वर्त्तमान में लघुकथा एक सशक्त एवं स्वतंत्र गद्य- विधा के रूप में हिन्दी साहित्य में अपनी जगह बना चुकी है। उपन्यास और कहानी की तरह लघुकथा का भी बीज रूप ‘कथा’ ही है; परन्तु क्षणानुभूति की कथात्मक अभिव्यक्ति में भाव एवं विचारों के संप्रेषण में यह उपन्यास और कहानी से कहीं भी कमतर नहीं है; बल्कि कभी -कभी तो पाठकों पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ती है कि यह उन सबसे बीस ही लगने लगती है। आज जिस ऊँचाई पर हम लघुकथा को देख रहे हैं, उसे उस स्थान तक पहुँचाने में डॉ. सतीशराज पुष्करणा और यशशेष रवि प्रभाकर जैसे लघुकथाकारों का अविस्मरणीय योगदान है। दुर्भाग्यवश हमारी ये दोनों विभूतियाँ गत वर्ष महामारी में काल कवलित हो गईं। लेकिन जहाँ रवि प्रभाकर जी के असामयिक चले जाने से लघुकथा जगत में कई नई संभावनाओं के अंत होने का भान होता है, वहीं पुष्करणा जी के जाने से लघुकथा -जगत् में एक समर्पित वरिष्ठ मार्गदर्शक की कमी सदैव खलेगी।
लघुकथा के प्रति पुष्करणा जी के समर्पण का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि पटना के जिस इलाके में वे रहते थे,वह क्षेत्र ‘लघुकथा नगर’ के नाम से जाना जाने लगा। उनकी लघुकथाएँ अपने कथ्य,पात्र, भाषा,शीर्षक, उद्देश्य आदि की दृष्टि से जितनी सहज एवं गाह्य हैं,उतनी मारक एवं मर्म को छूनेवाली भी हैं। संवेदना एवं नैतिकता के साथ भाव और विचारों की महत्ता स्थापित करनेवाली उनकी कुछ लघुकथाएँ तो एक मनोविश्लेषक की दृष्टि की अपेक्षा रखती हैं । नि:संदेह लघुकथा के प्रति उनके जीवन- पर्यन्त कठिन साधना का प्रतिफलन ही है कि लोग उन्हें लघुकथा का ‘पुरोधा’ और ‘पितामह’ तक कह देते हैं। वैसे में यह मेरी धृष्टता ही होगी कि मैं इस बात का दंभ भरूँ कि मैं उनके रचनाकर्म वैशिष्ट्य पर पर कुछ लिखूँ। किन्तु उनकी लघुकथा ‘बेबस विद्रोह’ की आम जीवन की सहज परिस्थितयों में हुईं एक अतिसाधारण घटना की भावभूमि एवं विचार-तंतुओं ने मेरे पाठक मन को इतना प्रभावित किया है कि उसपर कुछ कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ।
‘मेरी पसन्द’ के अंतर्गत दूसरी लघुकथा मैंने यशशेष युवा लघुकथाकार रवि प्रभाकर की लघुकथा ‘मुर्दो का शहर’ लिया है जिसमें उनके असीम ऊर्जावान श्रेष्ठ साहित्यिकार का दिग्दर्शन होता है। मानवेतर पात्रों के द्वारा मानव की बात करती इस लघुकथा में प्रतीकों और संकेतों के महत्व के साथ ही लघुकथा की गंभीरता को भी प्रतिपादित किया है तथा नयेपन की तलाश को एक नया आयाम दिया गया है। कहना न होगा कि किसी भी रचना के ऐसे वैशिष्ट्य किसी भी सह्रदय पाठक में उत्सुकता उत्पन्न करते है और कोई वजह नहीं कि इसे पढ़ने के बाद मेरे मन में भी विचारों का गहन उद्वेलन हुआ, जिन्हें आपके समक्ष उद्घाटित करने से मैं स्वयं को रोक न सकी। मुझे विश्वास है कि, आपसब भी ‘मेरी पसन्द’ से आनंदित होंगे।
लघुकथा ‘बेबस विद्रोह ‘ आदरणीय डॉ सतीशराज पुष्करणा के प्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक है। इस लघुकथा की बुनावट कोमल मानवीय संवेदनाओं और वैचारिक आक्रोश के तंतुओं के साथ की गई है। भाव एवं विचार के संस्पर्श से एक साधारण-सी लगनेवाली घटना पाठकों के जेहन में गंभीर एवं अमिट छाप छोड़ती है।
पुष्करणा जी के कथानक का वैशिष्ट्य है कि वह अपने घर-परिवार एवं समाज के मध्य से ही पैदा होती हैं। इस कारण पाठक कथानक के साथ सहज ही तारतम्य स्थापित कर लेता है और साधारणीकरण की प्रक्रिया से गुजरने लगता है। प्रस्तुत लघुकथा का कथानक रोजमर्रा के जीवन से लिया गया है जिसमें घरेलू कामकाज में सहायता करनेवाली एक महरी की विवशता और घर के मालिक-मालकिन के निर्मम चरित्र के बहाने भारतीय समाज में स्वाभाविक रूप से पाये जानेवाले मालिक-नौकरों के संबंध एवं आपसी व्यवहार को भी उजागर किया गया है। कथानक के प्रारंभ की पंक्तियों से ही वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जाती है और मध्यमवर्गीय पाठक का मन महरी के प्रति आर्द्र तो होता है किन्तु मालकिन द्वारा डाँटने के क्रम में प्रयुक्त निर्लज्ज शब्दों को तवज्जो न देते हुए, वह उसे नजरअंदाज कर जाता है। कथानक का मध्य आते-आते लहूलुहान महरी को जब मालिक गाली युक्त संबोधन के साथ काम करने की आज्ञा देता है तो महरी के प्रति पाठकों की संपूर्ण संवेदना उमड़ पड़ती है। केवल इसलिए नहीं कि उस घर की घरेलू सहायिका के साथ अन्याय हो रहा है।बल्कि इसका एक कारण यह भी है कि एक आम भारतीय स्त्री के लिए पारंपारिक रूप से जो व्यवहार एक भारतीय पुरूष से अपेक्षित होता है,वह यहाँ नदारद है। हमारी प्राचीन अवधारणा रही है कि स्त्रियाँ आपस में जो कुछ कह-सुन ले,पुरुषों से अपेक्षा की जाती है कि बिना किसी भेदभाव के वह किसी भी स्त्री के साथ सम्मानपूर्वक पेश आये। पुष्करणा जी की अंतर्दृष्टि जिस तरह से इस सामान्य कथानक के बहाने सामाजिक संबंधों के बिछलन तक जाती है, वह अद्वितीय है। यह कोई साधारण बात नहीं है। लेखक चाहता तो प्रयुक्त ‘छिनाल’ शब्द के बिना भी अपनी बात रख सकता था। किन्तु वर्तमान समय में स्त्रियों के प्रति पुरुष-मानसिकता का तब सही आकलन नहीं हो पाता जिसे कहना लेखक का अभीष्ट था। यह एक बहुत बड़ी बात है और इसे पुष्करणा जी जैसे लघुकथा के पुरोधा ही कह सकते है।
लघुकथा विधा में पात्रों की अधिक संख्या के लिए जगह कम होती है। प्रस्तुत लघुकथा की मुख्य पात्र राधा देवी नाम की एक निम्न तबके की स्त्री है। यद्यपि लेखक ने इस प्रमुख पात्र का ऐसा कुछ खास चरित्र चित्रण नहीं किया है और यह उसका अभीष्ट भी नहीं है। तथापि उस पात्र में उस तबके की स्त्रियों की बेबसी का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है। सहयोगी पात्र के रूप में पति-पत्नी का जिक्र है और इन दोनों की अवधारणा से प्रमुख पात्र के स्वरूप को बल मिलता है। सबसे अच्छी बात है कि इन तीन पात्रों के कायिक रूप की जगह हम उनके क्रियाकलाप से उनके व्यक्तित्व का परिचय पाते है, जिससे लघुकथा के प्रवाह में निरंतरता बनी रहती है और कहीं भी वह बोझिल नहीं लगता।
प्रस्तुत लघुकथा को कहने का जो बेलौस अंदाज है,वह अत्यंत स्वाभाविक एवं सरल है। वैसे भी अपने कलेवर और उद्देश्य के मद्देनजर लघुकथा की भाषा में आलंकारिकता या विस्तार की गुंजाइश न्यून रहती है। लघुकथा की भाषा में लचकन- मटकन न होकर हवाई गति-सी द्रुति एवं क्षिप्रता अपेक्षित होती है। साथ ही लघुकथा के साहित्यिक विधा होने से भाषा के प्रति इसके लेखक का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह भाषा में साहित्यिकता को बरकरार रखे। पुष्करणा जी की अन्य लघुकथाओं की तरह ‘बेबस विद्रोह’ की भी भाषा सरल,स्पष्ट,नुकीली और प्रवाहमयी है।
कथोपकथन की दृष्टि से देखे तो इसके संवाद कमाल करते हैं। चुस्त-दुरुस्त,त्वरित गति से आम बोलचाल की भाषा में लेखक अपनी बात इस तरह कह गया है कि पाठक विस्मित हो जाता है–
” हरामजादी!इतना गरम दूध दिया जाता है कि हाथ जलें और गिलास चकनाचूर हो जाये।”
एक ही पंक्ति में महरी की निरीहता,मालकिन की तानाशाही और मनुष्य का अपने निर्जीव वस्तुओं के प्रति सजीव से भी ज्यादा मोह,सब धड़ाधड़ खुलकर सामने आ जाता है और राधा देवी के साथ ही पाठक भी हतप्रभ रह जाता है। बाद की पंक्तियाँ भी कुछ ऐसा ही कमाल करती है और कथानक सधे रूप में सरपट आगे बढ़ जाता है। कथानक के अंतिम अनुच्छेद की अंतिम पंक्तियाँ, ” …पति-पत्नी बेतहाशा नंगे पैर ही रसोई की ओर दौड़…नौकरानी द्रुतगति से निकली और अपने घर की ओर चल पड़ी।” –लघुकथा को चरमोत्कर्ष तक ले जाती है और लघुकथा की सार्थकता को सिद्ध कर देती है।
भाषा और शिल्प का यह जादू लघुकथा के कथ्य को तो निखारता ही है, मानवीय-चरित्र के विभिन्न स्तरों को भी सहज व्यक्त कर, लेखक के श्रम को सार्थक कर देता है।
लघुकथा विसंगतियों की कोख से जन्म लेती है। वाजिब है कि ये विसंगतियाँ हमारे बीच की सामाजिक-आर्थिक या धार्मिक या अन्य कारणों की उपज है। देखा जाय तो वर्तमान में भारतीय समाज में नारी की स्थिति आनुपातिक रूप से बहुत सम्मानीय नहीं है । तिस पर से निम्नवर्गीय गरीब स्त्री! कहावत भी है,”मंगरू की मौगी,सबकी भौजी”, जिसे कोई भी जाना-अनजाना, बिना किसी औचित्य के कुछ भी कह सकता है। मालिक के द्वारा राधा देवी जैसी औरतों की फजीहत सामाजिक जीवन में उनकी ‘औकात’ का आकलन करने के लिए काफी है। लेकिन कथानक में जिस तरह पति-पत्नी को किरचें चुभते देख वह ‘द्रुतगति’ से अपने घर की ओर चलती है,वह आज की परिस्थिति में नारियों का अपने अस्तित्व के लिए आई सजगता
को भी दिखलाता है और यही सकारात्मकता लघुकथा का ध्येय होता है जिसे उद्घाटित करने का सफल प्रयास लेखक ने किया है। कुल मिलाकर लघुकथा में वातावरण के निर्माण करने के लिए अलग से किसी प्रकार की कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ी है। लेखक की लेखनी ने अपनी रोशनाई से कथानक में विद्यमान वातावरण को प्रकाशित कर दिया है।
लघुकथा में आकार की चर्चा होती रहती है। इस दृष्टिकोण से यह लघुकथा एक उदाहरण बन सकती है। छोटी-बड़ी 18-20 पंक्तियों में लिखी गई इस रचना का आकार उतना ही है, जितने की अपेक्षा किसी लघुकथा से की जाती है। ‘न कम, न ज्यादा’, बिल्कुल परफेक्ट। यद्यपि महरी के लहूलुहान होने एवं दर्द को उकेरने के लिए लेखक व्यग्र दिखता है और इसके वर्णन में दिल खोलकर शब्द लुटाये हैं। शब्दों के दुहराव और महरी के दर्द को उभारने की बार-बार चेष्टा से कहीं-कहीं लघुकथा में एकरसता आ गई है। किन्तु देखा गया है कि कभी-कभी लेखक का मन न चाहकर भी कुछ बातों को लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पाता है और वह लिखता चला जाता है। शायद पुष्करणा जी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ हो। खैर, इससे इस लघुकथा की प्रभावोत्पादकता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है और इसकी लघुकथात्मकता पुरजोर तरीके से अपनी हनक बनाये रखती है।
शीर्षक के मामले में पुष्करणा जी का सूक्ष्मान्वेषण हमेशा कायल करती है — चाहे ‘अपाहिज’ हो,’बोफोर्स कांड’ हो,’विश्वास’ हो,’रक्तबीज’ हो, शीर्षक की सार्थकता सदैव सिद्ध हुई है। प्रस्तुत लघुकथा का शीर्षक पढ़ते ही पाठक के मन में एक कौतूहल होता है — वाह, एक साथ दो विपरीत शब्द! विवशता के साथ विद्रोह! और वह रचना पढ़ने को प्रस्तुत हो जाता है। पाठक की यह उत्सुकता शीर्षक को सफल घोषित कर देती है। तदुपरांत निरीह समझी जानेवाली स्त्री की बेबसी और अन्ततोगत्वा स्वाभिमान के लिए उसके विद्रोह को शीर्षक अपने में समेटे है। साथ ही इसकी संक्षिप्तता भी बनी हुई है, जो किसी भी शीर्षक के लिए अनिवार्य शर्त होती है; परन्तु इस शीर्षक में अगर लेखक ने केवल नारी-विद्रोह के बोध को केन्द्र में रखकर किया होता तो यथेष्ट होता। वस्तुत: प्रारंभ में ‘बेबस’ शब्द को देखकर लघुकथा के इकहरेपन को लेकर पाठक के समक्ष थोड़ी संशय की स्थिति आ जाती है। यद्यपि ऐसा है नहीं। फिर भी यह मेरा निजी मत है कि पुष्करणा जी का यह शीर्षक ‘सहानुभूति’ या ‘अपाहिज’ के टक्कर का नहीं है।
साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं उसका सजग प्रहरी भी है और उसका पथ प्रदर्शक भी। इस दृष्टिकोण से देखें तो इस लघुकथा में पाठक की संवेदना जहाँ आलोड़ित होती है, वैचारिक झंझावात उसे झकझोरता भी है। यह लघुकथा पाठक का आईना भी है, विसंगतियों के प्रति आगाह भी करता है और नये विचारों के प्रवेश का अभिनंदन भी करता है। महरी के लहूलुहान अवस्था भावक के मन में संवेदना जगाते है। लेकिन पति-पत्नी के लहूलुहान होने पर पाठक प्रतिक्रियाहीन रहता है और पुन: राधा देवी के द्रुतगति से घर जाने के विद्रोह से वह आश्वस्त हो जाता है। यह आश्वासन ही इस लघुकथा का नवनीत है और लघुकथाकार का निर्दिष्ट भी। इस तरह के सकारात्मक उद्देश्य की प्राप्ति ही किसी लघुकथा के सफल होने का परिचायक है और इस दृष्टि डॉ सतीशराज पुष्करणा की यह लघुकथा उल्लेखनीय है। अपनी कतिपय इन्हीं विशेषताओं के कारण यह लघुकथा पुष्करणा जी के प्रमुख -प्रसिद्ध लघुकथाओं में अपना विशेष स्थान बना पाने में पूर्णरूपेण सफल रही है।
एक अच्छी लघुकथा में संकेतों का अपना ही महत्व होता है। और अगर कोई लघुकथा संकेतों और प्रतीकों में विचारों का उद्घाटन करते हुए मन को झिंझोड़ दे तो उसकी उत्कृष्टता का मापदंड कैसे तय हो!! स्मृतिशेष रवि प्रभाकर जी की लघुकथा ‘मुर्दों का शहर’ ऐसी ही लघुकथा की श्रेणी में आती है।
मानवेतर पात्रोंवाले प्रस्तुत लघुकथा की दिलचस्प बात यह है कि इसका कथानक इंसानों से संबद्ध है। दीगर बात है कि पर्यावरण और प्रशासन के औचित्य की चर्चा भी कथानक को मनन योग्य बनाते हैं। एक तरफ जहाँ कटते हुए जंगल और जानवरों के प्रति मनुष्यों के अमानुषिक-अत्याचार जंगली-पशुओं के बीच चिन्ता का विषय है, वही इसी बहाने जंगल के सुचारू प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था का वर्णन कर लेखक ने हमारे उस जुमले पर करारी चोट की है जिसमें हर बात पर हम कह देते है कि, ‘जंगलराज’ है। अंतत: एक जानवर के द्वारा इंसान के इंसान होने पर प्रश्न चिन्ह लगाकर लघुकथा अपने चरम पर आ जाती है। इसके साथ ही पाठक अपने गिरेबान में झाँकने को मजबूर हो जाता है और कथानक की उत्कृष्टता सिद्ध हो जाती है।
पात्र के लिहाज से लघुकथा को देखा जाये तो इसके सारे पात्र मानवेतर हैं। प्रमुख पात्र कब्र बिज्जू एक ऐसा जानवर है जो अपनी भूख मिटाने के लिए कब्र तक खोद डालता है और जब कभी इंसानी बस्तियों का रूख भी करने में गुरेज नहीं करता। ध्यातव्य है कि ऐसी प्रवृत्ति का होते हुए भी वह अपने जंगल के कानून का सम्मान करता है और अपने से श्रेष्ठ जानवरों की इज्जत करता है,उनसे सहमकर और धीमी आवाज में अपनी बात रखता है। अन्य पात्रों में शक्तिशाली शेर है जो बाहुबल का प्रयोग नहीं करके,
न्यायिक प्रक्रिया को अपनाता है। वह चाहता तो झटके में कब्र बिज्जू को सजा दे देता लेकिन वह ऐसा नहीं करके न्याय-प्रकिया में पारदर्शिता को रखते हुए समस्त जंगली जानवरों के मध्य न्याय करता है। इस क्रम में वृद्ध हाथी की महत्ता समाज के महत्वपूर्ण विषयों पर बुजुर्गों की अहमियत को दर्शाता है। कथानक के अंत में कब्र बिज्जू जैसे निकृष्ट जानवर द्वारा इंसानी फितरत पर किया गया सवाल आज के मनुष्य के अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़ा करता है,जो पाठक के मन को जलालत एवं लिजलिजापन से भर देता है। कह सकते है कि ये सारे पात्र प्रतीक रूप में आज के स्वार्थी,वहशी एवं नैतिक अवमूल्यन वाले इंसानों के चरित्र का प्रकाशन कर रहे हैं।
जंगली पशुओं वाले इस लघुकथा के संवाद प्रभावोत्पादक एवं पाठकों के ध्यानाकर्षण में सफल है। आम बोलचाल की भाषा में लिखे गये ये संवाद वस्तुस्थिति की गंभीरता एवं ह्रदयगत भावों की अभिव्यंजना में सफल रहे हैं। इन कथोपकथनों की सबसे अच्छी बात यह है कि इनका तारतम्य बना हुआ है। कहीं भी ये असंगत या बेतरतीब नहीं हो पाए है, जो लेखक की अपनी ही सफलता है। संवादों में प्रयुक्त शब्दों पर लेखक की सतर्कता देखते ही बनती है। यही कारण है कि भालू की कड़क आवाज हवा में तैरती है,तो हिरण की खौफ़जदा आवाज उसके संवाद में घुली है।बाघिन की गुर्राहट में दर्द है और तो कब्र बिज्जू का सहमना और गीदड़ की फुसफुसाहट पाठकों को अपने करीब सुनाई पड़ती है। शेर के प्रश्न पर हकलाते बिज्जू के वर्णन में भाषा की चित्रात्मकता तो पाठकों के मन में चलचित्र सा लगता है–“अपनी पूँछ मोड़कर पिछली टाँगों में दबाते हुए कब्र बिज्जू कुछ कदम पीछे हट गया…”
कहना न होगा कि इस लघुकथा को भाषा, संवाद एवं कथोपकथन ने जीवन्तता प्रदान की है। या यूँ कहें कि भाषा का यह अप्रतिम सौन्दर्य संपूर्ण लघुकथा में बिखरा हुआ है।
वर्तमान मानव-जीवन की विसंगतियों पर तीखी प्रतिक्रिया इस लघुकथा का निर्दिष्ट है। कहना न होगा कि मानवेतर प्राणियों के द्वारा इंसान की खोखली मानसिकता से ग्रसित आज की सामाजिक परिस्थितियाँ सहज रूप में अनावृत्त हुई है। इसके लिए लेखक को अलग से कोई अतिरिक्त परिश्रम नहीं करना पड़ा है,बस कथानक के प्रवाह में स्वयमेव स्थितियाँ उजागर होती जा रही है जिससे लघुकथा का वैशिष्ट्य और भी बढ़ गया है।
लघुकथा के आकारगत दृष्टिकोण से एकबारगी देखा जाए तो इस लघुकथा में न्यूनता नहीं है; किन्तु, विसंगतियों की कलई खोलते हुए लेखक कुछ अधिक जज्बाती और आक्रोशित हो गया है। फलत: कुछ जगहों पर अनावश्यक रूप से कब्र बिज्जू से संवाद कहलवाए गए है, जो पाठकों को बोझिल लग सकते हैं। लेखक चाहता तो मात्र अंतिम पंक्ति कहलवाकर इस लघुकथा का समापन कर सकता था और इससे इसकी संप्रेषणीयता में किसी पर कई कोई न्यूनता नहीं आती। बहरहाल लेखक की स्वतंत्रता है कि वह किस तरीके से अपनी बात रखे और हमें उसकी इस स्वतंत्रता का सम्मान करना ही चाहिए।
लघुकथा साहित्य की वह विधा है जिससे हमारी अपेक्षा बनी रहती है कि वह लघु-कलेवर में हो,यद्यपि यह उसकी बाध्यता नहीं है। अक्सर लघुकथाकार की कोशिश रहती कि वह लघुकथा का शीर्षक ऐसा रखे, जिसमें केवल कथानक ही न सिमटा हो, कथागत् वैशिष्ट्य भी उजागर हो जाए। इस लघुकथा का शीर्षक पढ़ते ही पाठक को कथानक के मूल भाव की एक हल्की सी झलक मिल जाती है और वह इसे पढ़ने के लिए आतुर भी होता है और मानसिक तौर पर इस गंभीर लघुकथा को पढ़ने के लिए तैयार भी हो जाता है।
वस्तुत: पाठकों में पढ़ने का यह उत्कंठा उत्पन्न कर ‘शीर्षक’अपनी सार्थकता पा जाती है।
किसी भी सृजन का एक उद्देश्य होता है और लघुकथा में यह उद्देश्य ‘अनबूझे’ को लेकर चलता है। प्रस्तुत लघुकथा का उद्देश्य अंतिम पंक्तियों में प्रकट होते ही ,इसका ‘अनबूझा’ भी पाठक ‘बूझ’ जाता है और वह हतप्रभ रह जाता है। पाठक का यहाँ आकर हतप्रभ हो जाना ही लेखक का निर्दिष्ट है। कह सकते हैं कि उसके उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है।
निष्कर्षत:कह सकते है कि लघुकथाकार रवि प्रभाकर जी ने ‘मुर्दो के शहर’ के माध्यम से न केवल एक बेहतरीन लघुकथा का सृजन किया है।अपितु लघुकथा में प्रतीकों और संकेतों के महत्व के साथ ही लघुकथा की गंभीरता को भी प्रतिपादित किया है तथा नयेपन की तलाश को एक नया आयाम दिया है। निस्संदेह इस लघुकथा से हिन्दी लघुकथा साहित्य को जो एक नई तरावट मिली है, वह चिरस्मरणीय एवं प्रेरणादायक रहेगी।
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1- बेबस विद्रोह : डॉ सतीशराज पुष्करणा
राधा देवी के हाथों से दूध का भरा गिलास छूटाऔर फर्श पर गिरते ही टुकड़े-टुकड़े हो गया। राधा देवी अपनी नौकरानी पर दहाड़ उठी, “हरामजादी। इतना गर्म दूध दिया जाता है कि हाथ जले और गिलास चकनाचूर हो जाए। “
“मालकिन, दूध सुसुम था।”
” चुप्प!एक तो गिलास तुड़वा दिया और ऊपर से जबान चलाती है। जाकर जल्दी से काँच के टुकड़े उठाकर फेंक और उस स्थान को अच्छी तरह से साफ कर।”
रमेश ने अंदर घुसते ही पत्नी को नौकरानी पर बिगड़ते सुना तो बिना सोचे-विचारे वह भी उसपर बरस पड़ा, ” चल! लपककर काँच साफ कर नहीं तो …।”
मालिक की डाँट सुनकर बेचारी सकते में आ गई। उसके गालों पर आँसू फिसलने लगें। मजबूर अबला बिखरे काँच के टुकड़े को साफ कर ही रही थी कि एक किरच उसके हाथ में धँस गई और हाथ लहूलुहान हो गया। हाथ के दर्द ने उसके मन को बेबस विद्रोह से भर दिया। रोते-सोचते उसने फर्श साफ कर दिया। इससे पूर्व की वह अपने लहूलुहान हाथ को पल्लू से बाँधती, मालिक पुन: गरजा, “छिनाल, काम यहाँ करती है,ध्यान कहीं और रखती है।काँच साफ कर दिया तो हरामखोर ने लहूलुहान हाथ से सारा फर्श गंदा कर दिया। जा! अब जाकर अपना लहूलुहान हाथ साफ कर और जल्दी से एक कप गरमागरम चाय बनाकर ला।”
चीनी निकालने के क्रम में भय और दर्द से थरथराते हाथों से मर्तबान गिरा और चूर-चूर हो गया। धमाके की आवाज सुनते ही पति-पत्नी बेतहाशा नंगे पैरों ही रसोई की ओर दौड़ पड़े। रसोई में घुसते ही काँच की किरचों से दोनों के पैर लहुलुहान हो गए।
नौकरानी द्रुतगति से निकली और अपने घर की ओर चल पड़ी।
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2-मुर्दो का शहर : रवि प्रभाकर
घेरा बनाकर खड़े जानवरों के चेहरों पर भय और चिन्ता की रेखाएँ गहरी व्याप्त थीं। उनकी जलती आँखें मध्य में हैरान-परेशान सिर झुकाये कब्र बिज्जू को घूर रही थी।
“दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा…जो तुमने ऐसी हरकतें शुरू कर दीं हैं।”हवा में तैरता भालू का कड़क, पर भययुक्त स्वर जब कब्र बिज्जू के कानों से टकराया, तो वह सहमकर सिकुड़-सा गया।
“हम क्या खाक पहले ही कम मुसीबत में हैं, जो तुम अपनी हरकतों से और मुसीबत बढ़ा रहे हो।” खौफज़दा हिरण बोला।
” इंसानों ने तो बिना वजह ही हमारा जीना हराम कर रखा है, अगर उन्हें तुम्हारी हरकतों की भनक तक भी लग गई न, तो वे इस बचे-खुचे जंगल को भी तबाह कर देंगे।” एकमात्र बचे शावक को बाँहों के घेरे में भरती हुई बाघिन की गुर्राहट में दर्द झलक रहा था।
“भले ही भूखमरी की हालात हैं, पर हम उस तरफ मुँह तक नहीं करते हैं,” गीदड़ भी फुसफुसाया।
“इससे पहले कि इंसानी बस्ती में घुसकर उनका शिकार करने के दुस्साहस पर अपना फैसला सुनाएँ, क्या तुम अपनी सफाई में कुछ कहना चाहोगे?” शेर की दहाड़ से माहौल में खामोशी पसर गई और सभी की निगाहें कब्र बिज्जू पर टिक गई। “…महा…राज…वो…वो…इंसानी बस्ती…जिन्दा…इंसान…” हिम्मत बटोरते हुए कब्र बिज्जू के कंठ से मरियल- सा स्वर निकला।
“घबराओ मत, जो कहना चाहते हो,साफ-साफ कहो। अपनी सफाई पेश करने का तुम्हें पूरा अधिकार है।” बुजुर्ग हाथी ने उसे आश्वस्त किया।
“जी दादा।” कुछ आश्वस्त होकर माथे का पसीना पोंछते हुए, कब्र बिज्जू शेर को मुखातिब होते हुए बोला, “महाराज, लगता है सभी को कुछ गलतफहमी हो गई है।”
“गलतफहमी…क्या मतलब।” शेर गुस्से से गुर्राया।
अपनी पूँछ मोड़कर पिछली टाँगों में दबाते हुए कब्र बिज्जू कुछ कदम पीछे हट गया और भयभीत आँखों से हाथी की ओर देखने लगा। हाथी ने स्थिर आँखों से उसे इशारा किया। कब्र बिज्जू अपनी साँसों को नियंत्रित करता हुआ पुन: बोला, “महाराज, जिसे आप इंसानों और …जिन्दा इंसानों की बस्ती कह रहे हो न, वहाँ तो कोई जिन्दा इंसान है ही नहीं…वहाँ तो सब मुर्दा हैं।”
“मुर्दा…हैरानी भरा समवेत स्वर उभरा।
“हाँ महाराज, मैं सही कह रहा हूँ … वहाँ तो सब मुर्दा ही हैं। अगर कोई जिन्दा होता तो क्या प्रतिकार न करता!”
-0-–पूनम कतरियार, 202,ओम निलय अपार्टमेंट , खेतान गली, पश्चिम बोरिंग कैनाल रोड -पटना-1