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जुलाई 2008 |
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जून 2008 |
संचयन |
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दस्तावेज़ |
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चर्चा में |
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- राजस्थान साहित्य अकादमी के विभिन्न विधाओं पर दिए जाने वाले पुरस्कारों में लघुकथा को सम्मिलित किए जाने की घोषणा।
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मेरी पसन्द |
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मई 2008 |
संचयन |
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अप्रैल: 2008 |
संचयन |
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अध्ययन-कक्ष |
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दस्तावेज़ |
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चर्चा में |
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- कथादेश एवं कादम्बिनी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता के परिणाम
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मेरी पसन्द |
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मार्च 2008 |
संचयन |
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देश |
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आलेख |
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- लघुकथा और कहानी : डॉ. शमीम शर्मा
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अध्ययन-कक्ष |
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दस्तावेज़ |
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चर्चा में |
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मेरी पसन्द |
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फरवरी:2008 |
संचयन |
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- शशांक ,मुकेश वर्मा ,हसन जमाल ,एवं पवन शर्मा की लघुकथाएँ ।
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देशान्तर |
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आलेख |
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- लघुकथा की भाषिक संरचना-संस्कार :नागेन्द्र प्रसाद सिंह
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अध्ययन-कक्ष |
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- पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाएँ ।
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दस्तावेज़ |
- समकालीन जीवन स्थितियों के अनु्भूति-स्पंदित क्षणों की तलाश :प्रेम शशांक ।
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चर्चा में |
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- सृजन – सम्मान छत्तीसगढ़ का लघुकथा पर अन्तर्राष्ट्रीय विमर्श 16-17 फ़रवरी को रायपुर में ।
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मेरी पसन्द |
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जनवरी:2008 |
संचयन |
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अध्ययन-कक्ष |
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| नवम्बर 2007 |
देश |
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-
श्रीचंद्रधर शर्मा गुलेरी, यशपाल, रावी, राजेन्द्र यादव , जोगिन्दर पाल, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, रमेश बतरा, विष्णु नागर , चित्रा मुद्गल, उर्मि कृष्ण, पूरन मुद्गल, सूर्यकांत नागर, सतीशराज पुष्करणा, बलराम, जगदीश कश्यप, भगीरथ, पृथ्वीराज अरोड़ा, डा सतीश दुबे, विक्रम सोनी, प्रबोधकुमार गोविल, कमल चोपड़ा, सुभाष नीरव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, सुकेश साहनी, श्याम सुन्दर अग्रवाल, डॉ.श्यामसुंदर दीप्ति, शैलेंद्र सागर, कमलेश भटट ‘कमल’, विनायक, राजकुमार घोटड़, महेन्द्र रश्मि, कुलदीप चेतनपुरी, दीपक घोष, मीरा चन्द्रा , पारस दासोत, नासिरा शर्मा, प्रेम जनमेजय, अमरीक सिंह दीप, रामकुमार आत्रेय, रमेश गौतम, दिनेश पाठक ‘शशि’, हरीश करमचन्दाणी, डा0 राजेन्द्र कुमार कनौजिया, नीलिमा टिक्कू, निर्मला सिंह, माधव नागदा, हरिमोहन शर्मा, भारत यायावर, कुमार नरेन्द्र, अनिन्दिता, प्रेम भटनागर, देवांशु वत्स, नीता सिंह, विजय बजाज, काली चरण प्रेमी, अहमद निसार, मुकीत खान, डॉ0 तारा निगम, रंगनाथ दिवाकर, भूपिंदर सिंह, गिजु भाई, नीलम कुलश्रेष्ठ |
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बालक, अभिभावक और शिक्षक के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है ।शिक्षा की कोई भी विधि -प्रविधि ,पाठ्यक्रम-पाठ्यचर्या लागू करने से पहले बच्चे को समझना होगा।कोई भी तौर-तरीका बच्चे से ऊपर नहीं है और न हो सकता है ।कोई भी व्यक्ति या संस्था इसके ऊपर नहीं है ,वरन् इसके लिए है ।यह बात सदैव ध्यान में रखनी होगी।ये लघुकथाएँ हमारी आँखें खोलने का काम करती हैं एवं शिक्षा के लिए हमारी अव्यावहारिक कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती हैँ । |
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| अक्टूबर 2007 |
संचयन |
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| सितम्बर, 2007 |
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