जुलाई 2026

भाषान्तरथाती     Posted: August 1, 2022

गढ़वाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट

सैरू  सामान ट्रक म धरे गे छौ। कवि शिवा आज नयाँ मकान म जाणा छा, “अरी गुड़िया!” माँ न जोर से धै लगाई, “चल, सैरू सामान धरे गे।”

चार सालै गुड़िया मठु– मठु हिटिक भैर आणी छै। वींक झगुली कि झोळी उन्द गारा–ढुंगौं कु बोझ भुर्यूं छौ।

देखदु ई माँ खिजे, ” यु क्या?  ढुंगौं कु क्या कन्न? फुन्ड धोळ।” माँ न गुड़िया का सौब ढुंगा फोळी देनी। द्वी घड़ी गुड़िया ढुंगू बणी फोळयाँ ढुंगौं तैं दिखणी राई अर तब जोर-जोर सि रूंण लगी गे।

“क्य ह्वे, बाबा?”  पिताजी न खुखला माँ गाड़ी कि गुड़िया तैं पूछी।

गुड़िया रूंणी लगीं छै। माँ न अगिनें ऐकि बोलि, “देखा, तुमारी लाडी यूँ ढुंगौं तैं झगुली माँ भोरिक लिजाण लगीं छै। नयी झगुली भि बिगाड़ी याली।”

“हरे सरिता! कुछ त सोचदि वींका ढुंगौं फेंकण सि पैली। यु वींका बाल़ापन कि सम्लौंण च, तुमारा ट्रक–भरी सामान सि जादा कीमत च गुड़िया तैं यूँ ढुंगौं कि।”

सरिता न गुड़िया  तैं साँकि म भेंटी क बोलि, “मि तैं माफ करि दे बाबा, मिन त्वी तैं दु:ख द्याई।” अर तीन्नी मिलिक फुळीयाँ ढुंगौं उकन्न लगी गेनी। गुड़िया खुस ह्वे कि नाचणी छै।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine