जुलाई 2026

देशान्तरआख़िरी स्टेशन     Posted: February 1, 2026

अंग्रेज़ी से अनुवादः जितेन्द्र भाटिया

हफ्ते में छह दिन, ठीक एक ही समय पर रेल का इंजन खेतों-खलिहानों की स्तब्धता को चीरता हुआ आगे निकल जाता है। दरख़्तों या पीछे फैले पहाड़ों को इससे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता; लेकिन खेत के बीचों-बीच खड़ी इकलौती गाय बहुत गौर से इस ओर देखती है। अपने छोटे-से केबिन से सिर निकालकर इंजन ड्राइवर गर्मजोशी से अपना हाथ हिलाता है, तो प्रत्युत्तर में गाय भी पूँछ को आगे-पीछे झटका देती हुई अपने थनों पर हवा करने का उपक्रम करती है। इस रस्म को वे दोनों बरसों से दोहराते चले आ रहे हैं, हालांकि ड्राइवर जानता है कि आज इस सिलसिले का आख़िरी दिन है। कल से वह रिटायर हो रहा है। हर रोज़ तड़के पाँच बजे उठकर काम के लिए तैयार होने की निरंतरता से मुक्ति का ख़याल उसे रोमांचित कर देता है। घर की किश्तों के अदा हो चुकने के बाद अब वह दरवाज़े के करीब हरी घास के सपने को तवज्जोह दे सकेगा। जिन सस्ती कीमतों वाले सैर-सपाटों के इश्तहारों से अखबार भरे रहते हैं, उनमें शिरकत के बारे में भी अब सोचा जा सकता है। यही नहीं, अब उसे हर रोज़ अपने आपको दिलासा नहीं देनी होगी कि सिर्फ रोजी-रोटी ही नहीं, आत्मसम्मान के लिए भी आदमी का काम करते रहना ज़रूरी होता है। और हाँ, आज के बाद उसे अपने चिड़चिड़े स्वभाव वाले सड़ियल सहायक की मौजूदगी को भी बर्दाश्त नहीं करना होगा।

स्टेशन से गाड़ी निकालते वक्त ड्राइवर के जेहन में वे अनगिनत योजनाएँ उमड़ने लगती हैं. जिनमें से अधिकांश को अब अंजाम देने के लिए चुना जा सकता है। घुमावदार सुरंगों के उस पार की खस्ताहाल झुग्गियों, पटरियों के दोनों ओर खड़ी इमारतों और उनकी छतों पर चमकते नियॉन बत्तियों वाले इश्तहारों को वह देखकर भी अनदेखा कर देता है। अपनी कामकाजी जिंदगी के उन आखिरी क्षणों को जीते हुए भी न तो उसे कोई खास लुत्फ महसूस होता है और न ही उसे इस खयाल से खुश होने की मोहलत मिलती है कि आज के बाद उस इंजन के थ्रॉटल या एयरप्रेशर गेज से कभी उसका वास्ता नहीं पड़ेगा। भविष्य की सुकून भरी नींद के खयालों में डूबा, अन्यमनस्क भाव से गाड़ी को आगे बढ़ाता हुआ वह शहरी इलाके से आगे के उस खुले प्राकृतिक विस्तार में आ जाता है, जहाँ हरियाली अपने सैंकडों रंगों के साथ मौजूद है और जहाँ गोबर और खाद की गंध रह-रहकर उसके नथुनों को घेर लेती है। जब उसे दूर से वह गाय दिखाई दे जाती है, तो वह अपने सहायक की नाराज़गी भरी निगाहों के बावजूद बेसाख्ता गाड़ी की रफ्तार कम कर देता है।

 गाय के नज़दीक आते-आते उसे अहसास होता है कि आज उसके लिए सिर्फ हाथ हिलाना काफी नहीं होगा। उसे लगता है कि मौके के मुताबिक आज उसे गाय के ठीक सामने गाड़ी रोक देने जैसा कोई असाधारण कदम उठाना होगा। बेशक रेलवे की नियमावली में ऐसा करने की सख़्त मनाही है; लेकिन जिस तरह पिछले तीस बरसों से वह नियमों को तोड़ने में असमर्थ रहा है, ठीक उसी तरह आज उसका मन उन नियमों के पालन के लिए तैयार नहीं है। लिहाज़ा वह धीरे-धीरे ब्रेक लगाना शुरू कर देता है और स्पीडोमीटर की सुई नीचे उतरती हुई आखिरकार शून्य पर आकर रुक जाती है। धीरे-धीरे, बहुत एहतियात के साथ, अपने पुराने कमर के दर्द का ख़ास ख़याल रखते हुए, वह केबिन से नीचे उतरकर पटरी पर आ जाता है। चलने की आदत न होने वाले किसी व्यक्ति की तरह डगमगाते कदमों से वह खेत की मेंड़ को पार कर गाय की तरफ बढ़ता है। ट्रेन को रुकता देखकर गाय ने अपनी पूँछ फटकारना बंद कर दिया है। सिर घुमाकर वह इंजन ड्राइवर को देखती है, जो अब उसे सहलाने के लिए इस तरह हाथ बढ़ा रहा है, जैसे वह मवेशी न होकर कोई शेर हो। पता नहीं किस अनुभूति से चालित होकर गाय ज़ोर से रँभाती है, जिससे उसकी आँखों पर भिनभिनाती मक्खियाँ घबराकर उड़ जाती हैं। गाय फिर से घूमकर रुकी हुई ट्रेन की ओर देखती है और इतनी दूरी के बावजूद उसे ड्राइवर के केबिन में भुनभुना रहे सहायक की सिगरेट से उठता धुँआ दिखाई दे जाता है। खिड़कियों में यात्री अधीर होकर चिल्ला रहे हैं। वे चाहते हैं कि ड्राइवर फौरन वापस लौट आए। उनका वक़्त खराब हो रहा है। यह तो हद ही हो गई, वे कहते हैं। वे इसकी शिकायत करके रहेंगे; लेकिन कुछ धैर्यवान अल्पसंख्यक यात्री सिर्फ इतना देखते हैं कि एक आदमी,  जो अपनी यूनिफार्म से रेलवे का इंजन ड्राइवर लगता है, खेत में एक गाय को गले से लगाए खड़ा है। उसी मुद्रा में कई क्षण गुजार चुकने के बाद आखिरकार जब वापस ट्रेन की ओर लौटता है, तो उसके चेहरे पर एक ऐसे संतुष्ट आदमी का भाव होता है, जिसने अपनी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी कर ली हों।

साभारः विश्व साहित्य संकलन (दूसरा खण्ड: यूरोप): जितेन्द्र भाटिया, द्वितीय संस्करण : 2022, मूल्य : 275/-, पृष्ठ : 216, प्रकाशक: संभावना प्रकाशन, रेवती कुंज, हापुड़ 245101

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