या कौन – कौन सी रचनाएं पहले पढूं ताकि लेखकीय मर्म तक जल्दी से जल्दी पहुंच सकूं। किसी रचनाकार के प्रथम संग्रह को पढ़ना वास्तव में साहित्यिक जगत में नयी आहट को समझने जैसा होता है। उतावलापन इसलिए भी अधिक था।
इस संग्रह में यशोधरा भटनागर की करीब नब्बे लघुकथाएं हैं। ये लघुकथाएं विभिन्न तेवरों में हैं। हम अभी हाल ही में लॉकडाउन पूरा करके हटे हैं। इनके संग्रह में हमें क्वारंटाइन, फाइटर्स, सोशल डिस्टैन्सिंग जैसी मार्मिक लघुकथाएं पढ़ने को मिल रही हैं जो हमें उस दौर में ले जाती हैं जब देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व कोरोनाकाल से गुज़र रहा था। यह वह दौर था जब किसी का भी जीवन सुरक्षित नहीं था। न घर में और न ही अस्पताल में। सिसकियां जब दिनचर्या बन गयी थीं और दुख अजगर। जिसने सबको निगल लिया था।
संग्रह की ऐसी ही एक मार्मिक लघुकथा है- क्वारंटाइन। महामारी का ज़ोर कम हुआ तो मिन्नी लौटी। मिन्नी लौटी तो परिवार से मिल ही न पाई। उसे क्वारंटाइन होना पड़ा। सब उदास। पूरी कथा तत्कालीन विकरालता को लेकर पूरी पंजाबियत के साथ पिरोई गई है। पंजाबी किरदारों को लेकर चलना आसान नहीं था। भाषाई दिक्कतें आ सकती थीं। पंजाबी पात्र लेने के लिए परिवेश और वातावरण भी पंजाबी ज़रूरी था। अन्यथा लघुकथा बिखरने का ख़तरा था। लेकिन यशोधरा ने इस बड़े चैलेंज को स्वीकार किया। आपकी या मेरी नहीं, यह लघुकथा की बेहतरी के लिए अच्छा है।
और याद कीजिये लघुकथा -गिरफ्त- की बिट्टी नाम के किरदार को। महामारी ने पहले माँ को छीना और फिर पापा को। लेकिन विडंबना देखिए कि अपने बच्चे और पति को छोड़कर बेटी तब भी मायके न जा सकी। सिर्फ याद करती रही उनके साथ बिताए क्षणों को। रोती है, सिसकती है पर जा नहीं पाती। तब हालात ही ऐसे थे।
पर समकालीन लघुकथा के हालात अच्छे थे जो इस तरह की मार्मिक लघुकथाएं लिखी गईं। अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ लेखिका ने बिट्टी नाम के करैक्टर को जन्म दिया, उसके साथ जीने की कसम खाई और चरित्र को यादगार बना दिया।
तीसरी लघुकथा – फाइटर्स – पढ़ेंगे तो आदू नामके चरित्र के साथ रो उठेंगे। आदू ने लेखिका की लेखनी से निकलकर मानो जादू कर दिया पाठकों पर। चार साल के बच्चे की कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव आई तो बच्चे को आइसोलेशन के लिए मजबूर कर दिया गया। यह भी मजबूरी ही थी। यों ही कोई बेवफ़ा नहीं होता। एक ओर बेटा बाप से हग करने को तड़प रहा है तो दूसरी ओर बाप सुबक रहा है। मामूली से लगने वाले कथानक को साधारण सी दिखने वाली शब्दावली से पिरोकर लघुकथा को इमोशन्स की ऊंचाइयों पर ले जाया गया है।
संग्रह की अनेक लघुकथाएं मानवेत्तर हैं। मानवेत्तर लघुकथाओं को लिखने में यशोधरा भटनागर को महारत हासिल है। ऐसा संभवतः इसलिए है क्योंकि वे संवेदनाओं के साथ रचनाकर्म करती हैं। संवेदनशीलता उनका स्वभाव है। वह लिखतीं ही नहीं, जज़्बातों के सफ़र पर निकलतीं हैं। सूरज चांद पेड़ पौधों के माध्यम से कथानक तैयार किया गए हैं उनकी लघुकथाओं में। ऐसी एक नहीं अनेक लघुकथाएं हैं। भीगी बूंद, हमसफ़र, बोन्साई, रोटी, चूल्हा, माटी, घंटी, पराली, पोखर, धर्मशाला हाइट्स, वर्चुअल लव, बुज़ुर्गीयत, आंगन, एंग्री बर्ड, प्रीत, फोल्डर, ब्रिज, मुस्कान, विश्वास, और विस्तार जैसी अनेक लघुकथाएं सहज ही मानवेत्तर लघुकथाओं की श्रेणी में रखी जा सकती हैं जिनमें मानवेत्तर पात्रों का निर्वाह यशोधरा ने पूरी सहजता के साथ किया है। जिस किसी को कथा का पात्र बनाया उसमें सहजता के साथ प्रवेश कर लिया। इन लघुकथाओं का मूल स्वर सामाजिकता है। दयालुता है। परोपकार है। संबंध है। मुख्य बात, नेकनीयती है। इन लघुकथाओं में भाषा के स्तर को बनाये रखा गया है। चूंकि वह स्वयं भी एक शिक्षिका रही हैं अतः भाषा पर इनकी अच्छी पकड़ है। हिंदी के तत्सम शब्दों का भी कुशलतापूर्वक सहजता के साथ प्रयोग किया गया है।
‘खिड़की’ में प्रतीकात्मक लघुकथाएं भी हैं। अधिकांशतः विवरणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। यशोधरा स्वयं एक कवियित्री हैं। लघुकथा तो इन्होने तीन – चार वर्ष पूर्व लिखनी आरम्भ की है लेकिन कवितायेँ ये बहुत पहले से लिख रही हैं। इनकी लघुकथाओं में मुझे इनकी काव्यात्मकता शैली के भी भरपूर दर्शन हुए। संग्रह पढ़कर प्रतीत हुआ कि भरपूर संवेदनशील मन होने के कारण आसपास के पात्रों को इन्होने अपनी लघुकथाओं में संजोया, उन्हें काव्यात्मक भाषा देकर स्वर प्रदान किया। जहाँ पात्रों को स्वर नहीं दे पाईं वहां सस्वर (यानि बिम्बों, अलंकारों के साथ) स्वयं उपस्थित रहीं।
उम्मीद है कि यशोधरा भटनागर का प्रस्तुत लघुकथा – संग्रह का नाम भले ही ‘खिड़की’ हो लेकिन यह उन्हें हिंदी के समकालीन लघुकथाकारों की जमात में शामिल करने के लिए प्रवेश द्वार का कार्य करेगा।
खिड़की(लघुकथा-संग्रह) यशोधरा भटनागर, संस्मय प्रकाशन,शालीमार बाग़, दिल्ली-110088, संस्करण 2022,मूल्य 220/-,पृष्ठ 120
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