संस्मरण
15 सितम्बर 2019 की शाम, राधेश्याम भारतीय, घरौंडा ने सूचित किया कि रामकुमार आत्रेय जी को बीती रात एक कार वाला चोट मार गया है और वह सरकारी अस्पताल में दाखिल हैं।
तुरत-फुरत में मैं गाड़ी उठाकर अस्पताल की तरफ चल दिया। मन यह सोच-सोचकर परेशान हुआ जा रहा था कि कल रात साढ़े दस बजे के करीब तो मैंने उन्हें ब्रह्मसरोवर के दक्षिणी कोने पर उनके पोते, विकास के सुपुर्द किया था। अगर यह पता होता कि अगले चौक पर एक दुर्घटना उनका इंतजार कर रही है तो मैं उन्हें आजादनगर ही न छोड़ आता। पर इससे पहले भी लम्बी यात्रा के उपरान्त, लौटते हुए, मैं उन्हें रास्ते में तालाब के इसी कोने पर छोड़ता आया हूँ। जहाँ से मैं वापिस अपने सेक्टर की तरफ मुड़ जाता और वे अपने पोते के साथ अपने घर, आजादनगर चले जाते।……

अस्पताल पहुँचकर उन्हें बैड पर बैठे, बतियाते पाया ,तो मन ही मन परमात्मा को धन्यवाद दिया। आत्रेय जी ने बताया कि रात अस्पताल के सामने वाले चौक पर मुड़ते हुए राँग साइड से एक कार वाला आ रहा था, जो मोटर साइकिल के अगले पहिये में टक्कर मार गया। मैं सड़क पर गिरकर बेहोश हो गए। विकास को भी थोड़ी बहुत खरोंचें आईं, बाकी वह ठीक है। विकास ही अन्य लोगों की मदद से अस्पताल में ले आया था। प्राथमिक उपचार के पश्चात अस्पताल प्रशासन ने छुट्टी दे दी। पर अरुण जी…. आज चक्कर बहुत आ रहे थे जिसकी वजह से दोबारा अस्पताल आ गया। इन्होंने एडमिट कर लिया है। ग्लूकोज़ लगा रखा है ..इंजैक्शन भी लगाए हैं…. अब कहते हैं सीटी-स्कैन होगा…!
दो दिन बाद जब दोबारा मिलने गया तो कहने लगे -‘‘अरुण जी! कमजोरी महसूस करता हूँ तथा चक्कर कम नहीं हो रहे हैं। सीटी-स्कैन में भी कुछ नहीं आया है। सब नॉर्मल है।’’ … मुझे तो भय था कि आत्रेय जी सिर के बल जमीन पर गिरे थे। कहीं सिर में कोई खून का थक्का न जम गया हो। जो कि खतरनाक हो सकता था। …मैंने फिर मन ही मन परमात्मा का शुक्र अदा किया कि सब कुछ ठीक-ठाक है।
20 को मैं और राधेश्याम जी मिलने गए। कहने लगे.. ‘‘सारा पिण्डा दर्द करता है। चक्कर भी बन्द नहीं हुए हैं। डॉक्टर एम.आर.आई. करवाने के लिए कह रहे हैं।’’…चिन्ता की लकीरें मेरे और राधेश्याम के मस्तक पर भी खिंच आयीं थीं।
25 को मिलने गया। वह घर आ गए थे। बैठे थे। बेचैन थे। पहले की अपेक्षा कमजोर-से लगे मुझे। देखते ही मन बुझ-सा गया। पाँव छूते हुए मैंने पूछा, ‘‘हाँ जी! … कैसी तबीयत हैं अब ?’’ मेरी आशा के विपरीत वह दर्द भरी आवाज़ में बोले, ‘‘… दर्द है, अरुण जी … बहुत !…’’
उनका पुत्र पवन आ गया। उसने बताया कि रात भर कराहते रहते हैं। पेन-किलर दे रहा हूँ। एम.आर.आई. में भी कुछ नहीं आया है।
उनसे बैठा नहीं जा रहा था। बार-बार पहलू बदल रहे थे। फिर अपनी पूरी हिम्मत संजोकर दर्द को परे धकेलते हुए बोले-‘‘और …नीरज जी (मेरी पत्नी) ठीक हैं ?’’
मैंने उत्तर दिया -‘‘हाँ जी!’’
वे पुनः बोले -‘‘और वंशिका (छोटी बेटी) …मानसी (बड़ी बेटी)…?’’
‘‘हाँ जी! वे सब बिल्कुल ठीक-ठाक हैं,’’ मैंने उनका प्रश्न सुने बिना ही कह दिया था।…फिर बोले,’’…अच्छा देख …आज ‘‘परीकथा’’ आई है। राधेश्याम की कहानी की पूर्व घोषणा है इसमें। … अगले अंक में छपेगी। .. आप भी भेजो। … प्रयास करते रहो। चुप नहीं बैठना चाहिए। इससे नाम बना रहता है…’’
27 को मिलने गया तो राधेश्याम जी भी साथ में थे। वह दर्द से तड़प रहे थे। दर्द की लहरें कहीं भीतर से उठतीं थीं और वे बिलबिला उठते थे। उनकी अवस्था देखकर मेरी जुबान तालू से चिपक गई। वह लेटे हुए थे। बार-बार करवट बदल रहे थे। बोले -मुझे बिठा दो। राधेश्याम जी ने कमर को सहारा दिया और वे चारपाई पर ही पैर लटका कर बैठ गए थे।
पवन आया । पिता की स्थिति पर वह भी चिन्तित था। बोला, ‘‘अरुण जी, कोई आराम नहीं आ रहा है। एक इंजैक्शन (पेन किलर) रात को लगाता हूँ और एक इंजैक्शन सुबह लगाता हूँ। … तब कहीं दस मिनट के लिए आँख लगती है ….।’’
कई बार चीजें इंसान की समझ से परे हो जाती हैं। अब यह समझ नहीं आ रहा था कि जब सिर, गर्दन और कमर के सारे टैस्ट नॉर्मल आए हैं तो फिर यह दर्द …?
मैने सहज ही पूछ लिया,‘‘… आपको दर्द होता कहाँ हैं ?’’ क्षण भर के लिए वे चुप पड़ गए। अपने आप में ही कुछ ढूँढने-टटोलने -सा लगे। फिर दर्द से दोहरे होते हुए, धीमी आवाज़ में बोले,‘‘दर्द …! हूँ ….! दुष्यन्त का एक शेर है … दर्द यहाँ होता है … वहाँ होता है … कहाँ – कहाँ होता है … भई … भूल गया …’’, यह कहते-कहते वह हाँफने लगे थे।
उस दिन लौटते हुए मन बहुत उदास हो गया था। कहीं भीतर ही भीतर यह अहसास होने लगा था कि … आत्रेय जी अब जा रहे हैं !
उनके जीवन का सफर दर्द भरा ही रहा। माँ से उन्हें बेहद लगाव रहा। माँ पर जब उन्होंने लघुकथा तथा कविता लिखी ,तो कागज़ पर उन्होंने अपने स्वयं के अहसास को ही उकेरा…।
पत्नी के इस नश्वर संसार से कूँच कर जाने पर उन्होंने एकाकी जीवन की राह चुनी। एक बार बताने लगे – क्या अरुण … उसे क्षय रोग हुआ था। अस्पताल में मैंने जी-जान से उसकी सेवा की थी कि बच जाएगी, किन्तु वह न बची। मुझे क्षय रोग देकर चली गई …। बहुत भंयकर रोग हुआ। थर्ड स्टेज का ! मुझे लगा था कि मैं नहीं बचूँगा। पर मैं बच गया। … अरुण मैं चाहता तो दूसरा विवाह भी कर सकता था। किन्तु मैंने एकाकी पन को चुना… कागज़ -कलम को चुना!
उनकी एक आँख बचपन से खराब थी। उन्हें एक ही आँख से दिखाई देता था। 2009 में उस आँख में भी संक्रमण बढ़ गया। ऐम्स में तीन बार आँख का रैटिना बदला गया, पर आँख के संक्रमण की वजह से तीनों ही बार डॉक्टरों को नाकामयाबी हाथ लगी। मैं उस समय हिसार में था। मिलने गया तो बेहद निराशा की अवस्था में थे। फफक पड़े -‘बस अरुण जी! अन्धा हो गया मैं तो ! लिखने – पढ़ने के सहारे जीवन चल रहा था। अब दिखाई ही नहीं देगा ,तो लिखना-पढ़ना खत्म हो जाएगा… और लिखना-पढ़ना खत्म ,तो समझो धीरे-धीरे जीवन भी खत्म…!’’
तब मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा था, ‘‘आत्रेय जी …आप तो अपनी हर रचना में अपने पाठकों को रोशनी दिखाते हैं। … आप अपनी हर रचना में उज़ाले की बात करते हैं। आप ऐसी निराशाजनक बातें करते हुए अच्छे नहीं लगते। … और … और आप क्यूँ चिन्ता करते हैं … विकास बनेगा आपकी आँखें! … मैं बनूँगा आपकी आँखें !’’
आज एक बार फिर से मैंने उन्हें जीवन से बेहद हताश एवं निराश पाया था। आज तो साफ – साफ महसूस हुआ कि दर्द की लहरें उन्हें जीवन की सख्त चट्टान पर पटक रहीं हैं। … दर्द की लहरें उन्हें पछाड़ रहीं हैं …
राधेश्याम जी को पिपली छोड़ने गया ,तो अंधेरा गहरा गया था। मूसलाधार वर्षा होने लगी थी। गाड़ी में लगे पैन ड्राइव में से एक ग़ज़ल सीने में उतर रही थी …
दर्द बढ़कर फुगाँ न हो जाए,ये जमीं आसमाँ न हो जाए ….
बाद में पता चला कि आजाद नगर की तरफ एक बूंद भी न बरसा। वहाँ सब सूखा ही रहा था। उनत्तीस तारीख को शारदीय नवरात्रों का पहला दिन था। सुबह से ही मन में आत्रेय जी की लगन लगी हुई थी। मन आत्रेय जी का ही नाम रट रहा था …
देवी की ज्योति जगाई। क्षण भर को ठिठककर ज्योति की तरफ देखा तो आत्रेय जी उसमें आन बसे …। कुछ व्रत का सामान तथा कुछ शृंगार का सामान ले आता हूँ … यह सोचकर मैं ढ़ाई बजे के करीब घर से निकला और ब्रह्मसरोवर के ऊपर से होता हुआ, सरकारी अस्पताल के सामने वाले चौक से मुड़कर आजाद नगर पहुँच गया …।
गेट खुलने की आवाज़ पर पवन ने लॉबी का दरवाजा खोलकर बाहर झाँका था। वह बाहर आ गया था। वह किसी की प्रतीक्षा में था। उसने बताया – अभी आँख लगी है अरुण जी। … बस दस मिनट ही हुए हैं …। आज तो रो पड़े। … सुबह से दो इंजैक्शन दिये हैं … दर्द निवारण के लिए। तब कहीं जाकर … थोड़ी देर के लिए अब आँख लगी है। … कल ले गया था अल्केमिस्ट अस्पताल, पंचकूला में। उन्होंने भी सारी रिपोर्टें देखकर तथा कुछ और एक्स-रे वगैरह करवाकर, अच्छी तरह जाँच-परख की तथा वापिस भेज दिया कि सुबह-शाम पेन किलर दो तथा फिज़ियोथेरेपिस्ट से कमर की मालिश तथा सिकाई करवाओ …। मैं फिज़ियोथेरेपिस्ट का इन्तजार में ही हूँ। बस आने ही वाला है वह। … आपको अगर मिलना है तो थोड़ा सा इन्तजार कर लो ..
‘‘कोई बात नहीं …उन्हें सोये रहने दो … मैं बाद में आता हूँ,‘‘यह कहकर मैं मुड़ चला था।
वापिस मुड़ते हुए मन फिर भारी हो गया था।
मुझे वह दिन याद आ गया जब मैं 895/12 आजाद नगर में रहता था। यह 1992 के आसपास का समय था जब मैं हर पत्र, पत्रिका में उनकी रचना पढ़कर प्रभावित होता था। तब आत्रेय जी का पता छपा करता था गाँव करोड़ा, जिला कैथल, हरियाणा। मेरा प्रारब्ध मुझे पुकार रहा था। अथवा यह कोई जन्मों का ही नाता था कि एक दिन मैंने आत्रेय जी को एक पत्र लिखा। फिर दूसरा, तीसरा …. और फिर एक सिलसिला ही चल निकला। मैं उन्हें अपनी रचनाएँ (कूड़ा) भेजने लगा। वह मेरे हर पत्र का जवाब देते। जवाब बहुत ही संक्षिप्त होता तथा पोस्टकार्ड पर उनकी लिखावट में ही होता। मेरा सौभाग्य देखिये कि 2004 के आसपास पवन ने आजाद नगर में ही प्लॉट लेकर वहाँ मकान बनवा लिया और वे 864/12 आजाद नगर कुरुक्षेत्र में ही आन बसे।
फिर शुरु हुआ एक सिलसिला पत्रिकाएँ पढ़ने का। ‘हंस’ मैं मँगवाता तो कथादेश वह मँगाते। ‘कथा बिम्ब, शुभतारिका तथा पुष्पगंधा के अंक मैं मँगाने लगा तो हरिगंधा, उत्तरप्रदेश, वर्तमान साहित्य तथा कथाक्रम सरीखी पत्रिकाएँ वह मँगाने लगे। हम जब भी मिलते पहले मैं सभी लघुकथाएँ पढ़कर सुनाता फिर कविताएँ … फिर कुछ चुनी हुई कहानियाँ भी हम पढ़ते। रचनाएँ पढ़कर फिर वह कहते -देख रचना के नीचे फोन नम्बर दिया होगा… चल मिला, बात करते हैं। … और वह कितने ही लेखकों से सम्पर्क साधते तथा उनसे उनके रचनाकर्म पर बात करते।
सहसा ही मुझे वह दिन भी याद आ गया। जब वे मेरा हाथ पकड़कर पूनम (राज) प्रकाशन, पुराना सीलमपुर, दिल्ली ले गए थे। मेरी पाण्डुलिपि पकड़ाकर प्रकाशक को साधिकार बोले-‘‘ले भाई यह किताब छापनी है।’’ आत्रेय जी की उसी प्रकाशक से पहले दो किताबें आ चुकी थीं। ‘इक्कीस जूते’ (लघुकथा) और ‘आँधियों के खिलाफ’ (कविता)।
वह लयबद्ध छोटी-छोटी छंद -मुक्त कविताएँ भी खूब लिखते। आत्रेय जी एक बार कहने लगे- अरुण … हरियाणा में उदयभानु हंस जी छंदबद्ध कविता के सिद्धहस्त हस्ताक्षर थे। वह हर वर्ष अपने जन्मदिवस पर छंदबद्ध कविता के प्रख्यात लेखकों को सम्मानित करते थे। वह मुक्तछंद कविता को कविता ही नहीं मानते थे। उन्होंने मुक्तछंद कविताओं के लिए सर्वप्रथम मुझे सम्मानित किया था तथा यह माना था कि आत्रेय जी की कविताएँ किसी मायने में छंदबद्ध कविताओं से कम नहीं हैं।
इसके साथ-साथ ही एक सिलसिला और भी चल निकला था। वह मुझे अपने साथ साहित्यिक कार्यक्रमों में भी ले जाने लगे थे। हरियाणा साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में, जलेस की गोष्ठियों में, दूरदर्शन एवम् आकाशवाणी की अनेक रिकार्डिंग्स में मैं उनका सहभागी रहा।
सेक्टर आठ की मार्किट से ही मैंने देवी माँ पर चढ़ाए जाने वाली कुछ शृंगार की सामग्री एवं फलाहार का सामान लिया। गाड़ी में आकर बैठा तो साथ वाली सीट पर रखे मोबाइल फोन पर नजर चली गई। जो गाड़ी में ही रह गया था। यंत्रचालित की-सी अवस्था में ही मैंने फोन उठाया … बटन दबाकर ऑन किया तो स्क्रीन पर आत्रेय जी का मोबाइल नम्बर डिस्पले हो रहा था। मिस्ड कॉल थी। एक हाथ से कॉल मिला ली। .. मैंने तो अभी ठीक से हैलो भी नही कहा था कि उधर से विकास रोता हुआ बोला, ‘‘अंकल जी ….. दादा जी एक्सपायर …. हो गए हैं ….’’
‘‘क्या …. ? ओ …. हो ….।’’ फोन बंद हो गया था। मैं जड़ हो गया था। …. जिस बात का डर था, आखिर वही हुआ ….। आत्रेय जी चले गये …।
गाड़ी धीरे -धीरे चला किसी तरह घर पहुँचा। माँ अपने नियत स्थान पर बैठी थी। कैसी अजीब-सी मनःस्थिति थी मेरी । घर में चारों तरफ सन्नाटा था, पर मेरे भीतर विचारों का अंधड़ उठ रहा था …. भावों का ज्वार उमड़ रहा था।
माँ के समीप जाकर दीवान पर सामान रखा …. रखा क्या … छूट ही गया था हाथों से सब कुछ। …. शृंगार का सामान लिफाफे से बाहर निकल आया था। चूड़ियों की डिब्बी खुल कर चूड़ियाँ बिखर-सी गई थीं। माँ बोली – ‘‘क्या कर रहा है … आराम से रख !’’ माँ को अनसुना करते हुए मैंने चेहरा उसके समीप ले जाकर कहा,‘‘ चले गए वो तो … वो …. आत्रेय जी चले गए …. विकास का फोन आया है, अभी-अभी …।’’
‘‘चले गए !’’ … माँ ने दोहराया … फिर अगले ही क्षण सब समझकर चौंक उठी …. ‘‘हैं ! ? ओ … हो …!’’ माँ का चेहरा स्याह पड़ गया था।
गाड़ी उठाकर दौड़ा दी थी आजाद नगर की तरफ। चले गए … चले गए … आत्रेय जी चले गए – मेरे भीतर एक शोर उठ खड़ा हुआ था। तालाब के ऊपर से गुजरते हुए पहले वह जगह आई जहाँ मैंने उन्हें 14 सितम्बर की रात को विकास के सुपुर्द किया था। घरौंडा में हिन्दी दिवस मनाकर लौटे थे हम। … कहाँ मालूम था कि यह मेरी आत्रेय जी के साथ आखिरी यात्रा होगी!
थोड़ा आगे जाने पर … उनकी एक कहानी -‘एक पहाड़ जिद’ के 102 साल के नायक पर मेरी नज़र पड़ गई। … एक अन्जान फ़कीर के प्रति इतनी अगाध श्रद्धा और आत्मीयता का भाव भी आत्रेय जी जैसा सहृदय व्यक्ति ही रख सकता है। गर्मियों की किसी सुहानी-सी शाम में अथवा सर्दियों की कुनकुनी धूप में अक्सर मैं और आत्रेय जी घूमते-फिरते हुए ब्रह्मसरोवर के इस निर्जन-से किनारे पर आ पहुँचते थे और कुछ क्षण इन बाबा जी के चरणों में बिताकर लौट जाते थे।
मैं गाड़ी रोककर … उनके समीप पहुँचा। ‘‘आइए …. आइए …. और कैसे हैं ?’’ उन्होंने चिर – परिचित आत्मीयता से पूछा और प्रेम का सम्बल पा मैं जोरों से रो दिया …। वह घबरा गए …। मैंने रोते-रोते बताया कि आत्रेय जी चले गए …। उन्हें सुनाई बहुत कम देता है। उन्हें सुनाई पड़ा कि मेरे पिता जी चले गए हैं। वह बोले-‘‘क्या पिता जी … ? कोई बात नहीं … क्यों चिन्ता करते हैं …?’’ मैंने उनके कान के समीप मुँह ले जाकर ऊँचे स्वर में कहा कि आत्रेय जी … आत्रेय जी चले गए हैं …।
घबराहट उनके चेहरे पर साफ परिलक्षित होने लगी थी। किन्तु उनकी आत्मशक्ति गजब की थी। अगले ही क्षण अपने आप को सँजोकर बोले -‘‘कोई बात नहीं … चिन्ता मत करो … सब कुछ वह (परमात्मा) ही तो है ….।’’
गाड़ी में बैठकर मैंने मुड़कर उनकी तरफ देखा तो पाया कि वह उकड़ू बैठकर अपना आसन कभी बिछाने तो कभी समेटने लगे थे। … और ऐसा करते हुए वह लगातार बड़बड़ाए जा रहे थे … ‘‘सब कुछ उन्हीं की (परमात्मा) इच्छा से ही तो होता है … सब उन्हीं की लीला ही तो है … सब वह ही तो है …!’’
सरकारी अस्पताल के सामने वाला वह मनहूस चौक भी आया था जहां 14 सितम्बर की रात वह दुर्घटना घटित हुई थी। सड़क तो आज भी नहीं बनी थी। लोग आज भी राँग साइड से ही गुजर रहे थे।
।वह लेटे हुए थे। शांत चित्त ! होंठ ऐसे मानो अभी मुस्कुरा उठेंगे। मानो अभी कह उठेंगे – हाँ अरुण भाई … आ गए ! … हाथ स्वतः ही जुड़ गए …. अश्रुधारा फूट पड़ी थी।
दर्द सहते-सहते दर्द को ऐसे अपना लेंगे … दुष्यन्त का वह शे़र मानो सम्मुख आकर साकार हो उठा था-
सर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी,
एक जगह हो तो कहे दर्द इधर होता है।
महाप्रयाण से पहले चरण छुए। मन पुकार उठा था, ‘‘आत्रेय जी ! … हो सके तो फिर लौटकर आना ! … फिर बहुत सारी लघुकथाएँ, कविताएँ, कहानियाँ लिखना। … फिर उपन्यास भी लिखना। फिर …! अक्सर कहा करते थे … बहुत तमन्ना थी अरुण जी, मैं उपन्यास भी लिखना चाहता था … पर आँखों की वजह से कुछ न बन पाया!
आत्रेय जी मन की आँखों से लिखते थे। उनकी लघुकथाएँ कथारस से भरपूर होतीं। एक बार एक गोष्ठी में एक लेखिका ने तीन-चार पंक्तियों की अपनी कुछ लघुकथाएँ पढ़ीं। आत्रेय जी ने कहा कि यह लघुकथाएँ तो हैं … पर प्रभाव तो नहीं छोड़ पा रही हैं। उनकी लघुकथाओं की प्रूफ रीडिंग करते समय राधेश्यामजी और मैं उनकी रचना प्रक्रिया से गुजरते। उनकी लघुकथाओं के पात्र मेरे देखे-भाले, जाने-पहचाने लोग ही होते। … मैं अक्सर मजाक में उन्हें छेड़ने लगता, बहस करता। मेरी लघुकथा को तो सुनते ही वह कह उठते – अरुण जी … आप लघुकथा की शुरुआत कहानी की तरह से करते हो । … या फिर कहते – यह कहानी का प्रारूप है, मेरे भाई !
मैं जब भी मिलने जाता। वह पत्र-पत्रिका उठाकर लाते और कहते – देखो इसमें फलाँ लेखक की लघुकथा है। पढ़ना तो इसे …। लघुकथा समाप्त होने पर मैं उनका मुँह देखता कि वे कुछ कहेंगे। पर वह कहते -‘पहले आप बताओ … आप क्या समझे ?’
फेसबुक पर आयी लघुकथाएँ भी मैं कभी-कभार उन्हें पढ़कर सुनाता। और जब उस लघुकथा पर आए कमैंट्स मैं उन्हें पढ़कर सुनाता तो वह निराशा से भर उठते। कहते – अरुण जी ! यह आभासी संसार है। … और दुख इस बात का है कि इन लेखकों ने इसे ही सच मान लिया है। इन लाइक्स और कमैन्ट्स से बाहर निकलकर यथार्थ की जमीन पर पाँव रखना बहुत जरुरी है, इन लोगों के लिये …
एक बार एक लघुकथा गोष्ठी में उन्हें बुलाया नहीं गया। राधेश्याम जी के पास निमन्त्रण आया तो उसने मुझसे बात की। फिर उसने कार्यक्रम के आयोजकों से बात की ! संयोग से एक आयोजक आत्रेय जी के समकालीन थे। लघुकथा के विकास में उनका भी बहुत अच्छा योगदान रहा। राधेश्याम ने उनसे बात की, तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने आत्रेय जी से बात की ओर पश्चाताप स्वरूप उन्हें कार्यक्रम के लिए विशेष आमन्त्रण दिया। कार्यक्रम के पश्चात् हमारी बैठक हुई। राधेश्याम जी भी थे। कार्यक्रम के बारे में भी बात चली। मैंने सहज ही टोक दिया, ‘मुझे नहीं अच्छा लगा आत्रेय जी … आपका इतना बड़ा नाम और इतना अच्छा काम … आपने उन्हें आगे से फोन किया कि मुझे क्यों नहीं बुलाया …! आप मुझे यह बताओ कि उस कार्यक्रम में भाग लेकर अब आप क्या बन गए हो ? … बताओ … आपने क्या पा लिया अब …?’’
मेरी बात सुनकर आत्रेय जी सहम गए थे। क्षणभर की चुप्पी के पश्चात वह बोले -‘‘भई … वह (आयोजक) मेरा समकालीन है। मैं उसे अपनी नाराजगी जाहिर कर सकता हूँ। …और हम साथ काम कर रहे हैं ,तो नाराजगी जाहिर करनी भी चाहिए …!’’
तब नहीं पता था कि ‘हँसी-हँसी में, जिसे मैं जीवन की निस्सारता का पाठ पढ़ाने की बचकानी हरकत करुँगा ,वह सहज ही में जीवन की निस्सारता का इतना बड़ा पाठ मुझे पढ़ा जाएगा कि …
चिता धू-धू कर जल उठी थी।
वह खुद्दार इतने थे कि दैनिक-ट्रिब्यून के संपादक की छोटी-सी बात पर नाराज़ होकर उसे दो टूक सुना आए कि मैं आज के बाद आपके अखबार का यह कॉलम नहीं लिखूँगा। जो साप्ताहिक कॉलम (खरी-खोटी के नाम से) आत्रेय जी ने लगभग दो -अढ़ाई साल लिखा … उस सुनहरे मौके को (मौकापरस्त लेखकों के लिए) आत्रेय जी ने सहजता से ही छोड़ दिया।
चिता की अग्नि की तरफ एकटक ताकते हुए देर तक खड़ा रहा। कैसा होता है मानव जीवन ! क्षणभंगुर ! पानी केरा बुदबुदा …! जाने वाला पार … उस पार चला जाता है। पीछे छोड़ जाता है पैरों के निशान …! असंख्य यादें !
आप बहुत याद आएँगे आत्रेय जी ! … अलविदा … !
-0-
अरुण कुमार-म. न. 84, सैक्टर -8,कुरुक्षेत्र -136118 (हरियाणा)
मोबाइल न0 93552-21504., 94671-71504.
-0-